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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी ...

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी



सोमवार, 14 जुलाई 2014

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब ...

किसी के हाथ में ख़ंजर, कहीं फरमान होता है
तुम्हारी दोस्ती में ये बड़ा नुक्सान होता है

नहीं आसान इसकी सरहदों तक भी पहुँच पाना
बुलंदी का इलाका इसलिए सुनसान होता है

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब
शहर का आइना ये देख कर हैरान होता है

जो तिनके के सहारे तैरने का दम नहीं रखते
भंवर में थामना उनको कहाँ आसान होता है

लड़कपन बीत जाता है, जवानी भी नहीं रहती
बुढापा उम्र भर इस जिस्म का मेहमान होता है 

सोमवार, 19 मई 2014

पर सजा का हाथ में फरमान है ...

काठ के पुतलों में कितनी जान है
देख कर हर आइना हैरान है

कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

मैं चिरागों की तरह जलता रहा
क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
छोड़ कर जाना बहुत आसान है

जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
पर सजा का हाथ में फरमान है 

सोमवार, 12 मई 2014

सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं ...

मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं

मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं

है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं

वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं

रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं

चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

हज़ारों चलेंगे जहाँ तुम चलोगे ...

उठो धार के साथ कब तक बहोगे
अभी जो न उठ पाए फिर कब उठोगे

उठो ये लड़ाई तो लड़नी है तुमको
कमर टूट जाएगी कब तक झुकोगे

ये ज़ुल्मों सितम यूँ ही चलता रहेगा
जो सहते रहे तो फिर सहते रहोगे

ये दुनिया का दस्तूर है याद रखना
दबाती है दुनिया के जब तक दबोगे

उठो आँख में आँख डालो सभी के
बनाती है दुनिया जो पागल बनोगे

ये गिद्धों की नगरी है सब हैं शिकारी
मिलेगा न पानी न जब तक लड़ोगे

रिवाजों की चादर से बाहर तो निकलो
हज़ारों चलेंगे जहाँ तुम चलोगे