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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

धूप को वो छोड़ के घर आ गया ...

फोड़ के सभी का वो सर आ गया
उसमें पत्थरों का असर आ गया

बोल दो चिराग से छुप कर रहे
तेज़ आंधियों का शहर आ गया

छंट गए गुबार सभी धूल के
बादलों का झुण्ड जिधर आ गया

दुश्मनी रहेगी कभी भी नहीं
भूल जाने का जो हुनर आ गया

देखते न खुद के मुंहासे कभी
दूसरों का तिल भी नज़र  गया

जुगनुओं की एक झलक क्या मिली
धूप को वो छोड़ के घर आ गया

पिछले कई दिनों से घर से दूर एरिज़ोना, यूं. एस. में हूँ, आज समय मिलने पे आपसे मुखातिब हूँ, उम्मीद है जल्दी ही ब्लॉग पे नियमित होऊंगा