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मंगलवार, 22 मई 2018

दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी ...


दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी
लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी

मेज मैं फिर से बजाता हूँ चलो
तुम रफ़ी के गीत गाओ साब जी

क्यों न मिल के छत पे बचपन ढूंढ लें
कुछ पतंगें तुम उडाओ साब जी

लिख तो ली थी पर सुना न पाए थे
वो ग़ज़ल तो गुनगुनाओ साब जी

तब नहीं झिझके तो अब क्या हो गया
रेत से सीपी उठाओ साब जी

याद है ठर्रे के बोतल, उल्टियां
फिर से वो किस्सा सुनाओ साब जी

सीप, रम्मी, तीन पत्ती, रात भर 
फिर से गंडोला खिलाओ साब जी

रविवार, 26 अप्रैल 2015

कुछ तस्वीरें ...

इंसान की खुद पे पाबंदी कभी कामयाब नहीं होती ... कभी कभी तो तोड़ने की जिद्द इतनी हावी हो जाती है की पता नहीं चलता कौन टूटा ... सपना, कांच या जिंदगी ... फुसरत के लम्हे आसानी से नही मिलते ... खुद से करने को ढेरों बातें  ... काश टूटने से पहले पूरी हो चाहत ...  

सिगरेट के धुंए से बनती तस्वीर
शक्ल मिलते ही
फूंक मार के तहस नहस

हालांकि आ चुकी होती हो तब तब
मेरे ज़ेहन में तुम

दागे हुए प्रश्नों का अंजाना डर
ताकत का गुमान की मैं भी मिटा सकता हूँ
या "सेडस्टिक प्लेज़र"

तस्वीर नहीं बनती तो भी बनता हूँ
(मिटानी जो है)

सच क्या है कुछ पता नहीं
पर मुझे बादल भी अच्छे नहीं लगते
शक्लें बनाते फिरते हैं आसमान में
कभी कभी तो जम ही जाते हैं एक जगह
एक ही तस्वीर बनाए
शरीर पे लगे गहरे घाव की तरह

फूंक मारते मारते अक्सर बेहाल हो जाता हूँ
सांस जब अटकने लगती है
कसम लेता हूँ बादलों को ना देखने की

पर कम्बख्त ये सिगरेट नहीं छूटेगी मुझसे ...