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सोमवार, 6 नवंबर 2017

ज़िंदगी के गीत खुल के गाइए ...

जुगनुओं से यूँ न दिल बहलाइए
जा के पुडिया धूप की ले आइए

पोटली यादों की खुलती जाएगी
वक़्त की गलियों से मिलते जाइए

स्वाद बचपन का तुम्हें मिल जाएगा
फिर उसी ठेले पे रुक के खाइए

होंसला मजबूत होता जाएगा
इम्तिहानों से नहीं घबराइए

फूल, बादल, तितलियाँ सब हैं यहाँ
बेवजह किब्ला कभी मुस्काइए

सुर नहीं तो क्या हुआ मौका सही
जिंदगी के गीत खुल के गाइए

माँ सभी नखरे उठा सकती है फिर 
आप बच्चे बन के तो इठ्लाईए

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मंच पर आने से पहले बे-सुरा हो जाएगा ...

जी हजूरी कर सको तो सब हरा हो जाएगा
सच अगर बोला तो तीखा सा छुरा हो जाएगा

चल पड़ा हूँ मैं अँधेरी रात में थामें जिगर
एक जुगनू भी दिखा तो आसरा हो जाएगा

ये मेरी किस्मत है या मुझको हुनर आता नहीं
ठीक करने जब चला मैं कुछ बुरा हो जाएगा

इम्तिहानों की झड़ी ऐसी लगाई आपने
प्रेम में तपते हुए आशिक खरा हो जाएगा

या करो इकरार या फिर मार डालो इश्क में
तीर से नज़रों के आशिक अधमरा हो जाएगा

सीख ना पाए अगर तो शब्द लय सुर ताल छंद
 मंच पर आने से पहले बे-सुरा हो जाएगा