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रविवार, 31 मई 2015

सैडिस्टिक प्लेज़र ...

लड़ना, हारना, बदलना फिर लड़ना वो भी अपने आप से ... परास्त होते होते मजा आने लगता है अपनी हार पर, अपनी जुस्तजू पर ... कई बार जब संवेदना मर जाती है ये मजा शैतानी मजे में बदल जाता है पर फिर भी हारता तो खुद ही है इंसान ...

कई बार
चैहरे को खूँटी पे टांग
पैरों को दरवाजे पे उतार
देह से विदेह
स्वयं को देखने की कोशिश में
खो देता हूँ अपना अस्तित्व

हर बार
खाली कमजोर शरीर में
कलुषित विचार
अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं
विचारों को कुंठित करने वाले जिवाणु
शब्दों का अपहरण कर
मनचाहा लिखवा लेते हैं

खुद को पाने की कोशिश में
"जो होना चाहता हूँ" का सौदा करता हूँ
"जो नहीं होना चाहता" का मुखौटा लगाता हूँ
फिर कई दिन
अंतर्द्वंद की विभीषिका में जीता हूँ

शब्दों की अग्नि सुलगते सुलगते
फिर कर देती है उद्वेलित
देह से विदेह हो
फिर स्वयं को देखता हूँ
कुछ और जीवाणुओं से लड़ता हूँ
परास्त होता हूँ
नया सौदा करता हूँ

हाँ ... सौदा करना नहीं छोड़ता
सैडिस्टिक प्लेज़र नाम की चीज़ भी तो होती है ...