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मंगलवार, 5 सितंबर 2017

दीवारों की दरारों में किसी का कान तो होगा ...

हुआ है हादसा इतना बड़ा वीरान तो होगा
अभी निकला है दहशत से शहर सुनसान तो होगा

घुसे आये मेरे घर में चलो तस्लीम है लेकिन 
तलाशी की इजाज़त का कोई फरमान तो होगा

बिमारी भी है भूखा पेट भी हसरत भी जीने की
जरूरत के लिए घर में मेरे सामान तो होगा  

अकेले नाव कागज़ की लिए सागर में उतरा हूँ 
हमारे होंसले पर आज वो हैरान तो होगा

कभी ये सोच कर भी काम कर लेती है दुनिया तो 
न हो कुछ फायदा लेकिन मेरा नुक्सान तो होगा 

दबा लेना अभी तुम राज़ अपने दिल के अन्दर ही 
दीवारों की दरारों में किसी का कान तो होगा

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

वो इक हादसा भूलना चाहता हूँ ...

समय को वहीं रोकना चाहता हूँ
में बचपन में फिर लौटना चाहता हूँ

में दीपक हूँ मुझको खुले में ही रखना
में तूफ़ान से जूझना चाहता हूँ

कहो दुश्मनों से चलें चाल अपनी
में हर दाव अब खेलना चाहता हूँ

में पतझड़ में पत्तों को खुद तोड़ दूंगा
हवा को यही बोलना चाहता हूँ

हवाओं की मस्ती, है कागज़ की कश्ती
में रुख देख कर मोड़ना चाहता हूँ

तुझे मिल के मैं जिंदगी से मिला पर
वो इक हादसा भूलना चाहता हूँ