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सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ...

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... क्या जीवन निरंतर है ... आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ...   

अचानक नहीं आता
ज़िंदगी की क़िताब का आखरी पन्ना
हां ... कभी कभी
कहानी का अन्त आ जाता है बीच में
कई बार उस अन्त से आगे जाने की इच्छा मर जाती है
पर जीवन चलता रहता है
थके हुए कछुए की रफ़्तार से

कहते हैं लकड़ी पे लगी दीमक
जितना जल्दी हो निकाल देनी चाहिए
और सच पूछो तो यादें भी
नहीं तो झड़ती हैं बुरादे की तरह साँसें ज़िन्दगी से   

अच्छा होता जो खाली रहती ज़िंदगी की किताब
कोरी ... श्वेत धवल अन्त तक

कम से कम आखरी पन्ने की तलाश 
आखरी पन्ने पे ख़त्म होती ...

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

कड़वा सच ...

बिन बोले, बिन कहे भी कितना कुछ कहा जा सकता है ... पर जैसा कहा क्या दूसरा वैसा ही समझता है ... क्या सच के पीछे छुपा सच समझ आता है ... शायद हाँ, शायद ना ... या शायद समझ तो आता है पर समय निकल जाने के बाद ...   

एक टक हाथ देखने के बाद तुमने कहा 
राजा बनोगे या बिखारी

वजह पूछी
तो गहरी उदासी के साथ चुप हो गईं
और मैंने ...
मैंने देखा तुम्हारी आँखों में 
ओर जुट गया सपने बुनने

भूल गया की लकीरों की जगह
हाथों का कठोर होना ज्यादा ज़रुरी है
सपनों के संसार से परे
एक हकीकत की दुनिया भी होती है
जहाँ लकीरें नहीं पत्थर की खुरदरी ज़मीन होती है

जूते पहनने के काबिल होने तक
नंगे पाँव चलना ज़रूरी होता है
गुलाब की चाह काँटों से उलझे बिना परवान नहीं चढ़ती  

ये सच है की सपनों का राजकुमार
मैं कभी का बन गया था
आसान जो था
नज़रें बंद करके सोचना भर था
पर भिखारी बने बिना भी न रह सका
(तुम्हारी तलाश में ठोकरें जो खाता रहता हूं)

सच है ... हाथ की रेखाएं बोलती हैं  ...

सोमवार, 27 मार्च 2017

कहानी प्रेम की? हाँ ... नहीं ...

वो एक ऐहसास था प्रेम का जिसकी कहानी है ये ... जाने किस लम्हे शुरू हो के कहाँ तक पहुंची ... क्या साँसें बाकी हैं इस कहानी में ... हाँ ... क्या क्या कहा नहीं ... तो फिर इंतज़ार क्यों ...

हालांकि छंट गई है तन्हाई की धुंध
समय के साथ ताज़ा धूप भी उगने लगी है  
पर निकलने लगे हैं यादों के नुकीले पत्थर
जहाँ पे कुछ हसीन लम्हों की इब्तदा हुई थी

गुलाम अली की गज़लों से शुरू सिलसिला
शेक्सपीयर के नाटकों से होता हुवा
साम्यवाद के नारों के बीच
समाजवाद की गलियों से गुज़रता
गुलज़ार की नज्मों में उतर आया था

खादी के सफ़ेद कुर्ते ओर नीली जीन के अलावा   
तुम कुछ पहनने भी नहीं देतीं थीं उन दिनों
मेरी बढ़ी हुई दाड़ी ओर मोटे फ्रेम वाले चश्में में
पता नहीं किसको ढूँढती थीं

पढ़ते पढ़ते जब कभी तुम्हें देखता  
दांतों में पेन दबाए मासूम चेहरे को देखता रहता     
नज़रें मिलने पर तुम ऐसे घबरातीं
जैसे कोई चोरी पकड़ी गई   
फिर अचानक मेरा माथा चूम 
कमरे से बाहर
जब ज़ोर ज़ोर से हंसती 
तो आते जातों की नज़रों में
अनगिनत सवाल नज़र आते थे मुझे

मैं तो उन दिनों समझ ही नहीं पाता था
ये प्यार है के कुछ ओर ...
हालांकि मैंने ... दीन दुनिया से बेखबर
सब कुछ बहुत पहले से ही तुम्हारे नाम कर दिया था

फिर वक़्त ने करवट बदली
रोज़ रोज़ का सिलसिला हफ़्तों और महीनों में बदलने लगा
एक जीन ओर कुछ खादी के कुर्तों के सहारे
मैंने तो जिंदगी जीने का निश्चय कर ही लिया था
पर शायद तुम हालात का सामना नहीं कर सकीं

तुम्हारे चले जाने के बाद वो तमाम रास्ते
नागफनी से चुभने लगे थे   
रुके हुवे लम्हों की नमी में काई सी जमने लगी थी
अजीब सी बैचैनी से दम घुटने लगा था

खुद को हालात के सहारे छोड़ने से बैहतर
कोई ओर रास्ता नज़र नहीं आया था मुझे

धीरे धीरे वक़्त के थपेड़ों ने
दर्द के एहसास में खुश रहने का ढब समझा दिया 

मुद्दत बाद आज फिर
उम्र के इस मुकाम पे वक़्त की इस बे-वक्त करवट ने
तेरे शहर की दहलीज पे ला पटका है
तेरी यादों के नुकीले पत्थर दर्द तो दे रहे हैं
पर आज धूप की चुभन
पुराने लम्हों का एहसास लिए
मीठी ठंडक का एहसास दे रही है

क्या तुम भी गुज़रती हो कभी इन लम्हों के करीब से  

मंगलवार, 14 मार्च 2017

दर्द ...

अपना अपना अनुभव है जीवन ... कभी कठोर कभी कोमल, कभी ख़ुशी तो कभी दर्द ... हालांकि हर पहलू अपना निशान छोड़ता है जीवन में ... पर कई लम्हे गहरा घाव दे जाते हैं ... बातें करना आसान होता है बस ...

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है
आंसू निकल आएं तो मन हल्का होता है
पत्थर सा जमा
कुछ टूट कर पिघल जाता है

पर सच कहूँ ...

दर्द इंसान को ख़ुदग़र्ज़ बना देता है
सहलाने वाले हाथों पर फफोले उगा देता है
सहते सहते संवेदनहीन बना देता है   

बहते हुवे आंसू
पानी नहीं दर्द का सागर होते हैं
ऐसी आग जो पूरे शरीर को झुलसा देती है   

किसी की यादों का सैलाब जो रिस्ता है धीरे धीरे  
और उजाड देता हैं सपनों को चिंदी-चिंदी

लोग झूठ कहते हैं दर्द ताकत देता है ...

सोमवार, 6 मार्च 2017

तलाश ...

तलाश ... शब्द तो छोटा हैं पर इसका सफ़र, इसकी तलब, ख़त्म नहीं होती जब तक ये पूरी न हो ... कई बार तो पूरी उम्र बीत जाती है और ज़िन्दगी लौट के उसी लम्हे पे आ आती है जहाँ खड़ा होता है जुदाई का बेशर्म लम्हा ... ढीठता के साथ ... 

उम्र के अनगिनत हादसों की भीड़ में
दो जोड़ी आँखों की तलाश
वक़्त के ठीक उसी लम्हे पे ले जाती है
जहाँ छोड़ गईं थीं तुम
वापस ना लौटने के लिए

उस लम्हे के बाद से
तुम तो हमेशा के लिए जवान रह गईं  

पर मैं ...

शरीर पर वक़्त की सफेदी ओढ़े
ढूँढता रहा अपने आप को

जानता हूं हर बीतता पल
नई झुर्रियां छोड़ जाता है चेहरे पे
गुज़रे हुवे वक़्त के साथ
उम्र झड़ती है हाथ की लकीरों से
पर सांसों का ये सिलसिला
ख़त्म होने का नाम नहीं लेता

पता नहीं वो लम्हा 
वक़्त के साथ बूढ़ा होगा भी या नहीं ... 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

उजवल भविष्य ...

उम्र के किसी एक पड़ाव पर कितना तंग करने लगती है कोई सोच ... ज़िन्दगी का चलचित्र घूमने लगता है साकार हो के ... पर क्यों ... समय रहते क्यों नहीं जाग पाते हैं हम ... आधुनिकता की दौड़ ... सब कुछ पा लेने की होड़ ... या कुछ और ...

हाथ बढ़ाया तोड़ लिया
इतने करीब तो नहीं होते तारे 

उजवल भविष्य की राह
चौबीस घंटों में अड़तालीस घंटे के सफर से नहीं मिलती
निराशा ओर घोर अन्धकार के बीच
सुकून भरी जिंदगी की चाह
मरुस्थल में मीठे पानी की तलाश से कम नहीं 

जल्दी से जल्दी समेट लेने की भूख
वक़्त को समय से पहले उतार देती है शरीर में   

तेरे बालों में समय से पहले उम्र का उतर आना 
मेरी आँखों का धुंधलापन नहीं था
वो अनुवांशिक असर भी नहीं था
क्योंकि तेरे चेहरे पर सलवटों के निशान उभर आए थे  

वो मेरी समुन्दर पी जाने की चाह थी 
जो ज़ख्म भरने का इंतज़ार भी न कर सकी
रेत को मुट्ठी में रख लेने का वहशीपन
जो समय को भी अपने साथ न रख सका 

भूल गया था की पंखों का नैसर्गिक विकास
लंबे समय तक की उड़ान का आत्म-विश्वास है

क्या समय लौटेगा मेरे पास ...

सोमवार, 30 जनवरी 2017

अहम् ...

रिश्तों में कब, क्यों कुछ ऐसे मोड़ आ जाते हैं की अनजाने ही हम अजनबी दीवार खुद ही खड़ी कर देते हैं ... फिर उसके आवरण में अपने अहम्, अपनी खोखली मर्दानगी का प्रदर्शन करते हैं ... आदमी इतना तो अंजान नहीं होता की सत्य जान न सके ...      

क्योंकि लिपटा था तेरे प्यार का कवच मेरी जिंदगी से
इस चिलचिलाती धूप ने जिस्म काला तो किया  
पर धवल मन को छू भी न सकी
समय की धूल आँधियों के साथ आई तो सही
पर निशान बनाने से पहले हवा के साथ फुर्र हो गई

पर जाने कब कौन से लम्हे पे सवार
अहम् की आंच ने
मन के नाज़ुक एहसास को कोयले सा जला दिया
मेरे वजूद को अंतस से मिटा दिया 

और मैं .....

इस आंच में तुम्हारे पिघलते अस्तित्व को
धुँवा धुँवा होते देखने की चाह में सांस लेने लगा
समय की धूल में तेरा वजूद मिट्टी हो जाने की आस में जीने लगा
पर ये हो न सका
और कब इस आंच में जलता हुवा खुद ही लावा उगलने लगा
जान भी न पाया

और अब .... ये चाहता हूँ
की इससे पहले की जिस्म से उठती ये सडांध जीना दूभर कर दे  
रिश्ते की नाज़ुक डोर समय से पहले टूट जाय
उन तमाम लम्हों को काट दूं
दफ़न कर दूं वो सारे पल जो उग आए थे खरपतवार की तरह
हम दोनों के बीच

हाँ .... मैं आज ये भी स्वीकार करना चाहता हूँ 
ऐसे तमाम लम्हों का अन्वेषण और पोषण मैंने ही किया था ....

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

अजीब है ये सिलसिला ... चाहता हूँ पढ़ो पर कहता हूँ मत पढ़ो ... चाहता हूँ की वो सब करो जो नहीं कर सका ... कायर हूँ ... डरपोक हूँ या शायद ... (कवी का तमगा लगाते हुए तो शर्म आती है) ...    

मत पढ़ो मेरी नज़्म

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आग उगलते शब्दों से चुनी
बदनाम गलियों के सस्ते कमरे में बुनी
ज़ुल्म के तंदूर में भुनी  
चिपक न जाएं कहीं आत्मा पर
जाग न जाए कहीं ज़मीर

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
आवारा है पूनम की लहरों सी 
बेशर्म सावन के बादल सी
जंगली खयालों में पनपी
सभ्यता से परे
उतार न दे कहीं झूठे आवरण

मत पढ़ो की मेरी नज़्म
उनकी लटों में उलझी हुई
ज़माने से बे-खबर सोई हुई 
बोझिल पलकों से ढलक न जाए
छूते ही गालों को दहक न जाए
बे-सुध न हो तनमन 

मत पढ़ो मेरी नज़्म ...

शनिवार, 7 जनवरी 2017

शिद्दत ...

गज़लों के लम्बे दौर से बाहर आने की छटपटाहट हो रही थी ... सोचा नए साल के बहाने फिर से कविताओं के दौर में लौट चलूँ ... उम्मीद है आप सबका स्नेह यूँ ही बना रहेगा ...

तुम्हें सामने खड़ा करके बुलवाता हूँ कुछ प्रश्न तुमसे ... फिर देता हूँ जवाब खुद को खुद के ही प्रश्नों का ... हालांकि बेचैनी है की बनी रहती है फिर भी ... अजीब सी रेस्टलेसनेस ... आठों पहर ...   

क्यों डूबे रहते हो यादों में ... ?
क्या करूं
समुन्दर का पानी जो कम है डूबने के लिए
(तुम उदासी ओढ़े चुप हो जाती हो, जवाब सुनने के बाद)

अच्छा ऐसा करो वापस आ जाओ मेरे पास
यादें खत्म हो जाएंगी खुद-ब-खुद
(क्या कहती हो ... संभव नहीं ...)

चलो ऐसा करो
पतझड़ के पत्तों की तरह
जिस्म से पुरानी यादों को काटने का तिलिस्म
मुझे भी सिखा दो

ताज़ा हवा के झोंके नहीं आते मेरे करीब
मुलाकात का सिलसिला जब आदत बन गया   
तमाम रोशनदान बंद हो गए थे

सुबह के साथ फैलता है यादों का सैलाब

रात के पहले पहर दिन तो सो जाता है
पर रौशनी कम नहीं होती
यादों के जुगनू जो जगमगाते पूरी रात

मालुम है मुझे शराब ओर तुम्हारी मदहोशी का नशा 
टूटने के बाद तकलीफ देगा 

पर क्या करूं
शिद्दत कम नहीं होती ... 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

सफ़र प्रेम का ...

प्रेम तो पनपता है पल पल ... समय की बुगनी को भरना होता है प्रेम से लम्हा दर लम्हा ... कहाँ होता है किसी एक दिन की औकात में उस प्रेम को समेट पाना ... क्या प्रेम का छलकना भी प्रेम है ... छोड़ो क्या सोचना ... अभी तो लम्हे हैं प्रेम है, समेटने दो ...  


कुछ भी मांग लेने के लिए
जानना चाहा कायनात ने
कैसे बनेगा एक लम्हा पूरी ज़िन्दगी

मैंने सादे कागज़ पे लिखा तुम्हारा नाम
डाल दिया ऊपरवाले की नीली पेटी में

तब से घूमता है खुदा मेरे पीछे
सब कुछ दे देने के लिए

सोचता हूँ तुम हो, प्रेम है
और क्या है जो मांग सकूं उससे  

सोमवार, 29 जून 2015

बुन्दा

हर पुराने को समेट के रखना क्या ठीक है ... फिर उन्ही पुरानी चीज़ों को बार बार देखना, फिर से सहेजना, क्या ये ठीक है ... क्या चीज़ों का, यादों का कूड़ा दर्द के अलावा कुछ देता है ... सहेजने के बाद क्या निकाल फैंकना आसान है इन्हें ... शायद हाँ, शायद ना ...

मुश्किल होता है
पुरानी दराज़ साफ़ करना
बेतरतीब बिखरी यादों के अनगिनत सफे
कुछ को फाड़ देना
कुछ को सीधे कचरे में ठेल देना
और कुछ को ...
अपनी ही नज़र बचा के सहेज लेना

यादें फैंकना
जिस्म से कई हजार साँसें नौच लेने के बराबर होता है
हालांकि उम्र फिर भी ख़त्म होने का नाम नहीं लेती

याद है अमावस की वो काली रात
मेरे सीने से लग के रोते रोते
तुम्हारे कान का बुन्दा अटक गया था मेरी कमीज़ के साथ
उस दिन नज़र बचा के जेब में रख लिया था मैंने उसे

तुम तो अपना बोझ हल्का करके चली गयीं
पर ये बुन्दा फांस की तरह अटका रहा सीने में
संभलते संभलते इक उम्र छिज गई थी जिंदगी से

इस बार सफों को समेटने की कोशिश में
वो बुन्दा भी छिटक आया दराज़ के किसी कोने से

कितनी अजीब बात है न ...
अब जब सांस कुछ थमने लगी थी
फांस की तरह अटकी यादें भी बह चुकी थीं
आज फिर ...
नज़र बचा कर ये बुन्दा सहेजने का मन करता है  

बुधवार, 24 जून 2015

सोच ...

प्रेम में डूब जाना योगी हो जाना तो नहीं ... फिर जीवन से आगे किसने देखा ... अचानक एक छोटे से सुख का मिलना, फिर उस सुख को अपने ही आस-पास बनाये रखने की चाह बनाए रखना ... थोड़ा सा स्वार्थी होना बेमानी तो नहीं ...

क्योंकि ऊंचाई का सफ़र
तन्हाई के रास्ते से गुज़रता है
मैं यह नहीं कहूँगा
की तुम जीवन में नई ऊँचाइयाँ छुओ

मैंने तो अपनी उड़ान का दायरा
उसी दिन तय कर लिया था
जिस दिन तुम ज़िन्दगी में आईं

मैं यह भी नहीं कहूँगा
तुमको मेरी उम्र लग जाए

क्योंकि मेरी उम्र की सीमा तो तय है
तुम्हारी उम्र की तरह
और में जीना चाहता हूँ हर गुज़रता लम्हा
तेरे और बस तेरे ही साथ

हाँ मैं जानता हूँ
खुदगर्जी की पराकाष्ठा है ये
अपने से आगे नहीं सोच पाने का स्वार्थ

पर क्या करूं ये सोच ये सोच भी तो कमबख्त
तेरे पे आकर ही ख़त्म होती है

रविवार, 19 अप्रैल 2015

चीथड़े यादों के ...

सोचो ... यदि उम्र बांटते हुए यादें संजोने के शक्ति न देता ऊपर वाला तो क्या होता ... ठूंठ जैसा खुश्क इंसान ... सच तो ये है की यादें बहुत कुछ कर जाती हैं ... दिन बीत जाता है पलक झपकते और रात ... कितने एहसास जगा जाती है ... कई बार सोचता हूँ उम्र से लम्बी यादें न हों तो जिंदगी कैसे कटे ...

पता नही वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
बेफिक्री से घुस आती हो कम्बल में
दौड़ती रहती हो फिर जिस्म की रग-रग में पूरी रात
जागते और सोएपन के एहसास के बीच
मुद्दतों का सफ़र आसानी से तय हो जाता है

अजीब सा आलस लिए आती है जब सुबह
अँधेरे का काला पैरहन ओढ़े तुम लुप्त हो जाती हो
बासी रात का बोझिल एहसास
रात होने के भ्रम से बहार नहीं आने देता

(हालांकि कह नहीं सकता ... ये भी हो सकता है की मैं उस
भ्रम से बाहर नहीं आना चाहता)

तमाम खिड़कियाँ खोलने पर भी पसरी रहती है सुस्ती
कभी बिस्तर, तो कभी कुर्सी पर
कभी कभी तो हवाई चप्पल पर
(कम्बख्त चिपक के रह जाती है फर्श से)

पता नहीं वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
पर दिन के सुजाग लम्हों में
यादों के ये चीथड़े
जिस्म से उखाड़ फैकने का मन नहीं करता ...