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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

ख़ामोशी ... एक एहसास

क्या बोलते रहना ही संवाद है ... शब्द ही एकमात्र माध्यम है अपनी बात को दुसरे तक पहुंचाने का ... तो क्या शब्द की उत्पत्ति मनुष्य के साथ से ही है ... अगर हाँ तो फिर ख़ामोशी ...

ख़ामोशी टुकड़ा नहीं
मुंह में डाला स्वाद ले लिया

ख़ामोशी पान भी नही चबाते रहे अंदर अंदर
जब चाहा थूक दिया कोरी दीवार पर
अपने होने का एहसास दिखाने के लिए

लड़ते रहना होता है अपने आप से निरंतर  
दबानी पड़ती है दिल की कशमकश
रोकना होता है आँखों का आइना
बोलता रहता है जो निरंतर
तब कहीं जा कर ख़ामोशी बनाती है अपनी जगह  
पाती है नया आकार
बन पाती है खुद अपनी ज़ुबान  

हाँ ... तब ही पहुँच पाती है अपने मुकाम पर
जहाँ दो इंच का फांसला तय करने में गुज़र जाए पूरी उम्र  

ख़ामोशी चीख है सन्नाटे में
जो आती है दबे पाँव कर जाती है बहरा हमेशा के लिए  

ख़ामोशी सच में कोई टुकड़ा नहीं ...

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

चाहत उम्मीद की ...

सोचता हूँ फज़ूल है उम्मीद की चाह रखना ... कई बार गहरा दर्द दे जाती हैं ... टुकड़ा टुकड़ा मौत से अच्छा है  खुदकशी कर लेना ...

कुछ आहटें आती है उम्मीद की उस रास्ते से
छोड़ आए थे सपनों के सतरंगी ढेर जहां   
आशाओं के रेशमी पाँव रहने दो पालने में
की ज़मीन नहीं मिल पायगी तुम्हारी दहलीज़ की 
लटके रहेंगे हवा में
लटका रहता है खुले आसमान तले जैसे चाँद  

मत देना सांस उम्मीद को  
छोटी पड़ जाती है उम्र की पगडण्डी   
ओर बंद नहीं होता डाली पे फूल खिलना 
फज़ूल जाती हैं पतझड़ की तमाम कोशिशें
बारहा लहलहाते हैं उम्मीद के पत्ते

छुपा लेना उंगली का वो सिरा
झिलमिलाती है जहां से बर्क उम्मीद की   
आँखें पी लेती हैं तरंगें शराब की तरह  
नशा है जो उम्र भर नहीं उतरता

मत छोड़ना नमी जलती आग के गिर्द
भाप बनने से पहले ले लेते हैं पनाह उम्मीद के लपकते शोले
मजबूत होती रहती हैं जड़ें उम्मीद की  

हालांकि खोद डाली है गहरी खाई उस रास्ते के इस ओर मैंने
जहां से होकर आता है लाव-लश्कर उम्मीद का
पर क्या करूं इस दिल का  
जो छोड़ना नहीं चाहता दामन उम्मीद का ...  

सोमवार, 20 मार्च 2017

आज और बस आज ...

मुसलसल रहे आज तो कितना अच्छा ... प्रश्नों में खोए रहना ... जानने का प्रयास करना ... शायद व्यर्थ हैं सब बातें ... जबरन डालनी होती है जीने की आदत आने वाले एकाकी पलों के लिए ... भविष्य की मीठी यादों के लिए  वर्तमान में कुछ खरोंचें डालना ज़रूरी है, नहीं तो समय तो अपना काम कर जाता है ...

जिंदगी क्या है
कई बार सोचने की कोशिश में भटकता है मन
शब्दकोष में लिखे तमाम अर्थ
झड़ने लगते हैं बेतरतीब
और गुजरते वक्त की टिकटिकी
हर पल जोड़ती रहती है नए सफे जिंदगी के अध्याय में

वक्त के पन्नों पर अगर नहीं उकेरा
खट्टी-मीठी यादों का झंझावात
नहीं खींचा कोई नक्शा सुनहरी शब्दों के मायने से  
अगर नहीं डाली आदत वर्तमान में जीने की  

तो इतना ज़रूर याद रखना

जिंदगी के कोरे सफे पर  
समय की स्याही बना देती है जख्मी निशान  
कुछ शैतानी दिमाग गाड़ देते हैं सलीब
रिसते हैं ताज़ा खून के कतरे जहाँ से उम्र भर

ज़रूरी है इसलिए हर अवस्था के वर्तमान को संवारना
पल-पल आज को जीने की आदत बनाना 
ताकि भविष्य में इतिहास की जरूरत न रहे  

सोमवार, 6 मार्च 2017

तलाश ...

तलाश ... शब्द तो छोटा हैं पर इसका सफ़र, इसकी तलब, ख़त्म नहीं होती जब तक ये पूरी न हो ... कई बार तो पूरी उम्र बीत जाती है और ज़िन्दगी लौट के उसी लम्हे पे आ आती है जहाँ खड़ा होता है जुदाई का बेशर्म लम्हा ... ढीठता के साथ ... 

उम्र के अनगिनत हादसों की भीड़ में
दो जोड़ी आँखों की तलाश
वक़्त के ठीक उसी लम्हे पे ले जाती है
जहाँ छोड़ गईं थीं तुम
वापस ना लौटने के लिए

उस लम्हे के बाद से
तुम तो हमेशा के लिए जवान रह गईं  

पर मैं ...

शरीर पर वक़्त की सफेदी ओढ़े
ढूँढता रहा अपने आप को

जानता हूं हर बीतता पल
नई झुर्रियां छोड़ जाता है चेहरे पे
गुज़रे हुवे वक़्त के साथ
उम्र झड़ती है हाथ की लकीरों से
पर सांसों का ये सिलसिला
ख़त्म होने का नाम नहीं लेता

पता नहीं वो लम्हा 
वक़्त के साथ बूढ़ा होगा भी या नहीं ... 

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

चाहत ...

कहाँ खिलते हैं फूल रेगिस्तान में ... हालांकि पेड़ हैं जो जीते हैं बरसों बरसों नमी की इंतज़ार में ... धूल है की साथ छोड़ती नहीं ... नमी है की पास आती नहीं ... कहने को रेतीला सागर साथ है ...

मैंने चाहा तेरा हर दर्द
अपनी रेत के गहरे समुन्दर में लीलना

तपती धूप के रेगिस्तान में मैंने कोशिश की
धूल के साथ उड़ कर
तुझे छूने का प्रयास किया

पर काले बादल की कोख में
बेरंग आंसू छुपाए
बिन बरसे तुम गुजर गईं  

आज मरुस्थल का वो फूल भी मुरझा गया
जी रहा था जो तेरी नमी की प्रतीक्षा में

कहाँ होता है चाहत पे किसी का बस ...

सोमवार, 23 जनवरी 2017

प्रश्न बेतुका सा ...

शोध कहाँ तक पहुँच गया है शायद सब को पता न हो ... हाँ मुझे तो बिलकुल ही नहीं पता ... इसलिए अनेकों  बेतुके सवाल कौंध जाते हैं ज़हन में ... ये भी तो एक सवाल ही है ...

सिलसिला कितना लंबा
खत्म होने का नाम नहीं

अमीरों के जूठे पत्तल पे झपटते इंसान
फिर कुत्ता-बिल्ली
पंछी
कीट-पतंगे
दीमक
बेक्टीरिया
वाइरस

क्या पता कुछ ओर भी
जो द्रध्य नहीं

आत्म-हत्या करना आसान नही   
कुलबुलाते पेट के साथ 
आत्म-हत्या की सोच से पहले  
भूख से जीतना होता है  

पर क्या
कुते बिल्ली, कीट पतंगे दीमक
की मानसिकता में भी ऐसा होता है  

ऐसा तो नहीं आत्म-हत्या
प्राणी-जगत के 
सबसे उन्नत जीव की उपज है ... ?

रविवार, 22 मार्च 2015

रफ़्तार ...

बुलंदी का नशा हर नशे से गहरा होता है ... तरक्की की रफ़्तार आजू-बाजू कुछ देखने नहीं देती ... प्रेम, इश्क, रिश्ते, नाते, अपनेपन का एहसास, सब कुछ बस एक छलांग मार के निकल जाना ... एक ही झटके में पा लेने का उन्माद, एक हवस जो भविष्य का सोचने नहीं देती ... चमक जो थकान के बाद आने वाले दिन देखने नहीं देती ...

कितनी अजीब बात है
सागर के इस छोर से उस छोर तक
धरती के इस कोने से उस कोने तक
बस भागता ही रहा

ये मिल जाए वो मिल जाए
ये मिल गया अब वो पाना है
सब कुछ पा लेने की होड़ में
दुनिया की हर सड़क आसानी से नाप डाली

पर नहीं नाप सका तो उसके दिल तक की दूरी
हालांकि मुश्किल नहीं था उस सड़क को पार करना
उस एक लम्हे को बाहों में समेटना
दो कदम की दूरी नापना

अब जबकि दुनिया नाप लेने के बाद
उसी जगह पे वापस हूँ
(शायद भूल गया था दुनिया गोल है)
और चलने की शक्ति लगभग जवाब दे रही है
कोई अपना नहीं इस ठिकाने पर
सिवाए तन्हाई और गहरी उदासी के

भूल गया था की याद रखना होता है
उम्र, गति और दूरी का हिसाब भी ज़िन्दगी की रफ़्तार में
रिश्ते, नातों और अपनों के साथ के साथ