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सोमवार, 18 जून 2018

बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए ...


सूरज खिला तो धूप के साए मचल गए
कुछ बर्फ के पहाड़ भी झट-पट पिघल गए

तहजीब मिट गयी है नया दौर आ गया
इन आँधियों के रुख तो कभी के बदल गए

जोशो जुनून साथ था किस्मत अटक गई
हम साहिलों के पास ही आ कर फिसल गए

झूठे परों के साथ कहाँ तक उड़ोगे तुम
मंज़िल अभी है दूर ये सूरज भी ढल गए

निकले तो कितने लोग थे अपने मुकाम पर
पहुंचे वही जो वक़्त के रहते संभल गए

मजबूरियों की आड़ में सब कुछ लिखा लिया 
बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए

सोमवार, 11 जून 2018

साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो ...


जीत मेरी हो न तेरी हार हो
जो सही है बस वही हरबार हो

रात ने बादल के कानों में कहा
हट जरा सा चाँद का दीदार हो

नाव उतरेगी सफीनों से तभी
हाथ में लहरों के जब पतवार हो

है मुझे मंज़ूर हर व्योपार पर
पाँच ना हो दो जमा दो, चार हो

मौत है फिर भी नदी का ख्वाब है
बस समुन्दर ही मेरा घरबार हो

इक नया इतिहास लिख दूंगा सनम
साथ गर मेरा तुम्हे स्वीकार हो

सोमवार, 28 मई 2018

बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं ...


होठ दांतों में दबाना तो नहीं
यूँ ही कुछ कहना सुनाना तो नहीं

आप जो मसरूफ दिखते हो मुझे
गम छुपाने का बहाना तो नहीं

एक टक देखा हँसे फिर चल दिए
सच कहो, ये दिल लगाना तो नहीं

पास आना फिर सिमिट जाना तेरा
प्रेम ही है ना, सताना तो नहीं

कप से मेरे चाय जो पीती हो तुम
कुछ इशारों में बताना तो नहीं

सच में क्या इग्नोर करती हो मुझे
ख्वामखा ईगो दिखाना तो नहीं

इक तरफ झुकना झटकना बाल को
उफ्फ, अदा ये कातिलाना तो नहीं

रात भर "चैटिंग" सुबह की ब्लैंक काल
प्रेम ही था "मैथ" पढ़ाना तो नहीं

कुछ तो था अकसर करा करतीं थीं तुम 
बाल में ऊँगली फिराना तो नहीं


मंगलवार, 22 मई 2018

दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी ...


दिन पुराने ढूंढ लाओ साब जी
लौट के इस शहर आओ साब जी

कश पे कश छल्लों पे छल्ले उफ़ वो दिन
विल्स की सिगरेट पिलाओ साब जी

मैस की पतली दाल रोटी, पेट फुल
पान कलकत्ति खिलाओ साब जी

मेज मैं फिर से बजाता हूँ चलो
तुम रफ़ी के गीत गाओ साब जी

क्यों न मिल के छत पे बचपन ढूंढ लें
कुछ पतंगें तुम उडाओ साब जी

लिख तो ली थी पर सुना न पाए थे
वो ग़ज़ल तो गुनगुनाओ साब जी

तब नहीं झिझके तो अब क्या हो गया
रेत से सीपी उठाओ साब जी

याद है ठर्रे के बोतल, उल्टियां
फिर से वो किस्सा सुनाओ साब जी

सीप, रम्मी, तीन पत्ती, रात भर 
फिर से गंडोला खिलाओ साब जी

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे ...

रात के अँधेरे में, धूप हो खिली जैसे
यूँ लगे है कान्हा ने, रास हो रची जैसे

ज़ुल्फ़ की घटा ओढ़े, चाँद जैसे मुखड़े पर
बादलों के पहरे में, चांदनी सोई जैसे

सिलसिला है यादों का, या धमक क़दमों की
होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे

चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में
घर के छोटे आँगन में, जिंदगी बसी जैसे

यूँ तेरा अचानक ही, घर मेरे चली आना
दिल के इस मोहल्ले में आ गयी ख़ुशी जैसे
(तरही गज़ल)

सोमवार, 15 अगस्त 2016

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...

लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए

हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए

मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए

पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए

प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए  

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए ...

चोट खाई गिर पड़े खड़े हुए
ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए

दर्द दे रहे हैं अपने क्या करूं
तिनके हैं जो दांत में अड़े हुए

उनको कौन पूछता है फूल जो
आँधियों की मार से झड़े हुए

दौर है बदल गए बुज़ुर्ग अब
घर की चारपाई में पड़े हुए

तुम कभी तो देख लेते आइना
हम तुम्हारी नाथ में हैं जड़े हुए

मत कुरेदिए हमारे ज़ख्म को
कुछ पुराने दर्द हैं गड़े हुए

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

फकत पैसे ही पैसे और पैसे ...

मुझे ये जिंदगी मिलती है ऐसे
तेरी जुल्फों का पेचो-ख़म हो जैसे

तेरी आँखों में आंसू आ गए थे
तुझे मैं छोड़ के जाता भी कैसे

फड़कती है नहीं बाजू किसी की
रगों में बह रहा है खून वैसे

तरक्की ले गई अमराइयां सब
शजर ये रह गया जैसे का तैसे

हवस इंसान की मिटती नहीं है
फकत पैसे ही पैसे और पैसे

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता ...

मुझे इक शख्स अपना सा है शीशे में नज़र आता
जो आना चाहता था घर मगर किस मुंह से घर आता

इधर की छोड़ दी, पकड़ी नहीं परदेस की मिट्टी
कहो कैसे अँधेरा चीर कर ऊंचा शजर आता

वो जिसकी याद में आंसू ढलक आते हैं चुपके से
मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता

सुनाता वो कभी अपनी, सुनाते हम कभी अपनी
कभी कोई मुसाफिर बन के अपना हम-सफ़र आता

उसे मिट्टी की चाहत खींच लाई थी वतन अपने
नहीं तो छोड़ कर बच्चों को क्या कोई इधर आता

जिसे परदेस की मिट्टी हवा पानी ने सींचा था
वो अपना है मगर क्यों छोड़ के मेरे शहर आता
     

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता ...

उदास रात का मंजर अगर नहीं आता
कभी में लौट के फिर अपने घर नहीं आता

में भूल जाता ये बस्ती, गली ये घर आँगन
कभी जो राह में बूढा शजर नहीं आता

जो जान पाता तेरी ज़ुल्फ़ है घना जंगल
कभी भी रात बिताने इधर नहीं आता

समझ गया था तेरी खौफनाक चालों को
में इसलिए भी कभी बे-खबर नहीं आता

बदल के रुख यूँ बदल दी चराग की किस्मत
हवा के सामने वर्ना नज़र नहीं आता

में अपने शेर भी लिख लिख के काट देता हूँ
कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता

उसूल अपने बना कर जो हम निकल पड़ते
हमारी सोच पे उनका असर नहीं आता

रविवार, 19 जुलाई 2015

वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे ...

मुझे ता उम्र काँटों पर सुला दे
मगर बस नींद आने की दुआ दे

थके हारों को पल भर सुख मिलेगा
हवा चल कर पसीना जो सुखा दे

सजा अपनी करूंगा मैं मुक़र्रर
गुनाहों से मेरे पर्दा उठा दे

बराबर से मिलेगी धूप सबको
ये सूरज फैंसला अपना सुना दे

चुनौती दी है जो परवाज़ की तो
मुझे आकाश भी खुल कर खुला दे

कदम दो साथ मिल कर चल न पाया
वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे
  

सोमवार, 10 नवंबर 2014

सुर्ख़ियों में न कभी खबर में आ सके ...

शाम आ सके न वो सहर में आ सके
दर्द फिर कभी न रह-गुज़र में आ सके

कायनात प्रेम से सजा दो इस कदर
लौट के वो शख्स अपने घर में आ सके

जिक्र है हमारा महफ़िलों में आज भी
पर कभी न आपकी नज़र में आ सके

दो ही आंसुओं ने डाल दी थी बेड़ियाँ
फिर कभी न लौट के सफ़र में आ सके

हद से बढ़ गई थी बेरुखी जनाब की
इसलिए न अपने हम शहर में आ सके

मर मिटे जो सिरफिरे वतन की आन पर
सुर्ख़ियों में ना कभी खबर में आ सके