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बुधवार, 2 मार्च 2016

पल दो पल सुस्ताना सीख ...

झगड़ों को निपटाना सीख
रिश्तेदार बनाना सीख

खुद पे दाव लगाना है तो
अपना बोझ उठाना सीख

घाव तो अक्सर भर जाते हैं
गहरे दाग मिटाना सीख

मुद्दत से जो साथ है तेरे
उसका साथ निभाना सीख

बैठी होगी भूखी प्यासी
सही समय घर जाना सीख

तेजी के इस दौर में भईया
पल दो पल सुस्ताना सीख
  

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता ...

उदास रात का मंजर अगर नहीं आता
कभी में लौट के फिर अपने घर नहीं आता

में भूल जाता ये बस्ती, गली ये घर आँगन
कभी जो राह में बूढा शजर नहीं आता

जो जान पाता तेरी ज़ुल्फ़ है घना जंगल
कभी भी रात बिताने इधर नहीं आता

समझ गया था तेरी खौफनाक चालों को
में इसलिए भी कभी बे-खबर नहीं आता

बदल के रुख यूँ बदल दी चराग की किस्मत
हवा के सामने वर्ना नज़र नहीं आता

में अपने शेर भी लिख लिख के काट देता हूँ
कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता

उसूल अपने बना कर जो हम निकल पड़ते
हमारी सोच पे उनका असर नहीं आता

रविवार, 19 जुलाई 2015

वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे ...

मुझे ता उम्र काँटों पर सुला दे
मगर बस नींद आने की दुआ दे

थके हारों को पल भर सुख मिलेगा
हवा चल कर पसीना जो सुखा दे

सजा अपनी करूंगा मैं मुक़र्रर
गुनाहों से मेरे पर्दा उठा दे

बराबर से मिलेगी धूप सबको
ये सूरज फैंसला अपना सुना दे

चुनौती दी है जो परवाज़ की तो
मुझे आकाश भी खुल कर खुला दे

कदम दो साथ मिल कर चल न पाया
वफ़ा के उस पुजारी को भुला दे
  

सोमवार, 3 नवंबर 2014

गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता ...

ये माना साथ निभाना हमें नहीं आता
किसी को छोड़ के जाना हमें नहीं आता

वो जिसकी जेब में खंजर ज़ुबान पर मिश्री
उसी से हाथ मिलाना हमें नहीं आता

मिलेगी हमको जो किस्मत में लिखी है शोहरत
किसी के ख्वाब चुराना हमें नहीं आता

हुनर है दर्द से खुशियों को खींच लाने का
विरह के गीत सुनाना हमें नहीं आता

खुदा का शुक्र है इन बाजुओं में जुंबिश है
निवाला छीन के खाना हमें नहीं आता

इसे ग़ज़ल न कहो है फकत ये तुकबंदी
गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं ...

गर्दनों पे आरियाँ चारों तरफ हैं
खून की पिचकारियाँ चारों तरफ हैं

ना किलेबंदी करें तो क्या करें हम
युद्ध की तैयारियाँ चारों तरफ हैं

जिस तरफ देखो तबाही ही तबाही
वक़्त की दुश्वारियाँ चारों तरफ हैं

गौर से रखना कदम दामन बचाना
राख में चिंगारियाँ चारों तरफ हैं

जेब में है माल तो फिर इश्क़ करना
हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं 

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना ...

हसीनों की निगाहों से गुज़रना
है मुश्किल डूब के फिर से उभरना

वो जिसने आँख भर देखा नहीं हो
उसी के इश्क में बनना संवरना

तुम्हें जो टूटने का शौंक है तो
किसी के ख्वाब में फिर से उतरना

किसी कागज़ की कश्ती के सहारे
न इस मझधार में लंबा ठहरना

समझदारी कहाँ है पंछियों के
बिना ही बात पंखों को कुतरना

रहूँ चाहे कहीं पर दिल ये मांगे
मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना


सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को ...

बुझा दो रोशनी छेड़ो नहीं सोए पतंगों को
जगा देती हैं दो आँखें जवाँ दिल की उमंगों को

जो जीना चाहते हो ज़िन्दगी की हर ख़ुशी दिल से
जरा रोशन करो उजड़ी हुई दिल की सुरंगों को

जिसे मेहनत की आदत है उसे ये राज़ मालुम है
बुलंदी दे ही देती है हवा उड़ती पतंगों को

दबा दो लाख मिटटी में सुलग उठते हैं अंगारे
छुपाना है नहीं आसान उल्फत की तरंगों को

ये खुशबू, फूल, तितली, रेत, सागर, आसमां, मिटटी
ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी ...

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी



मंगलवार, 9 सितंबर 2014

ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं ...

शामिल हूँ खेल में अभी बीमार मैं नहीं
हारा अनेक बार पर इस बार मैं नही

माना हजूम है तो क्या कुछ कायदे तो हैं
झंडा भले है हाथ में सरदार मैं नहीं

हूँ आज भी टिका हुआ सच के ही जोर पर
ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं

माना ये ज़िंदगी, ख़ुशी, ये गम तुझी से है
ये दोस्ती ही है तुम्हारा प्यार मैं नहीं

खुद चल के ही मुकाम पाना चाहता हूँ मैं
घुटनों में दर्द है तो क्या लाचार मैं नहीं

सीने में दर्द है तो है, रोने में हर्ज क्या
चुपचाप गम को सह सकूँ किरदार मैं नहीं

बुधवार, 3 सितंबर 2014

जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या ...

हौंसला है तो उतर पतवार से होता है क्या
जीत लम्बी हो तो छोटी हार से होता है क्या

हर शिकन मिट जाएगी, ये घाव भी भर जाएगा
आज़मा के देख मेरे प्यार से होता है क्या

बूँद ना बन जाए फिर सैलाब इसको रोक लो
फिर न कहना आँसुओं की धार से होता है क्या

वक़्त रहते ही समझ लो मुख़्तसर सी बात है
खुल के बोलो प्यार है, इज़हार से होता है क्या

जीत उसकी है जो पहले वार का रखता है दम
तेज़ चाहे धार हो, तलवार से होता है क्या

थाल पूजा का लिए जो दूर से है देखती
जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या

रविवार, 3 अगस्त 2014

वक़्त को आज़मा के देखो तो ...

दर्द में मुस्कुरा के देखो तो
गीत खुशियों के गा के देखो तो

जीत लोगे तमाम दुनिया तुम
दाव खुद पे लगा के देखो तो

हौंसला है तो साथ देता है
वक़्त को आज़मा के देखो तो

हद भी होती है ज़ुल्म सहने की
शान से सर उठा के देखो तो

उसमें अपना ही अक्स दिखता है
माँ के नज़दीक जा के देखो तो

बाप दे देगा जो भी मांगोगे
तुम कभी सर झुका के देखो तो

रविवार, 27 जुलाई 2014

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है ...

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है
फिर भी कितना थोड़ा है

बाबस्ता यादें उस से
घर जो हमने छोड़ा है

परदेसी हो कर जाना
कौन सा नाता तोड़ा है

शहरों के रास्तों पर तो
हर कोई बस रोड़ा है

गुमनामी में है जिसने
तूफां का रुख मोड़ा है

उसके दोड़े घर चलता
वो जुम्मन का घोड़ा है

तंग हैं उनके दिल उतने
जितना आँगन चौड़ा है

रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है


सोमवार, 14 जुलाई 2014

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब ...

किसी के हाथ में ख़ंजर, कहीं फरमान होता है
तुम्हारी दोस्ती में ये बड़ा नुक्सान होता है

नहीं आसान इसकी सरहदों तक भी पहुँच पाना
बुलंदी का इलाका इसलिए सुनसान होता है

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब
शहर का आइना ये देख कर हैरान होता है

जो तिनके के सहारे तैरने का दम नहीं रखते
भंवर में थामना उनको कहाँ आसान होता है

लड़कपन बीत जाता है, जवानी भी नहीं रहती
बुढापा उम्र भर इस जिस्म का मेहमान होता है 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

खटखटाते रहो, खटखटाते रहो ...

प्रेम का गीत है, गीत गाते रहो
गुनगुनाते रहो, गुनगुनाते रहो

तितलियों ने कहा, फूल को चूम कर
खिलखिलाते रहो, खिलखिलाते रहो

रात जुगनू से बोली, सहर आने तक
झिलमिलाते रहो, झिलमिलाते रहो

पंछियों को जगा कर, ये बोली किरन
चहचहाते रहो, चहचहाते रहो

सर्द मौसम कहे, धूप के कान में
कुनमुनाते रहो, कुनमुनाते रहो

दिल में ख़ंजर उतारा कहा प्यार से
मुस्कुराते रहो, मुस्कुराते रहो

दिल की कुण्डी कभी तो खुलेगी सुनो
खटखटाते रहो, खटखटाते रहो

सोमवार, 30 जून 2014

दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया ...

पानी हवा थी धूप पनपना नहीं आया
गमले के फूल को तो महकना नहीं आया

जो सोचते थे कैद नहीं, घर है ये पिंजरा
उनको खुली हवा में चहकना नहीं आया

तलवार की तो धार पे चलते रहे थे हम
उनकी गली से हमको गुज़ारना नहीं आया

रह रह के मुझे दिख रहा है एक ही चेहरा
कैसे कहूं की दिल को धड़कना नहीं आया

मजबूत छत भिगो न सके तोड़ दी झुग्गी
गुस्ताख़ बादलों को बरसना नहीं आया

अरमान हैं ये दिल के या गीली सी है लकड़ी
मुद्दत से जल रही है धधकना नहीं आया

ज़ुल्मों सितम पे खून यहाँ खौलता तो है
दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया



सोमवार, 9 जून 2014

शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है ...

अँधेरों को यही एहसासे-ज़िल्लत हो रही है
शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है

कभी शर्मा के छुप जाना कभी हौले से छूना
न ना ना ना यकीनन ही मुहब्बत हो रही है

मेरी आवारगी की गुफ्तगू में नाम तेरा
अदब से ही लिया था पर मज़म्मत हो रही है

चुना है रास्ता कैसा, पड़ी है क्या किसी को
बुलंदी पर जो हैं उनकी ही इज्ज़त हो रही है

यहाँ पर कहकहों का शोर है लेकिन अदब से
ये कैसा घर है पहरे में मसर्रत हो रही है

उकूबत है हिमाकत या बगावत है दिये की
हवा के सामने आने की ज़ुर्रत हो रही है

झुकी पलकें, खुले गेसू, दुपट्टा आसमानी
ये दुनिया तो तेरे आने से जन्नत हो रही है


सोमवार, 2 जून 2014

कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या ...

खौफ़ की चादर तले बुलबुल कहेगी क्या
काट दोगे पंख तो चिड़िया उड़ेगी क्या

बीज, मिट्टी, खाद सब कुछ है मगर फिर भी
खून से सींचोगे तो सरसों उगेगी क्या

दिन तो निकलेगा अँधेरी रात हो जितनी
बादलों से रोशनी यूँ रुक सकेगी क्या

बोलनी होगी तुम्हें ये दास्ताँ अपनी
तुम नहीं बोलोगे तो दुनिया सुनेगी क्या

सामने चुप पीठ पीछे जहर सी बातें
यूँ हवा दोगे तो चिंगारी बुझेगी क्या

जुस्तजू को यूँ न परखो हर कदम पर तुम
कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या

सोमवार, 19 मई 2014

पर सजा का हाथ में फरमान है ...

काठ के पुतलों में कितनी जान है
देख कर हर आइना हैरान है

कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

मैं चिरागों की तरह जलता रहा
क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
छोड़ कर जाना बहुत आसान है

जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
पर सजा का हाथ में फरमान है 

मंगलवार, 6 मई 2014

दो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

दो जमा दो पाँच जब होने लगे
अंक अपने मायने खोने लगे

कौन रखवाली करेगा घर कि जब
बेच के घोड़े सभी सोने लगे

मुश्किलों का क्या करोगे सामना
चोट से पहले ही जो रोने लगे

फैलती है सत्य की खुशबू सदा
झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
दुश्मनी के बीज जो बोने लगे