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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

फकत पैसे ही पैसे और पैसे ...

मुझे ये जिंदगी मिलती है ऐसे
तेरी जुल्फों का पेचो-ख़म हो जैसे

तेरी आँखों में आंसू आ गए थे
तुझे मैं छोड़ के जाता भी कैसे

फड़कती है नहीं बाजू किसी की
रगों में बह रहा है खून वैसे

तरक्की ले गई अमराइयां सब
शजर ये रह गया जैसे का तैसे

हवस इंसान की मिटती नहीं है
फकत पैसे ही पैसे और पैसे

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता ...

उदास रात का मंजर अगर नहीं आता
कभी में लौट के फिर अपने घर नहीं आता

में भूल जाता ये बस्ती, गली ये घर आँगन
कभी जो राह में बूढा शजर नहीं आता

जो जान पाता तेरी ज़ुल्फ़ है घना जंगल
कभी भी रात बिताने इधर नहीं आता

समझ गया था तेरी खौफनाक चालों को
में इसलिए भी कभी बे-खबर नहीं आता

बदल के रुख यूँ बदल दी चराग की किस्मत
हवा के सामने वर्ना नज़र नहीं आता

में अपने शेर भी लिख लिख के काट देता हूँ
कोई भी शेर मुकम्मल बहर नहीं आता

उसूल अपने बना कर जो हम निकल पड़ते
हमारी सोच पे उनका असर नहीं आता