शनिवार, 6 दिसंबर 2008

ग़ज़ल

फ़िर कोई खण्डहर विराना ढूँढ़ते हो
मुझसे मिलने का बहाना ढूँढ़ते हो

पौंछ डाला शहर का इतिहास सारा
काहे अब पीपल पुराना ढूँढ़ते हो

इस शहर की बस्तियाँ वीरान हैं
तुम शहर में आबो-दाना ढूँढ़ते हो

गौर से क्यों देखते हो आसमां को
दोस्त या गुज़रा ज़माना ढूँढ़ते हो

मैं जड़ों को सींचता हुं, आब हूँ मैं
क्यूँ अब्र में मेरा ठिकाना ढूँढ़ते हो

रात की चादर लपेटे सोई हैं सड़कें
क्यूँ हादसे,किस्सा,फ़साना ढूँढ़ते हो

लहू से लिक्खा है हर अल्फाज़ मैंने
तुम ग़ज़ल का मुस्कुराना ढूँढ़ते हो

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

जीवन

सुख जो तूने भोगा है, दुःख भी तुझको सहना है
दीपक चाहे तेज़ जले, तल में तो अँधेरा रहना है

लोभ, मोह, माया की मद में, अँधा हो कर दौड़ रहा
अंत समय में सब को भईया राम नाम ही कहना है

तेरा मेरा सबका जीवन पल दो पल का लेखा है
गिन कर सबकी साँसे, चोला पञ्च-तत्त्व का पहना है

सागर की लहरों सा जीवन तट की और है दौड़ रहा
किस को मालुम तट को छू कर लहरों को तो ढहना है

मुँह न मोड़ो तुम सपनो से, सपनो से तो है जीवन
सपने जब तक आंखों में, जीवन चलते रहना है



खुशियाँ सबकी अपनी, दुःख भी सबका अपना हैं
जीवन बच्चे की मुट्ठी में, रेत भरा इक सपना है

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

आँगन

बरसों हो गए उस घर को छोड़े जो आज भी छाया रहता है मेरे ज़हन में,पिछले १५ वर्षों में जाने कितने हि घरों मैं रहा हूँ, पर कोई भी 'अपने आँगन" जैसा नही लगता,उसकी याद, उसकी खुशबू, वहां गुज़ारा एक एक लम्हा, आज भी मन को गुदगुदाता है|

यह कविता, बहुत पहले उस आँगन की याद में शुरू हुई, यादें जुड़ती गयीं, कविता बनती गयी,जाने कितने छंद इसमे और जुडेगें, क्यूंकि वो आँगन तो आज भी उतना ही ताज़ा है, जितना कल था|


आँगन में बिखरे रहे, चूड़ी कंचे गीत
आँगन की सोगात ये, आँगन के हैं मीत

आँगन आँगन तितलियाँ, उड़ती उड़ती जाएँ
इक आँगन का हाल ये, दूजे से कह आएँ

बचपन फ़िर योवन गया, जैसे कल कि बात
आँगन तब भी साथ था, आँगन अब भी साथ 

आँगन में रच बस गयी, खट्टी मीठी याद
आँगन सब को पालता, ज्यों अपनी औलाद

तुलसी गमला मध्य में, गोबर लीपा द्वार
शिव के सुंदर रूप में, आँगन एक विचार

सुख दुःख छाया धूप में, आँगन सदा बहार
आँगन में सिमटा हुवा, छोटा सा संसार

कूंवा जोहड़ सब यहाँ, फ़िर भी बाकी प्यास
बाट जोहता पथिक कि, आँगन एक उदास

दुःख सुख छाया धूप में, भटक गया परिवार
मौन तपस्वी सा रहा, आँगन का व्यवहार

इक इक कर सब छोड़ गए, नाते रिश्तेदार
आँगन में खिलता रहा, फ़िर भी सदाबहार

इक कोने में पेड़ है, दूजे में गोशाल
तीजे ठाकुरद्वार है, आँगन के रखवाल

आँगन से बरसात है, आँगन से है धूप
आँगन जैसे मोहिनी, शिव का सुंदर रूप

रविवार, 16 नवंबर 2008

आओ मिल कर चाँद बुनें

दुःख में रोना आता है,सुख में आप निकलते हैं
मेरी आंखों के आंसू तो ख़ुद मुझको ही छलते हैं


सांसों का है खेल ये जीवन, जीत मौत की होनी है
फ़िर भी क्यों भँवरे गाते हैं, फूल रोज ही खिलते हैं


तेरे मेरे उसके सपने, सपनो से कैसा जीवन
सपने तो सपने होते है, आंखों में ही पलते हैं


दुःख सब का साँझा होगा, मिल कर खुशियाँ बाँटेंगे
एसे जुमले कभी कभी अब किस्सों में ही मिलते हैं


आओ मिल कर चाँद बुनें और सूरज मिल कर खड़ा करें
इस दुनिया के चाँद और सूरज, समय चक्र से चलते हैं

शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

हादसा

कल सुबह ही हादसा ये हो गया
चाँद सूरज की गली में खो गया

इतिहास ने रोका बहुत इंसान को
समय की रफ्तार में वो सो गया

जो धड़कता था मेरे सीने में हरदम
वो मेरा दिल पत्थरों का हो गया

गाँव की पग-डंडियाँ हैं ढूंढती
लौट कर आया नही फ़िर जो गया

कुछ सिसकते ख्वाब उसके साथ थे
अपना घर छोड़ कर जब वो गया

ज़ुल्म का जिसके नही कोई हिसाब
पैसे के बल वो पाप सारे धो गया

बुधवार, 12 नवंबर 2008

शक्ति का अह्वान

दिव्यता का सूर्य फ़िर उगने लगा
मेघ अंधकार का छटने लगा

हो रहा है फ़िर ह्रदय में आज मंथन
तरुण फ़िर उठने लगे हैं तोड़ बंधन
देवता भी कर रहे हैं आज वंदन
गरल फ़िर शिव कंठ मैं दिखने लगा

दिग्भ्रमित हम हो गए थे राह मे
अर्थ, माया की अनोखी चाह मे
लौट कर हम आ गए संग्राम मे
थाल पूजा का पुनः सजने लगा

संस्कृति पर हम को अपनी गर्व है
जाग्रति का हर दिवस तो पर्व है
जाग अर्जुन समय के कुरुक्षेत्र में
तर्जनी पर चक्र फ़िर सधने लगा

समय के तो साथ चलना चाहिए
पर स्वयं को भूलना ना चाहिए
देख तेरे रास्ते का श्रंग भी
पुष्प बन कर राह में बिछने लगा

कौन सा परिचय है तुझको चाहिए
काहे तुझको मार्ग-दर्शन चाहिए
धवल यश है पूर्वजों का साथ तेरे
तिमिर तेरी राह का मिटने लगा

शक्ति का अह्वान कर तू सर्वदा
श्रृष्टि का निर्माण कर तू सर्वदा
लक्ष्य पर एकाग्र है जो दृष्टि तेरी
चिर विजय का रास्ता खुलने लगा

रविवार, 9 नवंबर 2008

मानव

सभ्यता के माप दंड छोड़ता हुवा
समाज के नियम सभी तोड़ता हुवा
कौन दिशा अग्रसर आज का मानव
समय से भी तेज़ तेज़ दौड़ता हुवा

दर्प सर्प का है किंतु विष नही
लक्ष्य तो पाना है पर कोशिश नही
उड़ रहा है दिग्भ्रमित सा गगन में
कर्मपथ से हो विरल मुख मोड़ता हुवा

ताक पर क्यों रख दिए सम्बंध सारे
क्यों युधिष्ठर की तरह निज-बंधू हारे
क्यों चला विस्मरण कर इतिहास को
नेह-बन्ध आदतन मरोड़ता हुवा

सूख गया आँख से क्यों नीर सारा
उतर गया अंग से क्यों चीर सारा
होम कर क्यों मूल्य सारे जा रहा
तिमिर के तू आवरण ओड़ता हुवा

गुरुवार, 6 नवंबर 2008

एक ख्वाहिश

जिस्म ज़ख्मों की जीती जागती नुमाइश है
फ़िर भी जीने की दिल मैं दबी दबी ख़्वाहिश है

दर्द पीछा नही छोड़ेगा मौत आने तक
साँस के साथ साथ दर्द की पैदाइश है

टूट कर बिखर जाने के नही कायल हम भी
साँस बाकी है जब तक सुबह की गुंजाईश है

यूँ न मायूस हो कर होंसले का दम तोड़ो
अभी तो ज़िंदगी से गीत की फरमाइश है

कही घायल, कहीं भूखे कहीं पंछी कफ़स में
हर तरफ़ मौत से जीवन की आज़मईश है

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आइना

टूट कर बिखरा हुवा था आइना,
धर्म पर निभा रहा था आइना,

खून से लिख्खे हुवे इतिहास को,
आइना दिखला रहा था आइना,

देख कर वो सत्य सह न पायेगा,
सत्य पर दोहरा रहा था आइना,

तुमने काहे देख ली अपनी छवि,
गर्व से इठला रहा था आइना,

पत्थरों ने रची थीं ये साज़िशें,
कांच कांच सा रहा था आइना,

अंधों के घर आईने ही आईने,
ख़ुद पे तरस खा रहा था आइना,

कौन जाने कौन शहर बिकेगा,
सोच कर घबरा रहा था आइना,

मांग सूनी, भरी पर प्रति-बिम्ब मैं,
कोई गज़ब ढा रहा था आइना,

तोड़ कर हर एक टुकड़ा आईने का,
आईने बना रहा था आइना,

रविवार, 2 नवंबर 2008

आइनों के शहर का वो शख्स था

तेज़ थी हवा तुम्हारे शहर की
तितलियों का रंग भी उड़ा दिया

बादलों को घर में मैंने दी पनाह
बिजलियों ने घर मेरा जला दिया

बारिशों का खेल भी अजीब था
डूबतों को और भी डुबा दिया




आइनों के शहर का वो शख्स था
सत्य को सफाई से छुपा गया

इक ज्योतिषी हाथ मेरा देख कर
भाग्य की रेखाओं को मिटा गया

कौन सा भंवरा था साथ शहद के
पंखुरी का रंग भी चुरा गया