गुरुवार, 28 मई 2009

इक नज़्म की इब्तदा

१)

सूखे पत्तों से उठती सिसकियाँ,
मसले हुवे फूलूँ से रिसता दर्द,
बादलों का सीना चीर कर बरसते आंसू,
आज भारी है कुछ मौसम का मिजाज़,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
क्यों हूँ में इतना उदास.........

२)

सूखे होठों पर अटके लफ्ज़,
बिस्तर की सिलवटों पर सिसकती रात,
तेरी कलाई में खनकने को बेताब कंगन,
खामोशी भी करती है जैसे बात,
चिनाब का किनारा भी गाता है हीर,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
खाली निगाहों से,
तकता है मुझे कोई आज........

शनिवार, 23 मई 2009

बोलते लम्हे ......

१)

अक्सर देखा है तुझे
खुले आसमान के नीचे
हथेली में सजाते बारिश की रिमझिम बूँदें.......
तेरे ख़्वाबों से झिलमिलाती
तेरे एहसास से भीगी वो बूँदें
पलकों पर सजा लूँगा
धीरे धीरे देखूंगा.............
पूरा होता तेरा ख्वाब........

२)

गीले बालों से टपकती बूँदें
सख्त खुरदरी हथेली पर
जैसे सफ़ेद मोती
गिर रहे हों ज़मीं पर
कोंपलें सरसों की
धीरे धीरे उग रही हैं
बसंत होता मौसम
छेड़ देता है मन के तार
नाच उठता है मन मयूर......
शायद किसी मासूम एहसास ने
करवट बदली है आज .........

३)

चिडियों का चहचहाना
बरखा का टिप टिपाना
पवन का खिल खिलाना
सूखे पत्तों की सरसराहट
तेरे चेहरे की मुस्कराहट
फिर तेरे आने की आहट
वो देखो...
श्रृष्टि ने अभी अभी ...
मेरी कविता का सृजन किया ...

सोमवार, 18 मई 2009

लम्हों की जुबां

१)

चीर कर बादल का किनारा,
चांदनी जब छाने लगेगी,
सरसराती हवा मस्ती में गाने लगेगी,
मुस्कुराती रात,
सर्दी का कम्बल लपेटे,
जब तेरे सिरहाने उतर आएगी,
तू मेरी बाहों में समा जाना,
अलाव खुद -बा-खुद जल उठेंगे.

२)

किसी की बेरुखी,
तू दिल पर न लेना,
बस इतना सोच लेना,
वक़्त हर घाव की दवा है...
अपनी आँखों में उठता समुन्दर,
पलकों के मुहाने ही रोक लेना,
कतरा कतरा मैं पीता रहूँगा,
तेरी प्यास में मैं जीता रहूँगा.

३)

थम गयी है हवा,
ठिठक गयी कायनात,
क्यूँ न नीले आसमान की चादर पर सजे,
बादल के सफ़ेद फूल,
फूंक मार कर उड़ा दूं........
या हलके से गुदगुदी कर,
तुझे हंसा दूं.......
बादलों के बदलते रूप में,
तेरा उदास चेहरा,
अच्छा नहीं लगता........
जब तू खिलखिला कर हंस पड़ेगी,
ये हवा चल पड़ेगी,
बादल भी बदलने लगेगा अपना रूप,
अटकी हुई कायनात,
खुद-बा-खुद चल पड़ेगी.

बुधवार, 13 मई 2009

मासूम एहसास

१)

खिड़की के सुराख से निकल
भोर की पहली किरन
चुपके से तेरे करीब आ जाती है
कुछ सोई, कुछ जागी हुयी नींद के बीच
तेरा मासूम चेहरा सिन्दूरी हो जाता है
जो हो सके तो कुछ देर और सोये रहना
मैं आज पूजा के थाल में
दीपक जलाना भूल गया

२)

अपनी हथेली पर
धूप की मखमली चादर लपेटे
तेरे आने का इंतज़ार कर रहा हूँ
नर्म ओस की बूंदों में
अपना एहसास समेटे
तू चुपके से चली आना
अपनी साँसों में भर लूँगा
धुंवा धुंवा होता तेरा एहसास

३)

अपनी तस्वीर आईने में देखी
अपनी तस्वीर में उनकी तस्वीर देखी
उनकी आँखों में छाई उदासी देखी
उनके चेहरे पे ढलती शाम देखी
फिर सोचा................
ये भी क्या तस्सवुर देखी
अपने महबूब की ही ऐसी तस्वीर देखी

शुक्रवार, 8 मई 2009

बारिशों में भीगते छप्पर से जाकर पूछना

गूरू देव पंकज सुबीर जी के आर्शीवाद ने इस ग़ज़ल को निखारा है .......
उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी .......


बेरुखी, शिकवे गिले, बच्चों सा तेरा रूठना
चार दिन इस जिंदगी के हैं नहीं ये भूलना

पंख हैं कोशिश करो उड़ने की उड़ ही जाओगे
छोड़ दो यूं बिल्लियों को देख आंखें मूंदना

था गलत वो कल भी और है आज भी उतना गलत
सिर्फ जाति को बना आधार इन्सां पूजना

क्या हुआ देवालयों में जा न पाये तुम अगर
फूल जो मसले गए उनको उठा कर चूमना

दर्द उनका क्या है जिनके सर पे होती छत नहीं
बारिशों में भीगते छप्पर से जाकर पूछना

जब कभी छाने लगे दिल पर उदासी की घटा
तब किसी बच्चे की खिल खिल में खुशी को ढूंढना

रविवार, 3 मई 2009

कुछ लम्हे...........

१)

जब शब्द गूंगे हो जाएँ
नज़र कुछ बोल न सके
यादों के दरख्त से टूटे लम्हे
वक़्त के साथ ठहर जाएँ
तुम चुपके से मुस्कुरा देना
हवा चल पड़ेगी.....

२)

जब सांझ की लाली
मेरे आँगन में उतर आएगी
वक़्त कुछ पल के लिए
ठिठक जायेगा
तुम्हें जब शाम की सिन्दूरी
छू रही होगी
मैं इक टीका चुरा लूँगा
तेरे सुर्ख होठों से.....

३)

सुबह रात का किवाड़
खटखटाती है
तारों की छाँव में बैठे चांदनी
मुस्कुराती है
ऐ रात की स्याही
कुछ देर ठहर जाना
आज उनसे पहली मुलाक़ात है
कहीं सपना टूट न जाए.....

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

हकीकत

मुरझाये
जीर्ण शीर्ण विकृत
सहमे से चेहरे....
कुछ खोजती हुयी
बीमार पीली पीली आँखे.....
न जाने कब लड़खडा कर
"साईंलेंसर" लगे
गिर जाने वाले कदम........
अँधेरी संकरी गलियों में
छीना झपटी करते हाथ.......
सदियों से लावारिस फुटपाथ पर
धकेल दिए जाते हैं

जिस तरह..........

जन्य शाखाओं से अनभिग्य
सूखे जर्जर पत्ते
सारे शहर से सिमेट कर
अँधेरे घटाटोप कूंवे में
बेतरतीब फैंक दिए जाते हैं
उन्हें कोई गुलदान में
नहीं सजाता
"वनस्पति शास्त्र" की कोपी में
नहीं लगाता
वह केवल जलने की लिए होते हैं.......
मात्र जलने के लिए .......

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

मन में एक अंश भी बजरंग नही

आप नही जिंदगी में रंग नही,
रस नही, खुशी नही, उमंग नही,

आज हैं रूठे तो कल साथ होंगे,
दोस्ती की बात है कोई जंग नही,

प्यार के धागों से बँधा है बंधन,
कट गयी जो डोर तो पतंग नही,

खून के धब्बे हैं वो इंसानियत के,
फर्श पर बिखरा था लाल रंग नही,

इस शहर के रास्ते चौड़े हैं बहुत,
गाँव की पगडंडियाँ भी तंग नही,

राम के आदर्श तो बस नाम के,
मन में एक अंश भी बजरंग नही,

मौत से आगे का सफ़र है यारो,
तन्हा चलो कोई किसी के संग नही,

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

छोड़ जाते छाप

पोंछ दो आंसू किसी के है जो पश्चाताप,
व्यर्थ ही गंगाजली से धो रहे हो पाप,

सामना कैसे करूँगा सोच कर जाता नहीं,
माँ मेरी रोती बहुत है थक चुका है बाप,

यहाँ की हर चीज़ में मीठी सी यादें है बसी,
वो भी माँ का ट्रंक है जो बेच रहे आप,

चाँद की तो दूरियों को नापना आसान है,
बात है दिल की अगर गहराइयों को नाप,

लोग जो निर्माण करते हैं पसीने से डगर,
वक़्त की बंज़र ज़मीं पर छोड़ जाते छाप,

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

क्‍यों नहीं

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ग़ज़ल......प्रस्तुत है आप सब के सामने

ठंडक का चांदनी में है एहसास क्‍यों नहीं,
सूरज में भी तपिश का है आभास क्‍यों नहीं,

गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,

जब साथ में जीवन सखी भी तेरे है वो फिर,
चहूं ओर महकता हुआ मधुमास क्‍यों नहीं,

अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,

बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

पत्‍थर के देवता ने कहा आदमी से ये,
तुझको है धर्म पे भला विश्‍वास क्‍यों नहीं,