सोमवार, 15 जून 2009

शब्द कुछ भटके हुवे

१)

कोहरे से छन कर आती
लैंप पोस्ट की पीली रौशनी तले
पश्मीना की शाल ओढे
गुमसुम
खंभे से सर टिकाये
खामोश बैठी थी वो रात
ठण्ड से कांपती हवा
तेरे होठों को छू कर
गुज़र गयी थी उस रोज़……
बस तभी से दो आंसू
जमें रहते हैं मेरी पलकों में...........

२)

रूई गिर रही थी उस पल
बर्फ की सफ़ेद चादर पर
फ़र की नीली टोपी पहने
तुमने कुछ कहा था जिस पल
हवा में गिरने से पहले
जम गए थे वो शब्द.........
आज भी जाग उठते हैं वो शब्द
बर्फ की सफ़ेद चादर
जब धीरे धीरे पिघलती है........
नया मौसम भी तो अंगडाई लेता है उस पल

गुरुवार, 11 जून 2009

वक़्त से चुराए कुछ पल

1)

काश मैं वक़्त को रोक लेता
तेरी खुश्बू
इन वादियों में बस जाती
इंद्रधनुष के रंगों में
तू झिलमिलाती
मैं इन रंगों को चुरा लेता
ता उम्र तेरे रंगों में रंगे
जीवन बिता देता
काश मैं वक़्त को रोक लेता

2)

सूरज के सो जाने पर
शाम के मुहाने पर
अँधेरे की चादर लपेटे
रात उतरी है तेरे सिरहाने पर
उठा कर रेशमी रजाई
तू मुखडा दिखा देना
सितारे भी बेताब हैं
तेरे पहलू में उतर आने को

3)

अचानक
नीले आकाश पर
काली बदली का छा जाना
मस्ती में झूमती
बूंदों की ताल पर
मयूर का थिरकना
तेज़ हवा के झौंकों में
तितलियों का लरजना
लगता है
दूर तक फैली इन वादियों ने
तेरे क़दमों की आहट सुन ली

शनिवार, 6 जून 2009

तुम

१)

ख़ामोशी को
लग गयी ज़ुबां
बोलती रही
बीते लम्हों की दास्ताँ
कोहरे की चादर लपेटे
गुज़रता रहा कारवाँ

२)

काश मैं वक़्त को रोक पाता
घड़ी की सूइयों को मोड़ पाता
देखता रहता उम्र भर
पूजा की थाली लिए
पलकें झुकाये
गुलाबी साड़ी में लिपटा
सादगी भरा तेरा रूप........

३)

चाँद जब समुन्दर में उतरे
नूर तारों का
लहरों में बिखरे
तुम आसमाँ पर चली आना
रोक लूँगा यूँ ही इस रात को
तुम चाँद बन कर मुस्कुराना
मैंने सुना है इस धरती का
एक ही चाँद है

सोमवार, 1 जून 2009

दर्द

१)

सुर्ख पगडंडी पर
तैरता लावा
रिसते हुवे खून से बनी
तेरे माथे की वो लकीर
जिसके उस पार
उतरने की जद्दोजहद
जिस्म के आखरी कतरे तक
जगनू सी चमकती रहेगी
तेरी मांग

२)

तम्हारे पावँ के छाले
अपनी पलकों में सहेज लूँगा
तेरे दिल पर पढ़े ज़ख्म
दस्ते-नाज़ुकी से उठा लूँगा
तेरे दर्द का सहारा लेकर
तुझी से.................
एक रिश्ता जोड़ लूँगा

३)

तेरे माथे पर उभर आयी
पसीने की बूंदें
तेरी आँखों में उभरता
आंसुओं का सैलाब
हल्के हल्के से आती
सिसकियों की आवाज़
तू चुपके से
मेरी बाहों में सो जाना
धीरे धीरे
मीठे सपनों में खो जाना

गुरुवार, 28 मई 2009

इक नज़्म की इब्तदा

१)

सूखे पत्तों से उठती सिसकियाँ,
मसले हुवे फूलूँ से रिसता दर्द,
बादलों का सीना चीर कर बरसते आंसू,
आज भारी है कुछ मौसम का मिजाज़,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
क्यों हूँ में इतना उदास.........

२)

सूखे होठों पर अटके लफ्ज़,
बिस्तर की सिलवटों पर सिसकती रात,
तेरी कलाई में खनकने को बेताब कंगन,
खामोशी भी करती है जैसे बात,
चिनाब का किनारा भी गाता है हीर,
लगता है इक नज़्म की इब्तदा होगी,
खाली निगाहों से,
तकता है मुझे कोई आज........

शनिवार, 23 मई 2009

बोलते लम्हे ......

१)

अक्सर देखा है तुझे
खुले आसमान के नीचे
हथेली में सजाते बारिश की रिमझिम बूँदें.......
तेरे ख़्वाबों से झिलमिलाती
तेरे एहसास से भीगी वो बूँदें
पलकों पर सजा लूँगा
धीरे धीरे देखूंगा.............
पूरा होता तेरा ख्वाब........

२)

गीले बालों से टपकती बूँदें
सख्त खुरदरी हथेली पर
जैसे सफ़ेद मोती
गिर रहे हों ज़मीं पर
कोंपलें सरसों की
धीरे धीरे उग रही हैं
बसंत होता मौसम
छेड़ देता है मन के तार
नाच उठता है मन मयूर......
शायद किसी मासूम एहसास ने
करवट बदली है आज .........

३)

चिडियों का चहचहाना
बरखा का टिप टिपाना
पवन का खिल खिलाना
सूखे पत्तों की सरसराहट
तेरे चेहरे की मुस्कराहट
फिर तेरे आने की आहट
वो देखो...
श्रृष्टि ने अभी अभी ...
मेरी कविता का सृजन किया ...

सोमवार, 18 मई 2009

लम्हों की जुबां

१)

चीर कर बादल का किनारा,
चांदनी जब छाने लगेगी,
सरसराती हवा मस्ती में गाने लगेगी,
मुस्कुराती रात,
सर्दी का कम्बल लपेटे,
जब तेरे सिरहाने उतर आएगी,
तू मेरी बाहों में समा जाना,
अलाव खुद -बा-खुद जल उठेंगे.

२)

किसी की बेरुखी,
तू दिल पर न लेना,
बस इतना सोच लेना,
वक़्त हर घाव की दवा है...
अपनी आँखों में उठता समुन्दर,
पलकों के मुहाने ही रोक लेना,
कतरा कतरा मैं पीता रहूँगा,
तेरी प्यास में मैं जीता रहूँगा.

३)

थम गयी है हवा,
ठिठक गयी कायनात,
क्यूँ न नीले आसमान की चादर पर सजे,
बादल के सफ़ेद फूल,
फूंक मार कर उड़ा दूं........
या हलके से गुदगुदी कर,
तुझे हंसा दूं.......
बादलों के बदलते रूप में,
तेरा उदास चेहरा,
अच्छा नहीं लगता........
जब तू खिलखिला कर हंस पड़ेगी,
ये हवा चल पड़ेगी,
बादल भी बदलने लगेगा अपना रूप,
अटकी हुई कायनात,
खुद-बा-खुद चल पड़ेगी.

बुधवार, 13 मई 2009

मासूम एहसास

१)

खिड़की के सुराख से निकल
भोर की पहली किरन
चुपके से तेरे करीब आ जाती है
कुछ सोई, कुछ जागी हुयी नींद के बीच
तेरा मासूम चेहरा सिन्दूरी हो जाता है
जो हो सके तो कुछ देर और सोये रहना
मैं आज पूजा के थाल में
दीपक जलाना भूल गया

२)

अपनी हथेली पर
धूप की मखमली चादर लपेटे
तेरे आने का इंतज़ार कर रहा हूँ
नर्म ओस की बूंदों में
अपना एहसास समेटे
तू चुपके से चली आना
अपनी साँसों में भर लूँगा
धुंवा धुंवा होता तेरा एहसास

३)

अपनी तस्वीर आईने में देखी
अपनी तस्वीर में उनकी तस्वीर देखी
उनकी आँखों में छाई उदासी देखी
उनके चेहरे पे ढलती शाम देखी
फिर सोचा................
ये भी क्या तस्सवुर देखी
अपने महबूब की ही ऐसी तस्वीर देखी

शुक्रवार, 8 मई 2009

बारिशों में भीगते छप्पर से जाकर पूछना

गूरू देव पंकज सुबीर जी के आर्शीवाद ने इस ग़ज़ल को निखारा है .......
उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी .......


बेरुखी, शिकवे गिले, बच्चों सा तेरा रूठना
चार दिन इस जिंदगी के हैं नहीं ये भूलना

पंख हैं कोशिश करो उड़ने की उड़ ही जाओगे
छोड़ दो यूं बिल्लियों को देख आंखें मूंदना

था गलत वो कल भी और है आज भी उतना गलत
सिर्फ जाति को बना आधार इन्सां पूजना

क्या हुआ देवालयों में जा न पाये तुम अगर
फूल जो मसले गए उनको उठा कर चूमना

दर्द उनका क्या है जिनके सर पे होती छत नहीं
बारिशों में भीगते छप्पर से जाकर पूछना

जब कभी छाने लगे दिल पर उदासी की घटा
तब किसी बच्चे की खिल खिल में खुशी को ढूंढना

रविवार, 3 मई 2009

कुछ लम्हे...........

१)

जब शब्द गूंगे हो जाएँ
नज़र कुछ बोल न सके
यादों के दरख्त से टूटे लम्हे
वक़्त के साथ ठहर जाएँ
तुम चुपके से मुस्कुरा देना
हवा चल पड़ेगी.....

२)

जब सांझ की लाली
मेरे आँगन में उतर आएगी
वक़्त कुछ पल के लिए
ठिठक जायेगा
तुम्हें जब शाम की सिन्दूरी
छू रही होगी
मैं इक टीका चुरा लूँगा
तेरे सुर्ख होठों से.....

३)

सुबह रात का किवाड़
खटखटाती है
तारों की छाँव में बैठे चांदनी
मुस्कुराती है
ऐ रात की स्याही
कुछ देर ठहर जाना
आज उनसे पहली मुलाक़ात है
कहीं सपना टूट न जाए.....