गुरुवार, 20 अगस्त 2009

छोड़ कर मैं आ गया कुछ बोल तेरे द्वार पर

शनिवार से एक हफ्ते की छुट्टी ............ ब्लोगिंग से दूर, दुबई की जलती गर्मी से भी दूर, वतन की भीनी भीनी खुशबू का आनंद लेते. तब तक के लिए ये ग़ज़ल आप सब की नज़र ..............

आरजू वादे, वफ़ा, जुस्तजू और प्यार पर
कितने अफ़साने बने हैं इक निगाहें यार पर

पार कर लेगा तमाम ज़िन्दगी की अड़चनें
रात दिन चलता रहा जो चाकुओं कि धार पर

मोर फिर नाचा नहीं न प्यास धरती की बुझी
झूम कर बादल मगर इतरा रहा बौछार पर

जा बसा बेटा शहर तो कमर फिर झुकने लगी
आ गया फिर बोझ पूरे घर का इस दीवार पर

गीत बन कर महक उठेंगे जो कि तुमने स्वर दिये
छोड़ कर मैं आ गया कुछ बोल तेरे द्वार पर

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

यादों की नागफनी

उग आये हैं
समय की नागफनी पर
याद के कांटे
नोचने के अनवरत प्रयास में
चुभता हैं दंश
बीती बातों का
पूनम की रातों का
गुज़रे मधुमास का
अनबुझी प्यास का
लहुलुहान हाथों के
रिस्ते खून के साथ
बहा देना चाहता हूँ
तेरी यादों का जंगल
हमेशा हमेशा के लिए

पर ये नागफनी
सूख कर गिरती भी तो नहीं

सोमवार, 10 अगस्त 2009

कृष्ण देखें आज किसके पक्ष है

लाल रंग से रंगा हर कक्ष है
एक सत्ता दूसरा विपक्ष है

न्याय की कुर्सी पे है बैठा हुवा
शक्ति उसके हाथ में प्रत्यक्ष है

चापलूसी भी तो आनी चाहिए
क्या हुवा जो कार्य में वो दक्ष है

आज सब कैदी रिहा हो जायेंगे
छल कपट ही आज का अध्यक्ष है

आज भी शकुनी का पक्ष है भारी
गया द्वापर प्रश्न फिर भी यक्ष है

धर्म के बदले हुवे हैं मायने
कृष्ण देखें आज किसके पक्ष है

शनिवार, 1 अगस्त 2009

क्या ये प्रेम है.......

1)

लहरों की चाहत ..........
चाँद को पाने की अल्हड़ सी होड़
पल भर में जीवन जीने की प्यास
उश्रंखल प्रेम का उन्मुक्त उल्लास.......
अपने उन्माद में खो जाने का चाह
दूर क्षितिज पर डूबते चाँद के साथ
अपने वजूद को मिटा देने की जंग
कृष्न में समा कर
कृष्णमय हो जाने की उमंग........

प्रेम ही तो मुक्ति का मार्ग है.........

2)

समय की दराज से
छिटक कर गिर गए
कुछ लम्हे ........
बाकी है
अभी भी उन लम्हों में......
सांस लेती चिंगारियां
बुदबुदाते अस्फुट शब्द ......
अटकती साँसें
महकता एहसास ........
सादगी भरा
पलकें झुकाए
पूजा की थाली लिए
गुलाबी साड़ी में लिपटा
तेरा रूप...........
और भी बाकी है बहुत कुछ
उन जागते लम्हों में ........

वो कहानी फिर कभी ........

रविवार, 26 जुलाई 2009

भोर का स्पंदन....

आलिंगन को व्याकुल
अलसाई सी रात
सिन्दूरी कम्बल ओढे
आ रहा प्रभात ........
प्रकाश में समां जाने का उन्माद
अस्तित्व खो देने की चाह
छाने लगे हैं देखो
प्रकृति के अद्भुद रंग
प्रारंभ होता है
साँसों का इक प्रवाह ......
चिडियों का चहचहाना
भंवरों का गुनगुनाना
लहरों का ठहर जाना
बेताब तितलियों का
आँगन में खिलखिलाना ......
चलने लगी है श्रृष्टि
सुबह की पगली किरण
उतर आई है तेरे सिरहाने
आ मिल कर करें
नव रश्मि का अभिनंदन
वो आ रहा है देखो
भोर का स्पंदन.........

सोमवार, 20 जुलाई 2009

चाहत

महसूस किया है
झुर्मुट की आड़ से
पीले समुंद्र के उस पार से
कोई तो गुज़रा है
इस रेत के पहाड़ से
ताज़ा है अभी
कुछ कदमों की आहट
रेत के समुंदर में
उड़ रही है चाहत
वो चाँद है पूनम का
या खुश्बू तेरे एहसास की
जन्म-जन्मांतर की प्यास है
या बात है इक रात की
सोच लेंगे कभी फ़ुर्सत में
अभी तो जी लेने दो ये लम्हा

सोमवार, 13 जुलाई 2009

मौन आमंत्रण

1)

पूनम का चाँद
तुम्हें पा लेने का
मौन आमंत्रण
उष्रंखल होती मुक्त लहरें
तुझमे समा जाने का पागलपन
किनारों से टूट कर बिखरने का उन्माद
अपने अस्तित्व को खो देने की चाहत

पानी की बिखरी बूँदों में
मेरा अक्स चमकने लगा है

2)

तपती दोपहरी
पिघलता रेगिस्तान
पानी की स्याही से
रेत पर लिखा
मौन आमंत्रण
कतरा कतरा जागती प्यास
तू करीब हो कर भी कितना दूर
दहकती रेत पर
उतरने लगी है सुरमई चादर

आ दो पल बिता लें
जुदा होने से पहले

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

अनबुझी प्यास

1)

अचानक बोलते हुवे
तेरा रुक जाना
दांतों में दुपट्टा दबाये
हौले हौले दीवार खुरचते
मेरी आगोश में सिमिट आना
मेरा पूर्ण से सम्पूर्ण हो जाना
सत्य शिवम् में खो जाना
देखो .................
प्रेम के उन्मुक्त गगन में
इन्द्रधनुष के रंग बिखर आये हैं

2)

नीले सागर के साथ
मीलों चलता रेत का सागर
किनारे तोड़ कर आती
उन्मुक्त सागर की लहरें
सूखी रेत को लील लेने की
अनबुझी प्यास
लहरों के नर्तन में
शामिल है शायद
मेरी अनंत चाहत का जवाब

रविवार, 28 जून 2009

महकता एहसास

1)

शब्द जब गूंगे हो जाए
सांस कुछ कहने लगे
चाँद की ओटक से निकल
काली रात सरकने लगे
गुनगुनाती हवा नए साज़ छेड़े
तू चली आये
रात रानी की खुशबू का आँचल ओड़े
तेरी नर्म हथेली
अपने हाथों में लेकर
मैं मुंह छुपा लूँगा.....
तेरे हाथ की रेखाओं में
हमेशा के लिए बस जाऊँगा

2)

जब कभी
स्याह चादर लपेटे
ये कायनात सो जाएगी
दूर से आती
लालटेन की पीली रौशनी
जागते रहो का अलाप छेड़ेगी
दो मासूम आँखें
दरवाज़े की सांकल खोल
किसी के इंतज़ार में
अंधेरा चूम लेंगी
जैसे क्षितिज पर चूम लेते हैं
बादल ज़मीन को
वक़्त उस वक़्त ठहर जाएगा

शनिवार, 20 जून 2009

रिसने लगी रोशनी है आफताब से

बहुत दिनों तक प्रेम के उन्मुक्त सागर में डुबकियां लगाते छंद-मुक्त रचनाओं में खो गया था......लीजिये आज फिर से पेश है ग़ज़ल आप सब की नज़र जो आदरणीय पंकज जी के आर्शीवाद से सजी, संवरी है.........


गंध सी झरने लगी है माहताब से,
पंखुरी क्या तोड़ ली तुमने गुलाब से

शाम का सिंदूर राह पर बिखर गया
रिसने लगी रोशनी है आफताब से

कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से

फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से