रविवार, 27 दिसंबर 2009

असल के नेता मगर खुरचन हुए

गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से खिली ग़ज़ल आपकी नज़र है .......... आशा है आपको पसंद आएगी .....


नेह के संबंध जब बंधन हुए
मन के उपवन झूम के मधुबन हुए

लक्ष्य ही रहता है दृष्टि में जहाँ
वक्‍त के हाथों वही कुंदन हुए

प्रेम की भाषा से जो अंजान हैं
जिंदगी में वो सदा निर्धन हुए

सत्य बोलो सत्य की भाषा सुनो
तब समझना आज तुम दर्पण हुए

किसके हाथों देश की पतवार है
गूंगे बहरे न्‍याय के आसन हुए

हैं मलाई खा रहे खादी पहन
असल के नेता मगर खुरचन हुए

रविवार, 20 दिसंबर 2009

जितनी चादर पाँव पसारो

अपना जीवन आप संवारो
जितनी चादर पाँव पसारो

हार गये तो कल जीतोगे
मन से अपने तुम न हारो

आशा के चप्पू को थामो
दरिया में फिर नाव उतारो

काँटों को हंस कर स्वीकारो
दूजे का न ताज निहारो

स्वर्ग बनाना है जो घर को
अपना आँगन आप बुहारो

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

छोड़ कर भविष्य को इतिहास पकड़ा है

बासी रोटी प्याज़ उसके पास पकड़ा है
सूना सूना दिल मगर उदास पकड़ा है

जेब में थे क़हक़हे, किस्से, कहानी
होठों पर महका हुवा परिहास पकड़ा है

कौन सी धारा लगेगी तुम बताओ
टूटी लाठी, फटा हुवा लिबास पकड़ा है

बस किताबों में ही मिलती हैं मिसालें
बोलो किसने आज़ तक आकाश पकड़ा है

सभ्यता कैसे वो आगे बढ़ सकेगी
छोड़ कर भविष्य को इतिहास पकड़ा है

पार है वो दम है जिसकी बाज़ुओं में
वो नही जिसने फकत विश्वास पकड़ा है

रविवार, 6 दिसंबर 2009

हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

आस्था विशवास का विस्तार क्यों नहीं
आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं

भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

सत्य ही कहता है आईना हमेशा
आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

सोमवार, 30 नवंबर 2009

न्याय की आशा यहाँ परिहास है

इस व्यवस्था पर नहीं विशवास है
न्याय की आशा यहाँ परिहास है

कल जहां दंगा हुवा था नगर में
गिद्ध चील पुलिस का निवास है

बस उसी का नाम है इस जगत में
अर्थ शक्ति का जहां विकास है

समझ में आया हुई बेटी विदा जब
घर का आँगन क्यों हुवा उदास है

आपके होठों पर इक निश्छल हंसी हो
बस यही इस ग़ज़ल का प्रयास है

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

आस्था आदर्श पर ...

जगमगाती रौशनी और शहर के आकर्ष पर
बन गए कितने फ़साने जुस्तजू संघर्ष पर

छू लिया क्यों आसमान सड़क पर रहते हुवे
उठ रही हैं उंगलियाँ उस शख्स के उत्कर्ष पर

मर गया बेनाम ही जो उम्र भर जीता रहा
सत्य निष्ठां न्याय नियम आस्था आदर्श पर

बन गयीं हवेलियाँ टूटी थि कल बस्ती जहां
खून के धब्बे नज़र आयेंगे उनके फर्श पर

गर्दनें टूटी हुयी उन पंछियों की मिल गयीं
पंख को तोले बिना जो उड़ रहे थे अर्श पर

गावं क्या खाली हुवे, ग्रहण सा लगने लगा
बाजरा, मक्की, गेहूं की बालियों के हर्ष पर

सोमवार, 16 नवंबर 2009

देश का बदला हुवा वातावरण है

एक बार फिर से हिन्दी में ग़ज़ल कहने का प्रयास है ....गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद ने इसको संवारा है .... आपके स्नेह, सुझाव और आशीर्वाद की आकांक्षा है .......

आज प्रतिदिन सत्य का होता हरण है
देश का बदला हुवा वातावरण है

काश मन से भी वो होते साफ़ सुथरे
जिनके तन पर साफ़ सुथरा आवरण है

बस गयी बारूद की खुशबू हवा में
इस तरह से सड़ चुका पर्यावरण है

भूख से वो उम्र भर लड़ता रहेगा
जिसने ढूंढा ताल छंद और व्‍याकरण है

हैं मेरे भी मित्र क्या तुमको बताऊँ
सांप से ज्यादा विषैला आचरण है

प्रेम के दो बोल हैं सपनों की बातें
विष में डूबा आज हर अन्तःकरण है

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

बिखरे शब्द ......

१)

तुम तक पहुँचने से पहले
कुछ अन्जाने शब्द
बिखर गये थे तुम्हारे रास्ते
अनदेखा कर शब्दों की चाहत
मसल दिए तुमने
उनके अर्थ, उनकी अभिव्यक्ति
उनकी चाहत, मौन अनुरक्ति
शब्दों का उमड़ता सैलाब
अब समुन्दर हो गया है
बिखरने को बेताब शब्द
अश्वथामा हो गए हैं
भटक रहे हैं तेरी तलाश में
दर बदर

सुना है द्वापर तो चला गया
कहीं कलयुग भी न गुज़र जाए .......

२)

कुरेद रहा हूँ
दिल में दबी
मुहब्बत की राख
सुना है
राख के ढेर में
चिंगारी दबी रहती है .......

बुधवार, 4 नवंबर 2009

प्रेम का अनुबंध है विनिमय तो होना चाहिए

हिंदी में एक ग़ज़ल कहने का प्रयास है ...... मीटर की ग़लतियों को गुरुदेव पंकज सुबीर जी ने ठीक कर दिया है ........ और एक बात आज पहली बार शाबासी भी मिली है गुरुदेव से इस ग़ज़ल की बहर पर ......

साथ है जो आपका सुखमय तो होना चाहिए
प्रेम का अनुबंध है विनिमय तो होना चाहिए

मैं कोई विचलित नहीं हूँ आपके संपर्क से
उम्र भर के साथ का निश्चय तो होना चाहिए

है भरत सक्षम चलाने के लिये शासन, मगर
राम के वनवास का निर्णय तो होना चाहिए

है ये नाटक जिंदगी का मंच पर संसार के
पात्र मिलते हैं मगर अभिनय तो होना चाहिए

जोश बस काफी नहीं है लक्ष्य पाने के लिए
राह से कुछ आपका परिचय तो होना चाहिये

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

प्रेम की ये कैसी इब्तदा

कभी कभी बातों ही बातों में मन के आस पास उमड़ते घुमड़ते अनजाने कुछ शब्द, कोई कल्पना या रचना का रूप ले लेते हैं ..... प्रस्तुत है ऐसी ही एक रचना जो अनजाने ही उग आयी मन के आँगन में ..........


खूब है मासूम सी अदा
बोलती आँखें यदा कदा

होठ से तेरे जो निकले
गीत मैं गाता रहूँ सदा

स्पर्श से महका जो तेरे
खिल रहा वो फूल सर्वदा

ग्वाल में राधा तू मेरी
बांसुरी बजती यदा यदा

हाथ में सरसों खिली है
प्रेम की ये कैसी इब्तदा

मेघ धरती अगन वायु
कायनात तेरी सम्पदा

हूँ पथिक विश्राम कैसा
आपसे लेता हूँ मैं विदा