गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बुढ़ापा - एक दृष्टि-कोण

मेरी रचना "बुढ़ापा" पर सभी मित्रों की टिप्पणी पढ़ कर अभिभूत हूँ ... जहाँ एक और रचना को सभी ने सराहा वहीं मुझे ये आभास भी हुवा की कहीं ना कहीं मेरी रचना एक नकारात्मक पहलू को इंगित कर रही है. सभी टिप्पणियों और विशेष कर आदरणीय महावीर जी की समीक्षा और उनकी लिखी ग़ज़ल ने मुझे प्रेरित किया की मैं बुढ़ापे को इक नये दृष्टि-कोण से देखूं.
आशा है इस नयी रचना में आपको ज़रूर सकारात्मक पहलू नज़र आएगा.


उम्र का मंथन
तज़ुरबों की ख़ान
समय के पन्नों पर लिखा
अनुभव का ग्रंथ

चेहरे की झुर्रियों में उगे
मील के पत्थर
हाथों की उर्वरा से उगे
अनगिनत भविष्य

यज्ञ जीवन
अनंत का निर्माण
जीवन की संध्या
स्वयं का निर्वाण

श्रीष्टि का नियम
प्रेयसी की प्रतीक्षा
मौत का आलिंगन
देह का त्याग

यही तो प्रारंभ है
आत्मा परमात्मा के मिलन का
नये युग के प्रवाह का

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बुढ़ापा

जिस्म पर रेंगती
चीटियाँ की सुगबुगाहट
वक़्त के हाथों लाहुलुहान शरीर
खोखले जिस्म को घसीटते
दीमक के काफिले

शारीरिक दर्द से परे
मुद्दतो की नींद से उठा
म्रत्प्राय जिस्म का जागृत मन

दिमाग़ के सन्नाटे में
चीखती आवाज़ों का शोर
उफन कर आती यादों का झंझावात
अचेतन शरीर की आँख से निकलते
पानी के बेरंग कतरे
साँसों का अनवरत सिलसिला
जीने की मजबूरी

हाथ भर दूरी पे पड़ा
इच्छा मृत्यु का वरदान
धीरे धीरे मुस्कुराता है ...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

नज़्म मेरी

कई बार गिरी
कई बार उठी

शब्दों के
हाथों से निकली
चिंदी चिंदी
हवा में बिखरी
पहलू में
कई बार रुकी

नज़्म मेरी

मुझे मेरी नज़्म ने कहा

मैं तेरे सामने
ज़िंदा खड़ी हूँ
जिस्म की खुश्बू में लिपटी
साँस लेती
बात करती

तू काहे
ढूंढता है मुझे
काग़ज़ के पुराने पन्नों में

रविवार, 4 अप्रैल 2010

कैसा भविष्य ..

बेरहम वक़्त
जीवन की डोर
लंबी कतार
मरीज़ों का शोर

प्रसूता कक्ष से आती
साँसों की सुगबुगाहट
मुनिया की आँखों में
भविष्य की आहट

जीवन का खेल
किरण की आशा
हल्का सा डर
कुछ कुछ निराशा
अटकी साँसें
कल के सपने

प्रतीक्षा और प्रसूता कक्ष के बीच
सदियों का फांसला

मटमैला
फटा पाजामा पहने
मुनिया का पति

कुछ लम्हे को अटका वक़्त
निस्तब्धता का शोर

अचानक
लंबी चीख के साथ गूँजती बच्चे की आवाज़
करवट बदलती श्रीष्टि
समय की अंगड़ाई
साँसों का प्रवाह
नयी सुबह की आहट

भड़भड़ा कर खुलते दरवाजे की चरमराहट की बीच
सफेद चादर में लिपटा मुनिया का बेजान शरीर
साथ ही गुलाबी चोला पहने
खिलखिलाता बचपन

साँसों के बदले
साँसों का सौदा

भविष्य की चाह में
वर्तमान से टूटा नाता

बाहर लगा मुस्कुराता होर्डिंग
बच्चे - हमारे आने वाले कल का भविष्य ....

सोमवार, 29 मार्च 2010

जीवन

खोखले नियम
रिश्तों का बोझ

लड़के कि चाह
परंपरा का निर्वाह

जनम से मृत्यु तक
पुरुष की पनाह

ता-उम्र
टोका-टोकी का
सतत प्रवाह

जाने कब
लाल जोड़े का रंग
पिघल आता है
मासूम जिस्म पर

बदल जाता है
खामोश लिबास
शफ्फाक
सफेद कफ़न में

ग्रामोफ़ोने पर बजता है गीत
मैं तो भूल चली बाबुल का देस
पिया का घर प्यारा लगे ....

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सोदा

विकसित होने से पहले
कुचल जाते हैं
कुछ शब्दों के भ्रूण

बाहर आने से पहले
फँस जाते हैं होठों के बीच
कुछ जवाब

द्वंद में उलझ कर
दम तोड़ देते हैं
कुछ विचार

हथेलियों में दबे दबे
पिघल जाता है आक्रोश

पेट की आग
जिस्म की जलन
उम्मीद का झुनझुना
मौत का डर
मुक्ति की आशा
अधूरे स्वप्न
जीने की चाह
कुछ खुला गगन

पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
गिनती की साँसें के बदले
सोदा बुरा तो नही ......

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

गुबार

कुछ अनसुलझे सवाल
कुछ हसीन लम्हे
जिस्म में उगी
आवारा ख्वाबों की
भटकती नागफनी

कितना कुछ
एक ही साँस में कहने को
भटकते शब्द

डिक्शनरी के पन्नों की
फड़फड़ाहट के बीच
कुछ नये मायने तलाशते
बाहर आने की छटपटाहट में
अटके शब्द

एक मुद्दत से
होठों के मुहाने
पलते शब्द

तेरे आने का लंबा इंतज़ार

फिर अचानक
तू आ गयी इतने करीब
मुद्दत से होठों के मुहाने
पलते शब्द
फँस कर रह गये
होठों के बीच

वो मायने
जिन्हे शब्दों ने
नये अर्थ में ढाला

आँखों की उदासी ने
चुपचाप कह डाला

सुना है

आँखों की ज़ुबान होती है.....

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

ख्वाबों के पेड़ ...

मेरे जिस्म की
रेतीली बंजर ज़मीन पर
ख्वाब के कुछ पेड़ उग आए हैं
बसंत भी दे रहा दस्तक
चाहत के फूल मुस्कुराए हैं

भटक रहे हैं कुछ लम्हे
तेरी ज़मीन की तलाश में
बिखर गये हैं शब्दों के बौर
तेरे लबों की प्यास में

अब हर साल शब्दों के
कुछ नये पेड़ उग आते हैं
नये मायनों में ढल कर
रेगिस्तान में जगमगाते हैं

अभिव्यक्ति की खुश्बू को
बरसों से तेरी प्रतीक्षा है

सुना है बरगद का पेड़
सालों साल जीता है ....

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

चाहत

चाहत
इक मधुर एहसास
पाने की नही
मुक्ति की प्यास

स्वयं को सुनाई देता
मौन स्पंदन
सीमाओं में बँधा
मुक्त बंधन

अनंत संवाद
प्रकृति से छलकता
विमुक्त आह्लाद
श्रिष्टी में गूँजता
अनहद नाद
अंतस से निकला
शाश्वत राग

अर्थ से परे
अभिव्यक्ति से आगे

क्या संभव है शब्दों में
प्रेम समेट पाना

क्या संभव है प्रेम को
भाषा में व्यक्त कर पाना

क्या संभव है अभिव्यक्ति को
सही शब्द दे पाना

क्या संभव है
चाहत के विस्त्रत आकाश को
शब्दों में बाँध पाना

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

कैसे जीवन बीतेगा

राशन नही मिलेगा भाषन
पीने को कोरा आश्वासन
नारों की बरसात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

भीख मांगती भरी जवानी
नही बचा आँखों का पानी
बेशर्मी से बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

जातिवाद का जहर घोलते
राष्ट्र वेदी पर स्वार्थ तोलते
अपनो का प्रतिघात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

आदर्शों की बात पुरानी
संस्कार बस एक कहानी
मानवता पर घात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

नियम खोखले, तोड़े हैं दम
मैं ही मैं है, नही बचा हम
निज के हित की बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा