गुरुवार, 27 मई 2010

न पनघट न झूले न पीपल के साए

कुछ समय पहले गुरुदेव पंकज सुबीर जी के तरही मुशायरे में मेरी इस ग़ज़ल को सभी ने बहुत प्यार दिया ..... पेश है ये ग़ज़ल कुछ नये शेरों के साथ .....

न पनघट न झूले न पीपल के साए
शहर काँच पत्थर के किसने बनाए

मैं तन्हा बहुत ज़िंदगी के सफ़र में
न साथी न सपने न यादों के साए

वो ढाबे की रोटी वही दाल तड़का
कभी तो सड़क के किनारे खिलाए

वो तख़्ती पे लिख कर पहाड़ों को रटना
नही भूल पाता कभी वो भुलाए

वो अम्मा की गोदी, वो बापू का कंधा
मेरा बचपना भी कभी लौट आए

मैं बरसों से सोया नही नींद गहरी
वही माँ की लोरी कोई गुनगुनाए

मेरे घर के आँगन में आया है मुन्ना
न दादी न नानी जो घुट्टी पिलाए

सुदामा हूँ मैं और सर्दी का मौसम
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

अब कुछ नये शेर ....

मुझे है प्रतिक्षा उन पैगंबरों की
ह्रदय से ह्रदय की जो दूरी मिटाए

जो छेड़ा है कुदरत का क़ानून तुमने
खुदा के क़हर से खुदा ही बचाए

वो पूजा की थाली लिए सादगी सी
खड़ी है प्रतिक्षा में पलकें झुकाए

समर्पण समर्पण जहाँ बस समर्पण
प्रणय का दिया फिर वहीं मुस्कुराए

गुरुवार, 20 मई 2010

प्रगति

कुछ नही बदला
टूटा फर्श
छिली दीवारें
चरमराते दरवाजे
सिसकते बिस्तर
जिस्म की गंध में घुली
फ़र्नैल की खुश्बू
चालिस वाट की रोशनी में दमकते
पीले जर्जर शरीर

लंबी क़तारों से जूझता
चीखती चिल्लाती आवाज़ों के बीच
साँसों का खेल खेलता
पुराना
सरकारी अस्पताल का
जच्चा बच्चा
वार्ड नंबर दो
जहाँ मैने भी कभी
पहली साँस ली

अस्पताल के बाहर
मुँह चिड़ाता होर्डिंग
हमारा देश - प्रगति के पथ पर

सोमवार, 10 मई 2010

बंधुआ भविष्य

जिस्म ढकने को मुट्ठी भर शर्म
बंद आकाश का खुला गगन
साँस भर हवा
भूख का अधूरापन

नसों में दौड़ती
देसी महुए की वहशी गंध
दूर से आती
चंद सिक्कों की खनक

हाथ की खुरदरी रेखाओं से निकला
सुनहरा भविष्य

गूंगे झुनझुने की तरह
साम्यवादी शोर में बजता
बहरे समाजवाद को सुनाता
प्रजातंत्र की आँखों के सामने
पूंजीवाद की तिज़ोरी में बंद

या यूँ कहिए
सुरक्षित है

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

पहली मुलाकात ...

काम के सिलसिले में आने वाला सप्ताह ब्लॉग-जगत से दूर रहूँगा ...... जाते जाते ये कविता आपके सुपुर्द है ...

सुनो
क्या याद है तुम्हे
पहली मुलाकात
पलकें झुकाए
दबी दबी हँसी
छलकने को बेताब

वो अल्हड़ लम्हे
भीगा एहसास
हाथों में हाथ लिए
घंटों ठहरा वक़्त
उनिंदी रातें
कहने को
अनगिनत बातें

दिल की बंज़र ज़मीन पर
नाख़ून से बने कुछ निशान
कोरे केनवस पर खिंची
आडी तिरछी रेखाओं के ज़ख़्म

आज भी ताज़ा है नमी
खून से रिसती लकीरों में
जिंदा है तेरे हाथों की खुश्बू
धमनियों में दौड़ते खून में

तेरी यादें मकसद हैं
मेरे जीने की चाह का
तेरा एहसास उर्जा है
मेरी साँसों के प्रवाह का

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बुढ़ापा - एक दृष्टि-कोण

मेरी रचना "बुढ़ापा" पर सभी मित्रों की टिप्पणी पढ़ कर अभिभूत हूँ ... जहाँ एक और रचना को सभी ने सराहा वहीं मुझे ये आभास भी हुवा की कहीं ना कहीं मेरी रचना एक नकारात्मक पहलू को इंगित कर रही है. सभी टिप्पणियों और विशेष कर आदरणीय महावीर जी की समीक्षा और उनकी लिखी ग़ज़ल ने मुझे प्रेरित किया की मैं बुढ़ापे को इक नये दृष्टि-कोण से देखूं.
आशा है इस नयी रचना में आपको ज़रूर सकारात्मक पहलू नज़र आएगा.


उम्र का मंथन
तज़ुरबों की ख़ान
समय के पन्नों पर लिखा
अनुभव का ग्रंथ

चेहरे की झुर्रियों में उगे
मील के पत्थर
हाथों की उर्वरा से उगे
अनगिनत भविष्य

यज्ञ जीवन
अनंत का निर्माण
जीवन की संध्या
स्वयं का निर्वाण

श्रीष्टि का नियम
प्रेयसी की प्रतीक्षा
मौत का आलिंगन
देह का त्याग

यही तो प्रारंभ है
आत्मा परमात्मा के मिलन का
नये युग के प्रवाह का

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बुढ़ापा

जिस्म पर रेंगती
चीटियाँ की सुगबुगाहट
वक़्त के हाथों लाहुलुहान शरीर
खोखले जिस्म को घसीटते
दीमक के काफिले

शारीरिक दर्द से परे
मुद्दतो की नींद से उठा
म्रत्प्राय जिस्म का जागृत मन

दिमाग़ के सन्नाटे में
चीखती आवाज़ों का शोर
उफन कर आती यादों का झंझावात
अचेतन शरीर की आँख से निकलते
पानी के बेरंग कतरे
साँसों का अनवरत सिलसिला
जीने की मजबूरी

हाथ भर दूरी पे पड़ा
इच्छा मृत्यु का वरदान
धीरे धीरे मुस्कुराता है ...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

नज़्म मेरी

कई बार गिरी
कई बार उठी

शब्दों के
हाथों से निकली
चिंदी चिंदी
हवा में बिखरी
पहलू में
कई बार रुकी

नज़्म मेरी

मुझे मेरी नज़्म ने कहा

मैं तेरे सामने
ज़िंदा खड़ी हूँ
जिस्म की खुश्बू में लिपटी
साँस लेती
बात करती

तू काहे
ढूंढता है मुझे
काग़ज़ के पुराने पन्नों में

रविवार, 4 अप्रैल 2010

कैसा भविष्य ..

बेरहम वक़्त
जीवन की डोर
लंबी कतार
मरीज़ों का शोर

प्रसूता कक्ष से आती
साँसों की सुगबुगाहट
मुनिया की आँखों में
भविष्य की आहट

जीवन का खेल
किरण की आशा
हल्का सा डर
कुछ कुछ निराशा
अटकी साँसें
कल के सपने

प्रतीक्षा और प्रसूता कक्ष के बीच
सदियों का फांसला

मटमैला
फटा पाजामा पहने
मुनिया का पति

कुछ लम्हे को अटका वक़्त
निस्तब्धता का शोर

अचानक
लंबी चीख के साथ गूँजती बच्चे की आवाज़
करवट बदलती श्रीष्टि
समय की अंगड़ाई
साँसों का प्रवाह
नयी सुबह की आहट

भड़भड़ा कर खुलते दरवाजे की चरमराहट की बीच
सफेद चादर में लिपटा मुनिया का बेजान शरीर
साथ ही गुलाबी चोला पहने
खिलखिलाता बचपन

साँसों के बदले
साँसों का सौदा

भविष्य की चाह में
वर्तमान से टूटा नाता

बाहर लगा मुस्कुराता होर्डिंग
बच्चे - हमारे आने वाले कल का भविष्य ....

सोमवार, 29 मार्च 2010

जीवन

खोखले नियम
रिश्तों का बोझ

लड़के कि चाह
परंपरा का निर्वाह

जनम से मृत्यु तक
पुरुष की पनाह

ता-उम्र
टोका-टोकी का
सतत प्रवाह

जाने कब
लाल जोड़े का रंग
पिघल आता है
मासूम जिस्म पर

बदल जाता है
खामोश लिबास
शफ्फाक
सफेद कफ़न में

ग्रामोफ़ोने पर बजता है गीत
मैं तो भूल चली बाबुल का देस
पिया का घर प्यारा लगे ....

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सोदा

विकसित होने से पहले
कुचल जाते हैं
कुछ शब्दों के भ्रूण

बाहर आने से पहले
फँस जाते हैं होठों के बीच
कुछ जवाब

द्वंद में उलझ कर
दम तोड़ देते हैं
कुछ विचार

हथेलियों में दबे दबे
पिघल जाता है आक्रोश

पेट की आग
जिस्म की जलन
उम्मीद का झुनझुना
मौत का डर
मुक्ति की आशा
अधूरे स्वप्न
जीने की चाह
कुछ खुला गगन

पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
गिनती की साँसें के बदले
सोदा बुरा तो नही ......