बुधवार, 23 जून 2010

यूज़ एंड थ्रो

यूज़ एंड थ्रो
अँग्रेज़ी के तीन शब्द
और आत्म-ग्लानि से मुक्ति

कितनी आसानी से
कचरे की तरह निकाल दिया
अपने जीवन से मुझे
मुक्त कर लिया अपनी आत्मा को
मेरा ही सिद्धांत कह कर
मेरे ही जीवन का फलसफा बता कर

शायद सच ही कहा था तुमने
मैं भी तो आसानी से छोड़ आया
माँ बापू के सपने
दादी का मोतियाबिंब
दद्दू के पाँव दबाने वाले हाथ
राखी का क़र्ज़
दोस्तों के क़हक़हे
गाँव का मेघावी स्वाभिमान
मेरे से जुड़ी आशाएँ
अपना खुद का अस्तित्व

अर्जुन की तरह
पंछी की आँख ही नज़र आती थी मुझे
तुम्हारे रूप में

क्या है ये यूज़ एंड थ्रो
सभ्यताओं का अंतर्द्वंद
आधुनिकता की होड़ में ओढ़ा आवरण
नियम बदलता समाज
अपने आप को दोहराता मेरा इतिहास
इसी जीवन में मिलता मेरे कर्मों का फल
या मेरा ही जूता मेरे सर

बुधवार, 16 जून 2010

शब्द-कथा

प्रस्तुत है मेरी पहली व्यंग रचना जो हिन्द-युग्म में भी प्रकाशित हो चुकी है ... आशा है आपको पसंद आएगी


शब्दकोष से निकले कुछ शब्द
बूड़े बरगद के नीचे बतियाने लगे
इक दूजे को अपना दुखड़ा सुनाने लगे

इंसानियत बोली
में तो बस किस्से कहानियों में ही पलती हूँ
हाँ कभी कभी नेताओं के भाषणों में भी मिलती हूँ
लोगों से अब नही मेरा संबंध
दुर्लभ प्रजाति की तरह
मैं भी लुप्त हो जाऊंगी
शब्द कोष के पन्नों में
हमेशा के लिए सो जाऊंगी

तभी करुणा के रोने की आवाज़ आई
सिसकते सिसकते उसने ये बात बताई
पहले तो हर दिल पर मैं करती थी राज
क्या कहूँ ...
बच्चों के दिल में भी नही रही आज
इतने में दया सम्मान और लज्जा भी बोले
जबसे जमने की बदली है चाल
हमरा भी है यही हाल

धीरे धीरे चाहत ने भी दिल खोला
प्रेम, प्रीत, प्रणय, स्नेह
ऐसे कई शब्दों की तरफ से बोला
यूँ तो हर दिल में हम रहते हैं
मतलब नज़र आए तो झरने से बहते हैं
स्वार्थ की आड़ में अक्सर हमारा प्रयोग होता है
ऐसे हालात देख कर दिल बहुत रोता है

तभी चुपचाप बैठे स्वाभिमान ने हुंकारा
पौरुष, हिम्मत और जोश को पुकारा
सब की आँखों में आ गये आँसू
मिल कर अपने अस्तित्व को धितकारा

तभी कायरता ने दी सलाह
बोली काट दो अपने अपने पंख
नही तो देर सवेर सब मर जाओगे
शब्द कोष की वीथियों में नज़र भी नही आओगे

इतने में गुंडागर्दि और मक्कारी मुस्कुराए
शोरशराबे के साथ बीच सभा में आए
बोले हमारे देव झूठ का है ज़माना
तुम शब्दकोष से बाहर मत आना

इंसानों के बीच हमारा है बोलबाला
वो देखो सत्य का मुँह काला

ये सुनते ही इंसानियत घबराई
करुणा के दिल में दहशत छाई
चाहत ने गुहार लगाई
स्वाभिमान ने टाँग उठाई
सब की आत्मा
शब्दकोष में जा समाई

सोमवार, 7 जून 2010

झूठ

नही नही
में यह नहि कहूँगा की ये मेरा अंतिम झूठ है
इससे पहले भी मैने कई बार
सच की चाशनी लपेट कर
कई झूठ बोले हैं

कई बार अंजाने ही
झूठ बोलते अटका हूँ
पर हर बार मेरी बेशर्मी ने
ढीठता के साथ सच पचा लिया

झूठ तो कर्ण ने भी बोला था
ज्ञान के लोभ में
और झूठ की बैसाखी पकड़
सच तो युधिष्ठिर ने भी नही कहा

फिर तुम से बेहतर कौन समझ सकता है
झूठ तो उस रोज़ भी कहा था मैने
जब जानते हुवे भी तुमको
स्वप्न सुंदरी से सुंदर कहा
फिर तुम्हारे बाद भी ये झूठ
न जाने कितनों को
सच का आवरण लपेट कर कहा

झूठ तो हर बार बोलता हूँ
अपने आप से
अपनी आत्मा से
अपने वजूद से

पता है …?
सच की दहलीज़ पर झूठ का शोर
सच को बहरा कर देता है
वीभत्स सच को कोई देखना नही चाहता
सच आँखें फेर लेता है

अब तो मेरा वजूद
झूठ के दलदल में तैरना सीख गया है

हाँ मैं अब भी यह नहि कह रहा
की ये मेर अंतिम और अंतिम झूठ नही है

गुरुवार, 27 मई 2010

न पनघट न झूले न पीपल के साए

कुछ समय पहले गुरुदेव पंकज सुबीर जी के तरही मुशायरे में मेरी इस ग़ज़ल को सभी ने बहुत प्यार दिया ..... पेश है ये ग़ज़ल कुछ नये शेरों के साथ .....

न पनघट न झूले न पीपल के साए
शहर काँच पत्थर के किसने बनाए

मैं तन्हा बहुत ज़िंदगी के सफ़र में
न साथी न सपने न यादों के साए

वो ढाबे की रोटी वही दाल तड़का
कभी तो सड़क के किनारे खिलाए

वो तख़्ती पे लिख कर पहाड़ों को रटना
नही भूल पाता कभी वो भुलाए

वो अम्मा की गोदी, वो बापू का कंधा
मेरा बचपना भी कभी लौट आए

मैं बरसों से सोया नही नींद गहरी
वही माँ की लोरी कोई गुनगुनाए

मेरे घर के आँगन में आया है मुन्ना
न दादी न नानी जो घुट्टी पिलाए

सुदामा हूँ मैं और सर्दी का मौसम
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

अब कुछ नये शेर ....

मुझे है प्रतिक्षा उन पैगंबरों की
ह्रदय से ह्रदय की जो दूरी मिटाए

जो छेड़ा है कुदरत का क़ानून तुमने
खुदा के क़हर से खुदा ही बचाए

वो पूजा की थाली लिए सादगी सी
खड़ी है प्रतिक्षा में पलकें झुकाए

समर्पण समर्पण जहाँ बस समर्पण
प्रणय का दिया फिर वहीं मुस्कुराए

गुरुवार, 20 मई 2010

प्रगति

कुछ नही बदला
टूटा फर्श
छिली दीवारें
चरमराते दरवाजे
सिसकते बिस्तर
जिस्म की गंध में घुली
फ़र्नैल की खुश्बू
चालिस वाट की रोशनी में दमकते
पीले जर्जर शरीर

लंबी क़तारों से जूझता
चीखती चिल्लाती आवाज़ों के बीच
साँसों का खेल खेलता
पुराना
सरकारी अस्पताल का
जच्चा बच्चा
वार्ड नंबर दो
जहाँ मैने भी कभी
पहली साँस ली

अस्पताल के बाहर
मुँह चिड़ाता होर्डिंग
हमारा देश - प्रगति के पथ पर

सोमवार, 10 मई 2010

बंधुआ भविष्य

जिस्म ढकने को मुट्ठी भर शर्म
बंद आकाश का खुला गगन
साँस भर हवा
भूख का अधूरापन

नसों में दौड़ती
देसी महुए की वहशी गंध
दूर से आती
चंद सिक्कों की खनक

हाथ की खुरदरी रेखाओं से निकला
सुनहरा भविष्य

गूंगे झुनझुने की तरह
साम्यवादी शोर में बजता
बहरे समाजवाद को सुनाता
प्रजातंत्र की आँखों के सामने
पूंजीवाद की तिज़ोरी में बंद

या यूँ कहिए
सुरक्षित है

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

पहली मुलाकात ...

काम के सिलसिले में आने वाला सप्ताह ब्लॉग-जगत से दूर रहूँगा ...... जाते जाते ये कविता आपके सुपुर्द है ...

सुनो
क्या याद है तुम्हे
पहली मुलाकात
पलकें झुकाए
दबी दबी हँसी
छलकने को बेताब

वो अल्हड़ लम्हे
भीगा एहसास
हाथों में हाथ लिए
घंटों ठहरा वक़्त
उनिंदी रातें
कहने को
अनगिनत बातें

दिल की बंज़र ज़मीन पर
नाख़ून से बने कुछ निशान
कोरे केनवस पर खिंची
आडी तिरछी रेखाओं के ज़ख़्म

आज भी ताज़ा है नमी
खून से रिसती लकीरों में
जिंदा है तेरे हाथों की खुश्बू
धमनियों में दौड़ते खून में

तेरी यादें मकसद हैं
मेरे जीने की चाह का
तेरा एहसास उर्जा है
मेरी साँसों के प्रवाह का

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बुढ़ापा - एक दृष्टि-कोण

मेरी रचना "बुढ़ापा" पर सभी मित्रों की टिप्पणी पढ़ कर अभिभूत हूँ ... जहाँ एक और रचना को सभी ने सराहा वहीं मुझे ये आभास भी हुवा की कहीं ना कहीं मेरी रचना एक नकारात्मक पहलू को इंगित कर रही है. सभी टिप्पणियों और विशेष कर आदरणीय महावीर जी की समीक्षा और उनकी लिखी ग़ज़ल ने मुझे प्रेरित किया की मैं बुढ़ापे को इक नये दृष्टि-कोण से देखूं.
आशा है इस नयी रचना में आपको ज़रूर सकारात्मक पहलू नज़र आएगा.


उम्र का मंथन
तज़ुरबों की ख़ान
समय के पन्नों पर लिखा
अनुभव का ग्रंथ

चेहरे की झुर्रियों में उगे
मील के पत्थर
हाथों की उर्वरा से उगे
अनगिनत भविष्य

यज्ञ जीवन
अनंत का निर्माण
जीवन की संध्या
स्वयं का निर्वाण

श्रीष्टि का नियम
प्रेयसी की प्रतीक्षा
मौत का आलिंगन
देह का त्याग

यही तो प्रारंभ है
आत्मा परमात्मा के मिलन का
नये युग के प्रवाह का

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

बुढ़ापा

जिस्म पर रेंगती
चीटियाँ की सुगबुगाहट
वक़्त के हाथों लाहुलुहान शरीर
खोखले जिस्म को घसीटते
दीमक के काफिले

शारीरिक दर्द से परे
मुद्दतो की नींद से उठा
म्रत्प्राय जिस्म का जागृत मन

दिमाग़ के सन्नाटे में
चीखती आवाज़ों का शोर
उफन कर आती यादों का झंझावात
अचेतन शरीर की आँख से निकलते
पानी के बेरंग कतरे
साँसों का अनवरत सिलसिला
जीने की मजबूरी

हाथ भर दूरी पे पड़ा
इच्छा मृत्यु का वरदान
धीरे धीरे मुस्कुराता है ...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

नज़्म मेरी

कई बार गिरी
कई बार उठी

शब्दों के
हाथों से निकली
चिंदी चिंदी
हवा में बिखरी
पहलू में
कई बार रुकी

नज़्म मेरी

मुझे मेरी नज़्म ने कहा

मैं तेरे सामने
ज़िंदा खड़ी हूँ
जिस्म की खुश्बू में लिपटी
साँस लेती
बात करती

तू काहे
ढूंढता है मुझे
काग़ज़ के पुराने पन्नों में