बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अच्छा ... आप भी न ...

अच्छा ... आप भी न ...
ऐसे हि बोलते हो ...
झाड़ पर चढ़ाते हो बस ...
कहीं इस उम्र में भी ...
मैं नही बस ...

और मैं देखता हूँ तुम्हें
अपने आप में सिमिटते
कभी पल्लू से खेलते
कभी होठ चबाते
कभी क्षितिज को निहारते ...

पता है उस वक़्त कितनी भोली लगती हो
तुम्हारे गुलाबी गाल
गुलाब से खिल जाते हैं
हंसते हुवे छोटी छोटी आँखें
बंद सी हो जाती हैं ...
गालों के डिंपल
उतने ही गहरे लगते हैं
जब पहली बार मिलीं थी
आस्था के विशाल प्रांगण में
गुलाबी साड़ी पहने
पलकें झुकाए
पूजा की थाली लिए

फिर तो दूसरी ... तीसरी ...
और न जाने कितनी मुलाक़ातें

सालों से चल रहा ये सिलसिला
आज भी ऐसे ही चल रहा है
जैसे पहली बार मिले हों ...
और हर बार ऐसा भी लगता है
जैसे जन्म- जन्मांतर से साथ हों ...
ये कैसी अनुभूति
कौन सा एहसास है
क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
किसी बंधन में बाँधना ...?
या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?

अरे सुनो ...
मुझे तो याद हि नही रहा
क्या तुम्हें याद है
पहली बार हम कब मिले ...?
क्या तारीख थी ...?
कौन सा दिन था ...?

वैसे ... क्या ज़रूरी है
किसी तारीख को याद रखना ...?
या ज़रूरी है
हर दिन को तारीख बनाना ...?

बुधवार, 29 सितंबर 2010

उफ़ .... तुम भी न

पता है
तुमसे रिश्ता ख़त्म होने के बाद
कितना हल्का महसूस कर रहा हूँ

सलीके से रहना
ज़ोर से बात न करना
चैहरे पर जबरन मुस्कान रखना
"सॉरी"
"एसक्यूस मी"
भारी भरकम संबोधन से बात करना
"शेव बनाओ"
छुट्टी है तो क्या ...
"नहाओ"
कितना कचरा फैलाते हो
बिना प्रैस कपड़े पहन लेते हो

धीमे बोलने के बावजूद
नश्तर सी चुभती तुम्हारी बातें
बनावटी जीवन की मजबूरी
अच्छे बने रहने का आवरण

उफ्फ ... कितना बोना सा लगने लगा था

अच्छा ही हुआ डोर टूट गई

कितना मुक्त हूँ अब

घर में लगी हर तस्वीर बदल दी है मैने
सोफे की पोज़ीशन भी बदल डाली

फिल्मी गानों के शोर में
अब देर तक थिरकता हूँ
ऊबड़-खाबड़ दाडी में
जीन पहने रहता हूँ

तुम्हारे परफ्यूम की तमाम शीशियाँ
गली में बाँट तो दीं

पर क्या करूँ
वो खुश्बू मेरे ज़हन से नही जा रही

और हाँ
वो धानी चुनरी
जिसे तुम दिल से लगा कर रखती थीं
उसी दिन से
घर के दरवाजे पर टाँग रक्खी है
पर कोई कम्बख़्त
उसको भी नही ले जा रहा ....

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

क्षणिकाएँ

१) रेखाएँ

हर नये दर्द के साथ
बढ़ जाती है
नयी रेखा हाथ में
और लोग कहते हैं
हाथ के रेखाओं में
भविष्य छिपा है ...

२) चाँद

आसमान में
अटका
तारों में
भटका
सूरज के आते ही
खा गया
झटका

३)

साँसों के साथ खींच कर
दिल में रख लूँगा तुझे
सुना है
खून के कतरे
फेफड़ों से हो कर
दिल में जाते हैं

सोमवार, 13 सितंबर 2010

बीती यादें ...

अक्सर
गुज़रे हुवे वक़्त की सतह पर
तेरी यादों की काई टिकने नही देती
एक बार फिसलने पर
फिसलता चला जाता हूँ
खुद को समेटने की कोशिश में
और बिखर जाता हूँ
बीते लम्हों के घाव
पूरे जिस्म पर उभर आते हैं

बीती यादों का जंगल
निकलने नही देता है
वर्तमान में जीने की कोशिश
तेरा ख्वाब रोक देता है
उंगलियों की पकड़
मौका पकड़ने नही देती
बाहों में कोई ख्वाब
जकड़ने नही देती

घर की हर चौखट पर
तेरी यादों की दीमक रेंग रही हैं
बीते लम्हों की सीलन
दीवारों पर उतर आई है

अगली बरसात से पहले
हर कमरे को धूप लगाना चाहता हूँ
बरसों से जमी काई
खुरच देना चाहता हूँ
हर साल की तरह अपने आप से
नया अनुबंध करना चाहता हूँ
इक नया ख्वाब बुनना चाहता हूँ

सोमवार, 6 सितंबर 2010

मेरा शून्य

नही में नही चाहता
सन्नाटों से बाहर आना
इक नयी शुरुआत करना

ज़ख़्मी यादों का दंश सहते सहते
लाहुलुहान हो गया हूँ
गुज़रे लम्हों की सिसकियाँ
बहरा कर देतीं हैं
बीते वक़्त की खुश्बू
साँसें रोक रही है
रोशनी की चकाचौंध
अँधा कर रही है

तुम्हारी देह की मादक गंध
सह नही पाता
खनकती हँसी
सुन नही पाता
गहरी आँखों की कोई
थाह नही पाता
बाहों का हार
नागपाश लगता है
मुझे इस खामोशी में रहने दो
इन अंधेरों में बसने दो
ये मेरा ही शून्य है
इन सन्नाटों में रहने दो ...

सोमवार, 30 अगस्त 2010

परंपरा ..

क्या हर युग में
एकलव्य को देना होगा अंगूठे का दान ..?
शिक्षक की राजनीति का
रखना होगा मान ..?
झूठी परंपरा का
करना होगा सम्मान ..?

रिस्ते हुवे अंगूठे का बोझ
द्रोण ने उठा लिया
शिक्षा का व्यवसायिक करण
भीष्म ने निभा लिया
पर साक्षी है इतिहास
व्यवस्था के अन्याय का
शिक्षा के व्यवसाय का
गीता के अध्याय का
कृष्ण के न्याय का

शिक्षक से ज़्यादा
कौन समझता है
बीते हुवे कल का इतिहास
सही और ग़लत का गणित
भौतिक इच्छाओं का अर्थशास्त्र
झूठे अहम का मनोविज्ञान

अनगिनत परंपराओं की भीड़ में
क्या संभव है
इस परंपरा का अंत ...

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

मैं नही चाहता ...

नही मैं नही चाहता
नीले आकाश को छूना
नयी बुलंदी को पाना
उस गगनचुंबी इमारत में बैठना
जहाँ धुएं का विस्तार खुद को समेटने नही देता
जहाँ हर दूसरा तारा
तेज़ चमकने कि होड़ में लुप्त हो जाता है
पैर टिकाने कि कोशिश में
दूसरे का सिर कुचल जाता है

जहाँ सिक्कों का शोर बहरा कर दे
खुद का अस्तित्व बोना हो जाए
संवेदनहीन दीवारों में धड़कन खो जाए

तेरे हाथों की खुश्बू
" सिक्योरिटी चैक" कर के आए
अम्मा के हाथों से बनी रोटी
पिज़्ज़ा बर्गर से शरमाये

जहाँ अंतस का चुंबकीय तेज महत्व हीन हो जाए
बचपन की यादों पर पहरा लग जाए
टुकड़ों में बँटा मेरा अस्तित्व
कोट और पैंट में फँस जाए

मैं नही चाहता
हाँ मैं नही चाहता
उस नीले आकाश को छूना
नयी बुलंदी को पाना
उस गगनचुंबी इमारत में बैठना

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

जांना ...

जांना ..
सुन मेरी जांना ..

अक्सर तेरे स्पर्श के बाद
में जाग नही पाता
और सच पूछो
तो सो भी नही पाता

सोया होता हूँ
तो चेतन रहता हूँ
चेतन में सम्मोहित रहता हूँ

तेरि मोहिनी
मुझे पाश में लिए रहती है

साँसों के साथ तेरी खुश्बू
मेरे जिस्म में समा जाती है
जब कभी मैं स्वयं से
स्वयं का परिचय पूछता हूँ
तू चुपके से मेरे सामने आ जाती है...

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

धरती

परंपराओं में बँधी
दधीचि सी उदार
नियमों में बँधी
जिस्मानी उर्वारा ढोने को लाचार
बेबस धरती की कोख

ना चाहते हुवे
कायर आवारा बीज को
पनाह की मजबूरी
अनवरत सींचने की कुंठा
निर्माण का बोझ
पालने का त्रास

अथाह पीड़ा में
जन्म देने की लाचारी
अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
प्राकृति का कैसा खेल
धरती का कैसा धर्म ....

बुधवार, 7 जुलाई 2010

आवारा यादें ...

खोखले जिस्म में साँस लेतीं
कुछ ज़ख्मी यादें
कुछ लहुलुहान ख्वाब
जागती करवटों में गुज़री अधूरी रातें
जिस्म की ठंडक से चटके लम्हे
पसीने से नहाई चादर में लिपटा सन्नाटों का शोर

कुछ उबलते शब्दों की अंतहीन बहस
खून से रंगी चूड़ियों कि किरचें
कमीज़ पर पड़े कुछ ताज़ा जख्म के निशान

दिल के किसी कोने में
धूल के नीचे दबी
आवारा देह कि मादक गंध
कुछ हसीन लम्हों की तपिश
महकते लोबान का अधूरा नशा
गर्म साँसों का पिघलता लावा

उम्र के ढलते पड़ाव पर
कुछ ऐसे लम्हों के भूत
चुड़ेली यादें
जिस्म के खंडहर में जवान होती हैं
वक़्त के हाथों मरहम लगे जख्म कुरेदती हैं
ताज़ा तरीन रखती हैं

शुरू होता है न ख़त्म होने वाला
लंबे दर्द का सिलसिला
पर अब दर्द में
दर्द का एहसास नही होता ...