सोमवार, 20 जून 2011

रिश्ता ...

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पर तुम और तू के दोष को दूर करने के बाद)

जिस दिन
हमारे रिश्ते की अकाल मृत्यु हुई
कुकुरमुत्ते की तरह तुम्हारी यादें
सर उठाने लगीं

कंबल में जमी धूल सी तुम
तमाम कोशिशों के बावजूद
झाड़ी नही गयीं मुझसे
सफेदी की अनगिनत परतों के बाद भी घर की दीवारें
तुम्हारी यादों के मकड़-जाल से अटी पड़ी हैं
बारिश में उतरी सीलन सी तुम्हारी गंध
घर के कोने कोने में बस गयी है
यादों की धूल
वेक्युम चलाने के बावजूद
शाम होते होते
जाने कौन सी खिड़की से चुपचाप चली आती है
केतली से उठती भाप के साथ
हर सुबह तुम मेरे नथुनों में घुसने लगती हो
जब कभी आईना देखता हूँ
बालों में उंगलियाँ फेरने लगती हो
सॉफ करने पर भी
पुरानी गर्द की तरह
आईने से चिपकी रहती हो
घर के कोने कोने में तुम्हारी याद
चींटियों की तरह घूमने लगी है
स्मृतियों की धूल
कब जूतों के साथ घर आ जाती है
पता नही चलता

मैं जानता हूँ
इस रिश्ते की तो अकाल मृत्यु हो चुकी है
और यादों की धूल भी समय के साथ बैठ जाएगी
पर नासूर बने ये जख्म
क्या कभी भर पाएंगे

सोमवार, 13 जून 2011

मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका ...

ग़ज़लों का दौर से अलग हट के प्रस्तुत है आज एक रचना ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

मेरे तमाम जानने वालों के ख्यालों में पली
गुज़रे हुवे अनगिनत सालों की वेलेंटाइन
मेरी अंजान हसीना
समर्पित है गुलाब का वो सूखा फूल
जो बरसों क़ैद रहा
डायरी के बंद पन्नों में

न तुझसे मिला
न तुझे देखा
तू कायनात में तब आई
मुद्दतों बाद जब सूखा गुलाब
डायरी से मिला

मेरी तन्हाई की हमसफ़र
अंजान क़िस्सों की अंजान महबूबा
ख्यालों की आडी तिरछी रेखाओं में
जब कभी तेरा अक्स बनता हूँ
अनायास
तेरे माथे पे बिंदी
हाथों में पूजा की थाली दे देता हूँ
फिर पलकें झुकाए
सादगी भरे उस रूप को निहारता हूँ

ओ मेरी जानी सी अंजान प्रेमिका
तु बरसों पहले क्यों नही मिली

सोमवार, 6 जून 2011

जिंदगी वो राग जिसका सम नही है

जी लिया जो ज़िंदगी में कम नही है
लौट के आ जाऊं इतना दम नही है

एक पन्छी आसमाँ में उड़ रहा है
राह में जिसका कोई हमदम नही है

रोज़ की जद्दो-जहद पैदाइशी है
जिंदगी वो राग जिसका सम नही है

अनगिनत हैं लोग पीछे भी हमारे
बस हमारे हाथ में परचम नही है

किसके जीवन में कभी ऐसा हुवा है
साथ खुशियों के रुलाता गम नही है

बन गया मोती जो तेरा हाथ लग के
अश्क होगा वो कोई शबनम नही है

जिंदगी गुज़री है कुछ अपनी भी ऐसे
साज़ है आवाज़ है सरगम नही है

मंगलवार, 31 मई 2011

बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है

गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से संवरा गीत ....

पुराने गीत बेटी जब कभी भी गुनगुनाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है

दबा कर होठ वो दाँतों तले जब बात करती है
तेरी आँखें तेरा ही रूप तेरी छाँव लगती है
मैं तुझसे क्या कहूँ होता है मेरे साथ ये अक्सर
बड़ी बेटी किसी भी बात पर जब डाँट जाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा.....

कभी जब भूल से पत्नी मेरी चूल्हा जला ले तो
दही मक्खन पराठा जब कभी तुझसा बना ले तो
कभी घर से अचानक हींग की खुश्‍बू के आते ही
तेरे हाथों की वो खुश्‍बू मेरे दिल को सताती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा.....

वो छुटके को हुई थी रात में उल्टी अचानक ही
लगी थी खेलते में गैन्द फिर उस शाम किरकेट की
हरी मिर्ची नमक नींबू कभी घर के मसालों से
दवा देसी बगल वाली पड़ोसन जब बनाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

निकलती है कभी बिस्तर से जब फ़र्नैल की गोली
नज़र आती है आँगन में कभी जब दीप रंगोली
पुरानी कतरनें अख़बार के पन्नों को छूते ही
तू शब्दों से निकल कर सामने जब मुस्कुराती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

मैं छोटा था मुझे चोरी से तू कुछ कुछ खिलाती थी
मुझे है याद सीने से लगा के तू सुलाती थी
किसी रोते हुवे बच्चे को बहलाते में जब अक्सर
नये अंदाज़ से जब माँ कोई करतब दिखाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

गुरुवार, 26 मई 2011

वो हो गये बच्चों से पर माँ बाप हैं फिर भी

बातें पुरानी छेड़ना अच्छा नही होता
ज़ख़्मों की मिट्टी खोदना अच्छा नही होता

जो है उसे स्वीकार कर लो ख्वाब मत देखो
सच्चाई से मुँह मोड़ना अच्छा नही होता

जो हो गया सो हो गया अब छोड़ दो उसको
गुज़रे हुवे पल सोचना अच्छा नही होता

ये रोशनी रफ़्तार तेज़ी चार दिन की है
बस दौड़ना ही दौड़ना अच्छा नही होता

बातें नसीहत हैं ज़माने में बुज़ुर्गों की
कहते में उनको रोकना अच्छा नही होता

कमज़ोर हैं तो क्या हुवा कुछ काम आएँगे
माँ बाप को यूँ छोड़ना अच्छा नही होता

वो हो गये बच्चों से पर माँ बाप हैं फिर भी
हर बात पे यूँ टोकना अच्छा नही होता

मैं वो करूँगा, ये करूँगा है मेरी मर्ज़ी
बच्चों का ऐसा बोलना अच्छा नही होता

कुछ फूल भी बच्चों की तरह मुस्कुराते हैं
डाली से उनको तोड़ना अच्छा नही होता

सोमवार, 16 मई 2011

गुस्से को सड़कों तक तो लाना होगा

गुरुदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से सजी ....

धीरे धीरे बर्फ पिघलना ठीक नही
दरिया का सैलाब में ढलना ठीक नही

पत्ते भी रो उठते है छू जाने से
पतझड़ के मौसम में चलना ठीक नही

इक चिड़िया मुद्दत से इसमें रहती है
घर के रोशनदान बदलना ठीक नही

ख़ौफ़ यहाँ बेखौफ़ दिखाई देता है
रातों को यूँ घर से निकलना ठीक नही

अपने ही अब घात लगाए बैठे हैं
सपनों का आँखों में पलना ठीक नही

जब तक सुनने वाला ही बहरा न मिले
दिल के सारे राज़ उगलना ठीक नही

यादों का लावा फिर से बह निकलेगा
दिल के इस तंदूर का जलना ठीक नही

जिनके चेहरों के पीछे दस चेहरे हैं
ऐसे किरदारों से मिलना ठीक नही

गुस्से को सड़कों तक तो लाना होगा
बर्तन में ही दूध उबलना ठीक नही

रविवार, 8 मई 2011

माँ .....

मैने तो जब देखा अम्मा आँखें खोले होती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है

बँटवारे की खट्टी मीठी कड़वी सी कुछ यादें हैं
छूटा था जो घर आँगन उस पर बस अटकी साँसें हैं
आँखों में मोती है उतरा पर चुपके से रोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है


मंदिर वो ना जाती फिर भी घर मंदिर सा लगता है
घर का कोना कोना माँ से महका महका रहता है
बच्चों के मन में आशा के दीप नये संजोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है

चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है
श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है
इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ये ऐसा गीत है जिसको सभी ने मिल के गाना है

किसी का घर जलाने की कभी साजिश नहीं करना
जहां हों फूस के छप्पर वहां बारिश नहीं करना

जो पाना है तो खोने के लिए तैयार हो जाओ
जो खोने से है डर पाने की फिर ख्वाहिश नहीं करना

भरोसा गर नहीं होगा तो रिश्ते टूट जायेंगे
किसी को आजमाने की कभी कोशिश नहीं करना

जो खाली हाथ आये हो तो खाली हाथ है जाना
ये मेरा है ये मिल जाए ये फरमाइश नही करना

ये ऐसा गीत है जिसको सभी ने मिल के गाना है
जहर से शब्द कर्कश सी कोई बंदिश नही करना

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

छुप गया जो चाँद

दिल ही दिल में आपका ख्याल रह गया
मिल न पाए फिर कभी मलाल रह गया

था अबीर वादियों में तुम नहीं मिले
मुट्ठियों में बंद वो गुलाल रह गया

इक हसीन हादसे का मैं शिकार हूँ
फिर किसी का रेशमी रुमाल रह गया

देख कर मेरी तरफ तो कुछ कहा नहीं
मुस्कुरा के चल दिए सवाल रह गया

छत न मिल सकी मुझे तो कोई गम नहीं
आसमाँ मेरे लिए विशाल रह गया

आप आ गए थे भूल से कभी इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया

इस शेर में शुतुरगुर्बा का ऐब बन रहा था जिसका मुझे ज्ञान नहीं था ... गुरुदेव पंकज ने बहुत ही सहजता से इस दोष को दूर कर दिया ... पहले ये शेर इस प्रकार था ...
(आ गए थे तुम कभी जो भूल से इधर
वादियों में आपका जमाल रह गया)
गुरुदेव का धन्यवाद ...

छुप गया जो चाँद दिन निकल के आ गया
आ न पाए वो शबे विसाल रह गया

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

हो गयी तक्सीम अब्बा की हवेली
माँ तभी से हो गयी कितनी अकेली

आज भी आँगन में वो पीपल खड़ा है
पर नही आती है वो कोयल सुरीली

नल खुला रखती है आँगन का हमेशा
सूखती जाती है पर फिर भी चमेली

अनगिनत यादों को आँचल में समेटे
भीगती रहती हैं दो आँखें पनीली

झाड़ती रहती है कमरे को हमेशा
फिर भी आ जाती हैं कुछ यादें हठीली

अब नही करती है वो बातें किसी से
बस पुराना ट्रंक है उसकी सहेली

उम्र के इस दौर में खुद को समझती
काँच के बर्तन में पीतल की पतीली

हो गये हैं अनगिनत तुलसी के गमले
पर है आँगन की ये वृंदा आज पीली