बुधवार, 28 सितंबर 2011

दुपट्टा आसमानी शाल नीली ...

गिरे है आसमां से धूप पीली
पसीने से हुयी हर चीज़ गीली

खबर सहरा को दे दो फिर मिली है
हवा के हाथ में माचिस की तीली

जलेगी देर तक तन्हाइयों में
अगरबत्ती की ये लकड़ी है सीली

कोई जैसे इबादत कर रहा है
कहीं गाती है फिर कोयल सुरीली

दिवारों में उतर आई है सीलन
है तेरी याद भी कितनी हठीली

तुझे जब एकटक मैं देखता हूँ
मुझे मिलती हैं दो आँखें पनीली

चली आती हो तुम जैसे हवा में
दुपट्टा आसमानी शाल नीली

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

नम सी दो आँखें रहती हैं ...

गुरुदेव पंकज जी ने इस गज़ल को खूबसूरत बनाया है ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

प्यासी दो साँसें रहती हैं
नम सी दो आँखें रहती हैं

बरसों से अब इस आँगन में
बस उनकी यादें रहती हैं

चुभती हैं काँटों सी फिर वो
दिल में जो बातें रहती हैं

शहर गया है बेटा जबसे
किस्मत में रातें रहती हैं

उनके जाने पर ये जाना
दिल में अब आहें रहती हैं

पत्‍थर मारा तो जाना वो
शीशे के घर में रहती हैं

पीपल और जिन्नों की बातें
बचपन को थामें रहती हैं

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ ..

कविताओं के दौर से निकल कर ... पेश है आज एक गज़ल ...

उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ

खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ

सपने तो अपने भी रंग बिरंगी हैं
फूलों को मैं हार नहीं कर पाता हूँ

अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ

सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

स्व ...

मेरी प्रवृति

भागने की नही

पर कृष्ण को देवत्व मिला

सिद्धार्थ को बुद्धत्व मिला

कभी तो मैं भी पा लूँगा

अपना

"स्व"

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

आह्वान ...

कब तक शब्दों को
विप्लव की रचनाओं में उतारोगे

शब्द से रचना
रचना से संग्रह
संग्रह से किताब
किताब से संग्रहालय
आंत्र-जाल
या कोई अखबार

दम घोंटू
जंग खाई अलमारियों में
फर्नेल की बदबू से जूझती
सीलन लगी किताबें
फफूंद लगे शब्द
अब सड़ने लगे हैं
मकड-जाल में फंसे मायनों की
साँस उखड़ने लगी है

इससे पहले की
दीमक शब्दों को चाट जाए
शब्दों से गिर के अर्थ
आत्महत्या कर लें
इन्हें बाहर लाओ
चमकती धूप दिखाओ
युग परिवर्तन की हवा चलाओ
शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
क्रान्ति का इंधन बना दो

क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
काव्य सृजन न हुवा
इतिहास की वीथियों में
संगृहीत शब्दों की आवाजें
गूंजती रहेंगी सदियों तक

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

प्रश्न ...

इतिहास के क्रूर पन्नों पे
समय तो दर्ज़ करेगा
हर गुज़रता लम्हा
मुँह में उगे मुहांसों से लेकर
दिल की गहराइयों में छिपी क्रांति को
खोल के रख देगा निर्विकार आईने की तरह

अनगिनत सवाल रोकेंगे रास्ता
तेरी मेरी
हम सबकी भूमिका पे

जो तटस्थ रहेंगे
या लड़ेंगे
समय तो लिखेगा
उन सब का इतिहास

क्या सामना करोगे इन सवालों का
सृष्टि के रहने तक
युग के बदलने तक

भविष्य में उठने वाले इन प्रश्नों का जवाब
वर्तमान में ही देना होगा
क्या अब भी सोते रहोगे...?

बुधवार, 27 जुलाई 2011

डरपोक ...

मैं अपने साथ
एक समुंदर रखता था
जाने कब
तुम्हारी नफ़रत का दावानल
खुदकशी करने को मजबूर कर दें

मैं अपने साथ
दो गज़ ज़मीन भी रखता था
जाने कब
तुम्हारी बातों का ज़हर
जीते जी मुझे मार दे

जेब भर समुंदर
कब आत्मा को लील गया
मुट्ठी भर अस्तित्व
कब दो गज़ ज़मीन के नीचे दम तोड़ गया
पता ही नही चला

मैं अब भी साँस ले रहा हूँ
दर्प से दमकते तुम्हारे माथे की बिंदी
आज भी ताने मारती है

जेब में पड़ा समुंदर और दो गज़ ज़मीन
मुझे देख कर फुसफुसाते हैं
डरपोक कहीं का

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

अँधेरा ...

तुम्ही ने तो कहा था कितना काला हूँ
अँधेरे में नज़र नहीं आता
साक्षात अँधेरे की तरह

पर क्या तुम्हें एक पल भी
जीवन में अँधेरे का एहसास हुवा

मेरी खुश्क त्वचा ने
कब तुम्हारे अँधेरे को सोखना शुरू किया
मैं नहीं जानता

बढते शिखर के साथ
तुम्हारी जरूरत बढती गयी
मैं और तेजी से जलता रहा
यहाँ तक की आने वाले तमाम रास्तों पर
रौशनी ही रौशनी छितरा दी

अब जबकि तुम्हारी आँखें चुंधियाने लगीं हैं
बढ़ता हुवा रौशनी का दायरा
तुम्हारे साथ चलने लगा है
मैं तुमसे दूर हो रहा हूँ

हाँ ... अँधेरा जो हूँ

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

दंश ...

जब तक अपने खोखले पन का एहसास होता
तुम दीमक की तरह चाट गयीं

खाई हुई चोखट सा मेरा अस्तित्व
दीवारों से चिपक
सूखी लकड़ी की तरह चरमराता रहा

हरा भरा दिखने वाले तने सा मैं
कितना खोखला हूँ अंदर से
कोई जान न सका

अब जबकि आँखों में नमी नही
और तेरी सूखी यादें भी कम नही
गुज़रे लम्हों के गोखरू
मेरे जिस्म पे उगने लगे हैं

सन्नाटों के रेगिस्तान में
झरती हुयी रेत का शोर
मुझे जीने नही दे रहा

साँसों के साथ
हवा की सीलन पीते पीते
मैं कतरा कतरा जी रहा हूँ
और... लम्हा लम्हा
भुर रहा हूँ
रेत के इस समुन्दर का विस्तार
जल्दी ही तुमको लील लेगा

दुआ है…. तुम हजारों साल जियो

बुधवार, 6 जुलाई 2011

बीसवीं सदी की वसीयत ...

मौत
जी हाँ ... जब बीसवीं सदी की मौत हुई
(हंसने की बात नही सदी को भी मौत आती है)

हाँ तो मैं कह रहा था
जब बीसवीं सदी की मौत हुई
अनगिनत आँखों के सामने
उसकी वसीयत का पंचनामा हुवा

पाँच-सितारा इमारत के ए. सी. कमरों में
बुद्धिजीवियों के प्रगतिशील दृष्टिकोण,
और तथाकथित विद्वता भरे,
ग्रोथ रेट और बढते मध्यम वर्ग के आंकड़ों के बीच ...
संसद के गलियारे में उंघते सांसदों की
डारेक्ट टेलीकास्ट होती बहस ने ...
सरकारी पैसे पर अखबारों में छपे
बड़े बड़े विज्ञापनों की चमक ने
कितना कुछ तलाश लिया उस वसीयत में

पर किसी ने नही देखे
विरासत में मिले
बीसवीं सदी के कुछ प्रश्न
अन-सुलझे सवाल
व्यवस्था के प्रति विद्रोह

पानी की प्यास
दीमक खाए बदन
हड्डियों से चिपके पेट
भविष्य खोदता बचपन
चरमराती जवानी
बढ़ता नक्सल वाद

कुछ ऐसे प्रश्नों को लेकर
इक्कीसवीं सदी में सुगबुगाहट है…
अस्पष्ट आवाजों का शोर उठने लगा है

तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पीठ फेर ली
सांसदों के कान बंद हैं
प्रगतिशील लोगों ने मुखोटा लगा लिया
प्रजा “तंत्र” की व्यवस्था में मग्न है

धीरे धीरे इक्कीसवीं सदी
मौत की तरफ बढ़ रही है...