गुरुवार, 17 नवंबर 2011

पिघलती धूप का सूरज कोई पागल निकाले

पिघलती धूप का सूरज कोई पागल निकाले
लगेगी आग कह दो आसमां बादल निकाले

पहाड़ों को बचा ले कम करे मिट्टी की गर्मी
कहो की आदमी से फिर नए जंगल निकाले

सुना है वादियों में सर्द होने को है मौसम
कहो की धूप से अपना नया कम्बल निकाले

चुरा लेता है जो संगीन के साए में अक्सर
किसी की आँख से भीगा हुवा काजल निकाले

पड़े हैं गाँव में मुद्दत से घायल राह तकते
कहाँ अर्जुन पितामह के लिए जो जल निकाले

किसी के पास है पैसा किसी के पास आंसू
वो पागल जेब से कुछ कहकहे हरपल निकाले

बुधवार, 9 नवंबर 2011

रोने से कुछ दिल का बोझ उतर जाता है

धीरे धीरे हर सैलाब उतर जाता है
वक्त के साथ न जाने प्यार किधर जाता है

यूँ ना तोड़ो झटके से तुम नींदें मेरी
आँखों से फिर सपना कोई झर जाता है

आने जाने वालों से ये कहती सड़कें
इस चौराहे से इक रस्ता घर जाता है

बचपन और जवानी तो आनी जानी है
सिर्फ़ बुढ़ापा उम्र के साथ ठहर जाता है

सीमा के उस पार भी माएँ रोती होंगी
बेटा होता है जो सैनिक मर जाता है

अपने से ज़्यादा रहता हूँ तेरे बस में
चलता है ये साया जिस्म जिधर जाता है

सुख में मेरे साथ खड़े थे बाहें डाले
दुख आने पे अक्सर साथ बिखर जाता है

कुछ बातें कुछ यादें दिल में रह जाती हैं
कैसे भी बीते ये वक़्त गुज़र जाता है

माना रोने से कुछ बात नहीं बनती पर
रोने से कुछ दिल का बोझ उतर जाता है

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

भूल गए जो खून खराबा करते हैं ...

भूल गए जो खून खराबा करते हैं
खून के छींटे अपने पर भी गिरते हैं

दिन में गाली देते हैं जो सूरज को
रात गये वो जुगनू का दम भरते हैं

तेरी राहों में जो फूल बिछाते थे
लोग वो अक्सर मारे मारे फिरते हैं

आग लगा देते हैं दो आंसू पल में
कहने को तो आँखों से ही झरते हैं

उन सड़कों की बात नहीं करता कोई
जिनसे हो कर अक्सर लोग गुज़रते हैं

हाथों को पतवार बना कर निकले जो
सागर में जाने से कब वो डरते हैं

पूजा की थाली है पलकें झुकी हुईं
तुझ पे जाना मुद्दत से हम मरते हैं

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

हाथ में सरसों उगा कर देखिये...

धार के विपरीत जा कर देखिये
जिंदगी को आजमा कर देखिये

खिड़कियों से झांकती है रौशनी
रात के परदे उठा कर देखिये

आंधियाँ खुद मोड लेंगी रास्ता
एक दीपक तो जला कर देखिये

भीगना जो चाहते हो उम्र भर
प्रीत गागर में नहा कर देखिये

होंसला तो खुद ब खुद आ जायगा
सत्य को संबल बना कर देखिये

जख्म अपने आप ही भर जायंगें
खून के धब्बे मिटा कर देखिये

बाजुओं का दम अगर है तोलना
वक्त से पंजा लड़ा कर देखिये

दर्द मिट्टी का समझ आ जायगा
हाथ में सरसों उगा कर देखिये

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

भूल गये सब लोग दिगंबर आए हैं ...

दुश्मन जब जब घर के अंदर आए हैं
बन कर मेरे दोस्त ही अक्सर आए हैं

तेरे दो आँसू से तन मन भीग गया
रस्ते में तो सात समुंदर आए हैं

गहरे सागर में कितने गोते मारे
अपने हाथों में तो पत्थर आए हैं

भेजे थे कुछ फूल उन्हे गुलदस्ते में
बदले में कुछ प्यासे खंज़र आए हैं

तेरे पहलू में जो हर दम रहते हैं
जाने क्या तकदीर लिखा कर आए हैं

बेच हवेली पुरखों की अब दिल्ली में
मुश्किल से इक कमरा ले कर आए हैं

आँखों आँखों में कुछ उनसे पूछा था
खामोशी में उनके उत्तर आए हैं

ये भी मेरा वो भी मेरा सब मेरा
भूल गये सब लोग दिगंबर आए हैं

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

गोया लुटने की तैयारी ...

मिट्टी का घर मेघ से यारी
गोया लुटने की तैयारी

जी भर के जी लो जीवन को
ना जाने कल किसकी बारी

सागर से गठजोड़ है उनका
कागज़ की है नाव उतारी

प्रजातंत्र का खेल है कैसा
कल था बन्दर आज मदारी

बुद्धीजीवी बोल रहा है
शब्द हैं कितने भारी भारी

धूप ने दाना डाल दिया है
साये निकले बारी बारी

रेगिस्तान में ठोर ठिकाना
ढूंढ रही है धूल बिचारी

जाते जाते रात ये बोली
देखो दिन की दुनियादारी

बुधवार, 28 सितंबर 2011

दुपट्टा आसमानी शाल नीली ...

गिरे है आसमां से धूप पीली
पसीने से हुयी हर चीज़ गीली

खबर सहरा को दे दो फिर मिली है
हवा के हाथ में माचिस की तीली

जलेगी देर तक तन्हाइयों में
अगरबत्ती की ये लकड़ी है सीली

कोई जैसे इबादत कर रहा है
कहीं गाती है फिर कोयल सुरीली

दिवारों में उतर आई है सीलन
है तेरी याद भी कितनी हठीली

तुझे जब एकटक मैं देखता हूँ
मुझे मिलती हैं दो आँखें पनीली

चली आती हो तुम जैसे हवा में
दुपट्टा आसमानी शाल नीली

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

नम सी दो आँखें रहती हैं ...

गुरुदेव पंकज जी ने इस गज़ल को खूबसूरत बनाया है ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

प्यासी दो साँसें रहती हैं
नम सी दो आँखें रहती हैं

बरसों से अब इस आँगन में
बस उनकी यादें रहती हैं

चुभती हैं काँटों सी फिर वो
दिल में जो बातें रहती हैं

शहर गया है बेटा जबसे
किस्मत में रातें रहती हैं

उनके जाने पर ये जाना
दिल में अब आहें रहती हैं

पत्‍थर मारा तो जाना वो
शीशे के घर में रहती हैं

पीपल और जिन्नों की बातें
बचपन को थामें रहती हैं

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ ..

कविताओं के दौर से निकल कर ... पेश है आज एक गज़ल ...

उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ

खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ

सपने तो अपने भी रंग बिरंगी हैं
फूलों को मैं हार नहीं कर पाता हूँ

अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ

सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

स्व ...

मेरी प्रवृति

भागने की नही

पर कृष्ण को देवत्व मिला

सिद्धार्थ को बुद्धत्व मिला

कभी तो मैं भी पा लूँगा

अपना

"स्व"