बुधवार, 14 मार्च 2012

न ज़ख्मों को हवा दो ...

न ज़ख्मों को हवा दो
कोई मरहम लगा दो

हवा देती है दस्तक
चरागों को बुझा दो

लदे हैं फूल से जो
शजर नीचे झुका दो

पडोसी अजनबी हैं
दिवारों को उठा दो

मुहब्बत मर्ज़ जिनका
उन्हें तो बस दुआ दो

मेरी नाकामियों को
सिरे से तुम भुला दो

जुनूने इश्क में तो
फकत उनसे मिला दो

बुधवार, 7 मार्च 2012

नेह गुलाल ...

सभी पढ़ने वालों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं ... रंगों का पर्व सब को प्रेम के रंग में रंगे ... दिलों का वैर मिटे जीने की उमंग जगे ...

दो हाथों के मध्य तुम्हारे
कंचन जैसे गाल
जाने कौन बात पे हो गये
अधरों जैसे लाल

स्पर्श मात्र को जाने तुमने
क्या समझा जो
सिमट गयीं तुम ऐसे जैसे
छुई मुई की डाल

प्रेम की लाली
बदन पे तेरे ऐसी बिखरी
बिन होली के रंग गया जैसे
कोई नेह गुलाल

अंग अंग से
अंकुर फुट रहे यौवन के
चंचल बलखाती इठलाती
हिरनी जैसी चाल

कारी बदरी ज्यों
चंदा को छू उड़ जाए
गालों से अठखेली करते
चंचल रेशम बाल

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

जो करते तर्क हैं बस तर्क की खातिर हमेशा ...

ठिठुरती रात में बैठे जला कर आग अक्सर
सुनाते हैं ग़मों में वो खुशी का राग अक्सर

हवा के बुलबुले नेताओं के वादे, इरादे
बहुत जल्दी उतर जाती है इनकी झाग अक्सर

प्रजा का तंत्र है या राजनीति की व्यवस्था
तिजोरी पर मिले हैं फन उठाए नाग अक्सर

जड़ों पर खून की छींटे हमेशा डालते हैं
उजड जाते हैं अपनी फसल से वो बाग अक्सर

व्यवस्था की तिजोरी हाथ में रहती है जिनके
वही रहते हैं दौरे वक्त में बेदाग़ अक्सर

जो करते तर्क हैं बस तर्क की खातिर हमेशा
नज़र आते हैं उनको चाँद में भी दाग अक्सर

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

वो सूरज से बगावत कर रहा है ...

कविता के दौर से निकल कर पेश है एक गज़ल ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

अंधेरों की हिफाज़त कर रहा है
वो सूरज से बगावत कर रहा है

अभी देखा हैं मैंने इक शिकारी
परिंदों से शराफत कर रहा है

खड़ा है आँधियों में टिमटिमाता
कोई दीपक हिमाकत कर रहा है

गली के मोड पर रखता है मटके
वो कुछ ऐसे इबादत कर रहा है

वो कहता है किताबों में सजा कर
के तितली पर इनायत कर रहा है

अभी सीखा नहीं बंदे ने उड़ना
परिंदों की शिकायत कर रहा है

बुजुर्गों को सरों पे है बिठाता
शुरू से वो ज़ियारत कर रहा है

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

आज ...

कभी कभी
पंख लगा के उड़ता समय
आभास नहीं होने देता किसी विशेष दिन का
खास कर
जब दिन ऐसे बीत रहे हों की इससे अच्छे दिन हो ही नहीं सकते

ऐसे में अचानक ही जादुई कायनात
अपने इन्द्रधनुष में छेद कर
किसी विशेष दिन को और सतरंगी कर देती है

पता है आज सुबह से
हवा की सरगोशी रह रह के कुछ कहना चाह रही है
महकती बसंत पंख लगा के उड़ना चाहती है
ओस की बूंदों पे लिखा पैगाम
किसी के नाम करना चाहती है

तुम्हें तो मालुम ही है इसका राज़
फिर क्यों नहीं आ जातीं मेरे पहलू में

मुझे पता है आज सब तुमसे बात करना चाहते हैं
हो सके तो मुलाक़ात भी करना चाहते हैं

पर मैं

तुम्हें पलकों में बंद करके सो जाना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ सपनों की सतरंगी दुनिया में
खो जाना चाहता हूँ ...

तुम चलोगी न मेरे साथ

आज ...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

नीली आँखें ...

भागना चाहता था मैं
समय के पंखों पे सवार हो कर
इतना दूर
की मेरा साया भी मुझे न ढूंढ सके

आँखे खुली रखना चाहता था
तू सपने में भी करीब न आ सके
डूबना चाहता था समुन्दर में
की होश भी बाकी न रह सके

मैंने कोशिश की

खुला आसमान देख कर भागा
नीले समुन्दर में छलांग भी लगाई
पर हर बार की तरह
तेरी आँखों की गहराई में फंस के रह गया
जिसके शांत पारदर्शी समुन्दर में
खुला आसमान साफ नज़र आता था

बुधवार, 25 जनवरी 2012

मेरा अस्तित्व ...

लम्हा लम्हा
तुम जलती रहीं
कतरा कतरा
मैं पिघलता रहा

बूँद बूँद टपकता मेरा अस्तित्व
धीरे धीरे समुन्दर सा होने लगा
मेरे होने का एहसास
कहीं गहरे में डूब गया

तुम अब भी जल रही हो

ये बात अलग है
तिल तिल ये समुन्दर अब सूखने लगा है
धुंवा धुंवा मेरा एहसास
अब खोने लगा है

गरमाने लगी है कायनात
सूख रहे हैं धरती के होठ

हाँ ... मुझे भी तो एक मूसलाधार बारिश की
सख्त जरूरत है

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

अहम या इमानदारी ...

जबकि मुझे लगता है
हमारी मंजिल एक थी
मैं आज भी नही जान सका
क्यों हमारा संवाद
वाद विवाद की सीमाएं लांघ कर
मौन में तब्दील हो गया

अतीत का कौन सा लम्हा
अँधेरा बन के तुम्हारी आँखों में पसर गया
प्रेम की बलखाती नदी
कब नाले में तब्दील हुयी
जान नहीं सका

जूते में लगी कील की तरह
आते जाते तुम पैरों में चुभने लगीं
हलकी सी चुभन जहर बन के नसों में दौड़ने लगी

रिश्तों के बादल
बरसे पर भिगो न सके

अब जबकि मैं
और शायद तुम भी
उसी चिंगारी की तलाश में हो
मैं चाहता हूँ की अतीत के तमाम लम्हे
जिस्म से उखड़ जाएं

पर क्या करूं
साए की तरह चिपकी यादें
जिस्म का साथ नहीं छोड़ रहीं

और सच कहूँ तो .... मुझे तो ये भी नहीं पता
ऐसी सोच मेरा अहम है या इमानदारी

बुधवार, 11 जनवरी 2012

कोयला खादान का एक मजदूर ...

आँखों में तैरती प्रश्नों की भीड़
मुँह में ज़ुबान रखने का अदम्य साहस

दिल में चिंगारी भर गर्मी
और जंगल जलाने का निश्चय

पहाड़ जैसी व्यवस्था
और दो दो हाथ करने की चाह
साँस लेता दमा
और हाथों में क्रांति का बिगुल

हथोड़े की चोट को
शब्दों में ढालने की जंगली जिद्द
जिस्म के पसीने से निकलती
गाड़े लाल रंग की बू

उसे तो मरना ही था

कोयले की खादान में रह कर
कमीज़ का रंग सफेद जो था...

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

बदलाव ...

वो रचना चाहते हैं नया इतिहास
पर नहीं भूलना चाहते
खरोच के निशान

बदलना चाहते हैं परम्पराएं
पर नहीं छोड़ना चाहते अधूरा विश्वास

बनाना चाहते हैं नए नियम
नहीं बदलना चाहते पुरानी परिपाटी

खुला रख के घावों को
करना चाहते हैं निर्माण

लहू के रंग से लिखना चाहते हैं
प्रेम की नयी इबारत

ज़ख़्मी ईंटों की नीव पे
खड़ा करना चाहते हैं
बुलंद इमारत

क्या सच में इतने मासूम हैं