मंगलवार, 19 जून 2012

अंधेरा ...


ठीक उसी वक्त 
जब अंधेरा घर वापसी की तैयारी करता है 
उजाला बादलों के पीछे से अपने आने की खबर देने लगता है     
भूलने लगते हैं सब अंधेरे का अस्तित्व  
हालांकि सच तो ये है 
दिन का उजाला मन के अंधेरे को ढांप नहीं पाता 

उस दिन मझे भी ऐसा महसूस हुवा था 
तुम चली गई हमेशा हमेशा के लिए उस रौशनी के साथ 
बिना सोचे समझे की रौशनी का अस्तित्व केवल अंधेरे से है 
एक ही सिक्के के दो पहलू 

मैं तो उसी लम्हे से शैतान बन गया था 
अंधेरे के साथ आता रहा, जाता रहा  
और अब तो कभी कभी 
रौशनी के आने पे भी पसरा रहता हूँ 
कभी पेड़ की छाया में 
या कभी गुनाह की आड़ में ... 

सच बताना क्या तुम मुझे अभी भी प्यार नहीं करतीं ...?   
अंधेरे से तो तुम्हे भी प्यार था बचपन से ...? 

सोमवार, 11 जून 2012

खत ...


तेरी यादों से पीछा छुड़ाने के बाद
और नींद की आगोश में जाने से पहले
न जाने रात के कौन से पहर
तेरे हाथों लिखे खत  
खुदबखुद दराज से निकलने लगते हैं  

कागज़ के परे  
एहसास की चासनी में लिपटे शब्द
और धूल में तब्दील होते उनके अर्थ
चिपक जाते हैं बीमार बिस्तर से

लगातार खांसने के बावजूद तेरे अस्तित्व की धसक
सासें रोकने लगती है   
लंबी होती तेरी परछाई
वजूद पे अँधेरे की चादर तान देती है  

यहां वहां बिखरे कागज़
सच या सपने का फर्क ढूँढने नहीं देते
सुबह दिवार से लटकी मजबूरियां और तेरे खतों के साथ  
बिस्तर से लिपटी धूल  
गली के नुक्कड़ पे झाड़ आता हूं
उन कोरे कागजों में रोज आग लगाता हूं

पर कमबख्त तेरे ये खत
खत्म होने का नाम नहीं लेते ...

रविवार, 3 जून 2012

अम्मा ...


छुपा कर बेटे बहु से
वो आज भी सहेजती है
बासी अखबार
संभाल कर रखती है
पुरानी साडियां
जोड़ती रहती है
घर का टूटा सामान

सब से आँखों बचा कर
रोज देखती है खिडकी के बाहर
कान लगाये सुनती है
कुछ जानी पहचानी
कुछ अन्जानी सी आवाजें 

पर नहीं आती वो आवाज
जिसका रहता है इंतज़ार माँ को

“पुराने कपडे, पुराना सामान, रद्दी-अखबार दे दो
बदले में बर्तन ले लो”

इलाका तो वही है बरसों से
कुछ पडोसी भी वही हैं 
बस अम्मां समझ नहीं पाई
कब मोहल्ला शहर में तब्दील हो गया 

गुज़रती उम्र के साथ
अम्मा की आदत भी तो नहीं छूटती ... 

गुरुवार, 24 मई 2012

मेरी जाना ...


रोज सिरहाने के पास पड़ी होती है   
चाय की गर्म प्याली और ताज़ा अखबार 
याद नहीं पड़ता कब देखा 
माँ की दवाई और बापू के चश्मे से लेकर ...       
बच्चों के जेब खर्च और नंबरों का हिसाब 

पता नहीं कौन सी चाभी भरी रहती है तुम्हारे अंदर 

सबके उठने से पहले से लेकर 
सबके सो जाने के बाद तक  
हर आहट पे तुम्हें जागते देखा है 
सब्जी वाले से लेकर मांगने वाला तक 
तुम्हारे दरवाज़े पे दस्तक देता है  

सुबह से शाम तक  
तुम्हारी झुकी पलकें और दबे होठों के बीच छुपी मुस्कुराहट में   
न जाने कितने किरदार गुजर जाते हैं 
आँखों के सामने से  

मेरी जाना ... 
तुम्हारा प्यार जानने के लिए 
ज़रूरी नहीं तुम्हारी खामोशी को जुबां देना   
या आँखों में लिखी इबारत पढ़ना ...  

मंगलवार, 15 मई 2012

जीवन ...


जीने के लिए ज़रूरी नही
प्रेम की ऊर्जा 
रौशनी भरे ख्वाब

कुछ अनकही मजबूरियां भी  
टूटने नहीं देतीं
साँसों की डोर

यूं ही चलता रहता है ये सफर 
साँसों का क़र्ज़ उठाये
मौत की इंतज़ार में

जीवन इसको भी तो कहते है ... 

सोमवार, 7 मई 2012

सजीव कविता ...


गज़लों के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक कविता ... आशा है आपको पसंद आएगी

तुम कहती हो लिखो कोई कविता
मेरे पे ...
बस मेरे पे ...
 
और मैं सोचने लगता हूँ
क्या लिखूं
तुम पेबस तुम पे ...   

क्योंकि तुमको अपने से अलग तो कभी सोच ही नहीं पाया मैं
तो अपने आप पर लिखूं ...
पर कैसे ...

वैसे भी कुछ लिखने के लिए 
अतीत या भविष्य में उतरना होगा
कुछ पल के लिए ही सही
तुमसे दूर तो होना होगा

बताओ ...
क्या सह पाओगी ये दूरी ...

अपने आप पे कविता या कुछ पल की दूरी
कहो ... क्या है जरूरी ...

क्या अच्छा नहीं हम यूं ही जीते रहें ...
वर्तमान को संजोते रहें ...
ये भी तो इक कविता है समय के पंखों पे लिखी ...
हम दोनों की सजीव कविता ... 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई ...


धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई 
जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई  

नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक 
रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई 

मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें     
देखते ही देखते सेहत संभल गई 

दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता 
फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई 

वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया 
चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई 

लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं 
काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई 

लोग हैं मसरूफ अंदाजा नहीं रहा   
चुटकले मस्ती ठिठोली फिर हजल गई    

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ ...


छू लेती है जब मुझको तो अच्छा हो जाता हूँ  
अम्मा से जब मिलता हूँ तो बच्चा हो जाता हूँ  

करता हूँ अब्बा से छुप कर जब कोई शैतानी 
चहरे को मासूम बना के सच्चा हो जाता हूँ 

राखी या होली दीवाली या लोहडी बैसाखी  
दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ 

दस्तक जब देता हूँ बीती यादों के कमरे में 
दीवारों की सीलन से मैं कच्चा हो जाता हूँ 

खाँसी करता रहता हूँ जब बेटे की बैठक में 
उजली सी दीवारों का मैं धब्बा हो जाता हूँ 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

बड़ी मुश्किल है यूँ रिश्ता निभाना ...


किसी को उम्र भर सर पर बिठाना
बड़ी मुश्किल है यूँ रिश्ता निभाना

हज़ारों ठोकरें मारीं हो जिसने
उसी पत्थर को सीने से लगाना

मेरे गीतों में खुद को पाओगे तुम
कभी तन्हाई में सुनना सुनाना

बड़ी मासूम सी उनकी अदा है
उठा कर के गिराना फिर उठाना

जुनूने इश्क में होता है अक्सर
लगी हो चोट फिर भी मुस्कुराना

जला कर ख़ाक कर सकते हैं घर को
चरागों से है रोशन यूँ ज़माना

कहाँ आसान होता है किसी को 
किसी भी गैर का हंसना हँसाना

नहीं आती है सबको रास शोहरत
बुलंदी पर नही रहता ठिकाना 

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 साहिल पर कितने पत्थर मिल जाएँगे
 मोती तो गहरे जा कर ही मिलते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 कलियों को इन पेड़ों पर ही रहने दो
 गुलदस्ते में फूल कहाँ फिर खिलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं

 बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया
 कंप्यूटर की बातें करते रहते हैं

कहते हैं गुरु बिन गत नहीं ... उपरोक्त गज़ल में भी कुछ शेरों में दोष है और उसको गुरुदेव पंकज सुबीर जी की पारखी नज़र ने देख लिया ... उनका बहुत बहुत आभार गज़ल को इस नज़रिए से देखने का ... यहां मैं शेर के दोष और उनके सुझाव और विश्लेषण को लिख रहा हूँ जिससे की मेरे ब्लॉग को पढ़ने वालों को भी गज़ल की बारीकियां समझने का मौका मिलेगा ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं ( मतले में ईता का दोष बन रहा है किन्‍तु ये छोटी ईता है जिसे हिंदी में मान्‍य किया गया है । मतले के दोनों काफियों में रखते और करते में जो ‘ते’ है वो शब्‍द से हटने के बाद भी मुकम्‍मल शब्‍द ‘रख’ और ‘कर’ बच रहे हैं । इसका मतलब ‘ते’ रदीफ हो गया है । तो अब रदीफ केवल ‘हैं’ नहीं होकर ‘ते हैं’ हो गया है । बचे हुए ‘रख’ और ‘कर’ समान ध्‍वनि वाले शब्‍द अर्थात काफिया होने की शर्त पर पूरा नहीं उतर रहे हैं । खैर ये छोटी ईता है सो इसे हिंदी में माफ किया गया है । मगर वैसे ये है दोष ही । ) 

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं ( रदीफ और काफिये की ध्‍वनियों को मतले के अलावा किसी दूसरे शेर के मिसरा उला में नहीं आना चाहिये हुस्‍ने मतला को छोड़कर । तो इसको यूं किया जा सकता है ‘दूर कहां रह पाते हैं पुरखे हमसे’)
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं ( इसमें आाखिर में रदीफ का दोहराव और काफिये की ध्‍वनि का दोहराव है इसको यूं करना होगा ‘कर देते हैं दो आंसू तूफान खड़़ा ) 
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में ( रदीफ की ध्‍वनि आ रही है इसको यूं करना होगा ‘आपस में होती है तू तू मैं मैं अब’ )
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं