सोमवार, 13 अगस्त 2012

सुख दुःख से जब परे हुए हो ...


सब से परदा करे हुए हो   
तन्हाई में घिरे हुए हो   

पत्तों से ये हवा ने बोला     
पतझड़ से क्यों डरे हुए हो   

भाव नहीं है दया का दिल में 
अंदर से क्या मरे हुए हो 

संगी साथी नहीं रहेंगे  
गुस्से से जो भरे हुए हो 

बदकिस्मत हो तभी तो अपनी   
डाली से यूं झरे हुए हो 

जीवन उस दिन समझ सकोगे 
सुख दुःख से जब परे हुए हो  

रविवार, 5 अगस्त 2012

कैसी है तेरी सरहद ...


कविताओं के दौर से निकल के पेश है आज एक गज़ल ... आशा है पसंद आएगी ...

चाहे मेरा जितना कद  
पर बापू तू है बरगद  

बंटवारे का खेल हुवा 
खींची अपनी अपनी हद     

बेटे ने बस पूछ लिया  
अम्मा है कितनी गदगद   

जूते चप्पल चलते हैं 
कैसी है अपनी संसद 

अंदर आना नामुमकिन   
कैसी है तेरी सरहद 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

चिंतन ...


अनेकों बार पढ़े गीता सार से प्रभावित रचना ... 

जो हुआ 
या जो हो रहा है 
और आगे भी होने वाला है    
सब कुछ बेमानी तो नहीं 

हर होने के पीछे की वजह मालुम हो 
ये जरूरी नहीं 
और जो हुआ या होने वाला है ... वो बेवजह नहीं    
ये कह देना भी जरूरी नहीं 

जो जरूरी है वो ये की हर होने को जीना    
जो होने वाला है उसको तहे दिल से तसलीम करना   

जो होना है वो तो होगा 
वजह जान के बेवजह करना 
या जो होना है उसको न होने देना    
आसान तो न होगा 

तो क्यों न मान लेना ही अच्छा 
की जो हो रहा है अच्छा हो रहा है 
जो होगा वो भी अच्छा ही होगा 
भूत गुज़र गया भविष्य की चिंता न करो 
वर्तमान तो चल रहा है 

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

जिंदगी सिगरेट का धुंवा ...


मुझे याद है 
धुंवे के छल्ले फूंक मार के तोड़ना तुम्हें अच्छा लगता था 

लंबी होती राख झटकना 
बुझी सिगरेट उंगलियों में दबा लंबे कश भरना 
फिर खांसने का बहाना और देर तक हंसना  

कितनी भोली लगतीं थीं तुम 

गर्मियों की दोपहर का ये सिलसिला 
मेरी आदत बन चुका था उन दिनों 
हाथों के फ्रेम बना जब तुम अलग अलग एंगल से मेरा चेहरा देखतीं     
तो मैं अपने आप को तुमसे अलग नहीं देख पाता था   

फिर कई दिन तुम नही आयीं 
सुलगती यादों की आग मेरे जिस्म में बहने लगी   
धुंवे के हर कश के साथ मैं तुम्हें पीने लगा   

सच कहूं तो सिगरेट की आदत इसलिए भी रास आने लगी थी   
क्योंकि उसके धुंवे में तुम्हारा अक्स झलकने लगा था 

अचानक उस शाम 
किसी खामोश बवंडर की तरह तुम मेरे कमरे मे आयीं    
हालांकि तन्हा रात के क़दमों की आहट के साथ तुम चली गयीं हमेशा हमेशा के लिए 
पर जाते जाते मेरे होठ से लगी सिगरेट 
अपनी हाई हील की एड़ी से बुझाते हुवे तुमने बस इतना कहा 
“प्लीज़ ... आज के बाद कभी सिगरेट मत पीना” 

और मैं .... पागल 

अब क्या कहूं 

काश तुमने ये न कहा होता 
कोइ तो बहाना छोड़ा होता मेरे जीने का 
अब तो खाली उंगलियों के बीच अपनी उम्र पीता हूँ 
ऐश ट्रे में जिंदगी की राख झाड़ता हूँ 

लम्हों के “बट” तो अभी भी मिल जायंगे ... 
कुछ बुझे बुझे ... कुछ जलते हुवे धुंवा धुंवा ...   

बुधवार, 11 जुलाई 2012

रंगों के नए अर्थ ...


चलो रंगों को नए अर्थ दें 
नए भाव नए रंग दें 

खून के लाल रंग को 
पानी का बेरंग रंग कहें     
(रंगों की विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए) 

सफ़ेद को नीला 
(आँखों को गहराई तो मिले) 
धूप को काला 
(अधिकतर लोगों के कर्मों को सार्थकता देने के लिए) 
और काले को पीला कर दें 
(कम से कम अंधेरों में रहने वाले  
उज्जवल भविष्य का एहसास तो कर लें) 

सफेद रंग को सिरे से मिटा दें 
अर्थ हटा दें 
भविष्य के लिए शब्द-कोष में सुरक्षित कर दें 
(बदनामी से तो बचा रहेगा बेचारा) 

संभव हो तो इंद्र-धनुष के सात रंगों को मिला कर 
बेरंग सा एक रंग कर दें 
(“मेरे” “तेरे” रंग से बचाने के लिए) 
 
भगवे और हरे को मिला 
एक नया रंग बना दें 
उसे “भारत” नाम दे दें ...  

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

ख़ामोशी की जंग ...


कितनी लंबी है खामोशी की जंग
   
इंच भर दूरी तय करने को
मीलों लंबा सफर
आँखों से कुछ ना कहने का अनवरत प्रयास    
जबरन होठ बंद रखने की जद्दोजहद

और कितनी छोटी है जिंदगी की कशमकश

वक्त के साथ उतर जाता है
चुप होठों के पीछे छुपे बेताब शब्दों का सैलाब 
छोड़ जाता है अपने पीछे
कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा

ऐसे में कभी कभी उम्र भर का सफर काफी नहीं होता
खामोशी को ज़ुबान देने में  

बुधवार, 27 जून 2012

बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ


“बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ” डॉ उर्मिला सिंह, (ब्लॉग: “मन के-मनके”) के अपने शब्दों में “यह पुस्तक एक खोज है, उस स्वर्ग की जो हमारी मुट्ठी में बंद है” वो आगे लिखती हैं “मैंने अपने स्वर्ग को स्वयं ढूँढा है, स्वयं रचा है और उसे पाया है”.
और सच कहूं तो जब मैंने इस पुस्तक को पढ़ने की शुरुआत की तो मुझे भी लगा की वाकई स्वर्ग तो हमारे आस पास ही बिखरा हुवा है छोटी छोटी खुशियों में, पर हम उसे ढूंढते रहते हैं, खोजते रहते हैं मृग की तरह.

अपनी शुरूआती कविता में उर्मिला जी कहती हैं की स्वर्ग खोजने बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है ये तो आस पास ही फैला है, देखिये ...    
सूनी गोद में
किलकारियां भरते हुए
अनाथ बचपन को
आँचल से ढंकते हुए
बिखरे हैं, स्वर्ग
चारों.....तरफ

आगे आगे उनका कवी मन सचेत भी करता है, यहां तक की अपने आप से भी प्रश्न खड़ा करता है और कहता है

अपने निज अस्तित्व की खोज में
अपनत्व के खंडहरों पर चलते रहे
बहुत देर हो जाएगी और ....
खंडहरों के भी रेगिस्तान हो जाएंगे
ढहता हुवे टीला, रेत का
दबी फुसफुसाहटों में
कहता रह जाएगा..
बिखरे...हैं स्वर्ग
चारों...तरफ 

मुझे याद आता है जब पहली बार हमारे मोहल्ले में ब्लैक एंड वाईट टी.वी. आया तो तो हम भी इतने खुश थे जैसे वो हमारे घर में आया हो. हफ्ते में एक दिन आने वाला चित्रहार और कृषि दर्शन भी ऐसे देखते की बस इससे ज्यादा कोई खुशी ही नहीं जीवन में. और आज जबकि सब कुछ है सब के पास फिर भी इतनी खुशी नहीं ... शायद इस लिए ही उर्मिला जी ने कहा है की खुशी ढूंढनी है तो बाहर निकलो अपने आप से और महसूस करो ...

पुस्तक की अधिकाँश कविताएं इन्ही बिखरे हुवे स्वर्ग की तलाश है ... हर कविता आपको जागृत करती हुयी सी है की ये देखो स्वर्ग यहां है ... यहां है ... और यहां भी है ... यहां उन सब कविताओं को लिख के आपका मज़ा खराब नहीं करना चाहता ...


आपको एक किस्सा सुनाता हूँ जानकार आश्चर्य होगा किताब पढ़ने के बाद ... मैंने बिल्डिंग के कुछ बच्चों से पूछा की मुझे अपने बचपन की कुछ यादें बताओ जिनसे तुम्हे खुशी मिली हो और जो तुम्हें याद हो तो उनके पास कुछ जन्म दिन की यादें, कुछ अपने स्कूल की बातें, और बहुत जोर डालने पे जहां जहां घूमने गए उन जगहों की बाते ही याद थीं ... फिर जब उन्होंने मुझसे पूछा तो लगा मेरे पास तो जैसे हजारों यादें हैं बचपन की ... छोटी छोटी बातें जिनमें जीवन का स्वर्ग सच में था ... छत पे बिस्तर लगा कर सोना, तारों और बादलों में शक्लें बनाना, गिल्ली डंडा और लट्टू खेलना, छुट्टियों में मामा या बूआ के घर जाना, आम चूपना, गन्ने चूसना, मधुमक्खी के छत्ते तोड़ना, बिजली जाने पे ऊधम मचाना, होली की टोलियाँ बनाना ... और देखा ... बच्चे बोर हो के चले गए अपने अपने फेस बुक पे ...    

असल बात तो ये है की स्वर्ग की पहचान भी नहीं हो पाती कभी कभी और इसलिए उर्मिला जी कहती हैं ...

स्वर्ग पाने से पहले
पहचान उसकी है जरूरी
स्वर्ग के भेष में, छुपे हैं
चारों तरफ कितने बहरूपिए

अगर गौर से देखें तो स्वर्ग तो पहले भी हमारे पास था और आज भी हमारे पास ही है बस हमें ढूँढना होगा छोटी छोटी खुशियों में.

इस पुस्तक के माध्यम से उर्मिला जी सचेत करना चाहती हैं की जागो, देखो आस पास की वो सभी चीजें जिनमें स्वर्ग की आभा सिमिट आई है, वो दिखाना चाहती हैं की कौन से पल हैं जीवन में जिनमें स्वर्ग पाया जा सकता है पर जाने अनजाने उन लम्हों कों देख नहीं पाते.

मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूँ की मुझे उर्मिला जी की ये किताब पढ़ने का मौका मिला, अपने बच्चों कों भी आग्रह कर के पढ़ने को कहा है जिससे वो भी जान सकें की “बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ”

पुस्तक का प्रकाशन जाने माने प्रकाशन “शिवना प्रकाशन पी सी लैब, सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर – ४६६००१ (म.प्र)” से हुवा है मूल्य १२५ रूपये. आप इसे उर्मिला जी से भी प्राप्त कर सकते हैं. उनका ई मेल है ...

Mobile: +91-8958311465

मंगलवार, 19 जून 2012

अंधेरा ...


ठीक उसी वक्त 
जब अंधेरा घर वापसी की तैयारी करता है 
उजाला बादलों के पीछे से अपने आने की खबर देने लगता है     
भूलने लगते हैं सब अंधेरे का अस्तित्व  
हालांकि सच तो ये है 
दिन का उजाला मन के अंधेरे को ढांप नहीं पाता 

उस दिन मझे भी ऐसा महसूस हुवा था 
तुम चली गई हमेशा हमेशा के लिए उस रौशनी के साथ 
बिना सोचे समझे की रौशनी का अस्तित्व केवल अंधेरे से है 
एक ही सिक्के के दो पहलू 

मैं तो उसी लम्हे से शैतान बन गया था 
अंधेरे के साथ आता रहा, जाता रहा  
और अब तो कभी कभी 
रौशनी के आने पे भी पसरा रहता हूँ 
कभी पेड़ की छाया में 
या कभी गुनाह की आड़ में ... 

सच बताना क्या तुम मुझे अभी भी प्यार नहीं करतीं ...?   
अंधेरे से तो तुम्हे भी प्यार था बचपन से ...? 

सोमवार, 11 जून 2012

खत ...


तेरी यादों से पीछा छुड़ाने के बाद
और नींद की आगोश में जाने से पहले
न जाने रात के कौन से पहर
तेरे हाथों लिखे खत  
खुदबखुद दराज से निकलने लगते हैं  

कागज़ के परे  
एहसास की चासनी में लिपटे शब्द
और धूल में तब्दील होते उनके अर्थ
चिपक जाते हैं बीमार बिस्तर से

लगातार खांसने के बावजूद तेरे अस्तित्व की धसक
सासें रोकने लगती है   
लंबी होती तेरी परछाई
वजूद पे अँधेरे की चादर तान देती है  

यहां वहां बिखरे कागज़
सच या सपने का फर्क ढूँढने नहीं देते
सुबह दिवार से लटकी मजबूरियां और तेरे खतों के साथ  
बिस्तर से लिपटी धूल  
गली के नुक्कड़ पे झाड़ आता हूं
उन कोरे कागजों में रोज आग लगाता हूं

पर कमबख्त तेरे ये खत
खत्म होने का नाम नहीं लेते ...

रविवार, 3 जून 2012

अम्मा ...


छुपा कर बेटे बहु से
वो आज भी सहेजती है
बासी अखबार
संभाल कर रखती है
पुरानी साडियां
जोड़ती रहती है
घर का टूटा सामान

सब से आँखों बचा कर
रोज देखती है खिडकी के बाहर
कान लगाये सुनती है
कुछ जानी पहचानी
कुछ अन्जानी सी आवाजें 

पर नहीं आती वो आवाज
जिसका रहता है इंतज़ार माँ को

“पुराने कपडे, पुराना सामान, रद्दी-अखबार दे दो
बदले में बर्तन ले लो”

इलाका तो वही है बरसों से
कुछ पडोसी भी वही हैं 
बस अम्मां समझ नहीं पाई
कब मोहल्ला शहर में तब्दील हो गया 

गुज़रती उम्र के साथ
अम्मा की आदत भी तो नहीं छूटती ...