रविवार, 9 दिसंबर 2012

माँ तो माँ है ...


मैंने देखा तुम मुस्कुरा रही हो 
देख रही हो हर वो रस्म 
जो तुम्हारी सांसों के जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी 

समझ तो तुम भी गयीं थीं 
अब ज्यादा देर तुम्हें इस घर में नहीं टिका सकेंगे हम 
अंतिम संस्कार के बहाने 
बरसों से जुड़ा ये नाता 
कुछ पल से ज्यादा नहीं सहा जाएगा  

कुछ देर तक 
दूर से आने वालों का इंतज़ार 
अंतिम दर्शन 
फिर चार कन्धों की सवारी 

समय के बंधन में बंधे 
सौंप आएंगे तुझे अग्नि के हवाले 
तेरे शरीर के पूर्णत: चले जाने का 
इंतज़ार भी न कर सकेंगे  

जिंदगी लौट आएगी धीरे धीरे पुरानी रफ़्तार पे 

मुझे पता है 
तुम तब भी मुस्कुरा रही होगी ...    

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

माँ ...


पिछला कुछ समय शायद जीवन के सबसे कठिन दौर की तरह बीता है. अचानक ही २५ सितम्बर को मेरी माता जी का स्वर्गवास हो गया जिसके लिए मैं तैयार नहीं था. शायद ये ऐसा आघात है जिसके लिए इंसान कभी भी तैयार नहीं होता ... पर नियति कुछ ऐसी है की सहना पड़ता है.
सच कहूं तो मन अभी भी इस बात को मान नहीं रहा, लगता है जैसे एक खराब सपना था जिसे याद करने का भी मन नहीं होता. सोते, जागते, सोचते हुवे जब भी माँ को सोचता हूं ... उनसे उसी तरह से बात करता हुवा महसूस करता हूं जैसे पहले करता था ...    





सब कह रहे थे तू नहीं रही
पर तू तो वहीं थी 
मुस्कुराती हुई  

मैं रो रहा था ...
तू बोली रो क्यूँ रहा है 

इस कमरे में जाता तो दूसरे कमरे में टहलने लगती
वहाँ जाता तो इस कमरे में आ जाती

जब कोई कंधा देता  
तू बोल पड़ती
थक गया क्या ... चल कंधा दे 
कंधा देता तो बोलती “ज्यादा देर मत उठा थक जाएगा”

लकड़ी लगाते हुवे भी तू पास ही थी
कान में बुदबुदाई
कोई बात नहीं मुंह पे भी रख मोटी लकड़ी
शरीर है पूरा जलना जरूरी है

तू हर किसी के साथ नज़र आ रही थी  
उस वक्त भी
जब पूरी बिरादरी तिनका तोड़ के तेरे साथ
इस लोक का सम्बन्ध तोड़ रही थी

हमेशा की तरह मुस्कुराते हुवे  
तू कान में धीरे से बोली 

क्या तिनका तोड़ने से सम्बन्ध टूट जाते हैं ...?


मंगलवार, 25 सितंबर 2012

शाम, श्याम ...


छोटी बहर की गज़लों के क्रम में छोटी से छोटी बहर में कुछ कहने का प्रयोग किया है ... आशा है आपको पसंद आएगा ... 

शाम  
श्याम  

जप लो  
नाम  

बोल  
राम   

तू ही  
धाम  

सुर को  
थाम  

खोल   
जाम  

क्या है  
काम  

(गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से) 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

तन्हाई है ...


जो छाई है 
तन्हाई है 

घर की तुलसी 
मुरझाई है    

जो है टूटा  
अस्थाई है 

कल था पर्वत  
अब राई है 

अब शर्म नहीं  
चिकनाई है 

महका मौसम 
तू आई है 

दुल्हन देखो   
शरमाई है 

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पे कुछ कमियों को दूर करने के बाद) 
  

बुधवार, 12 सितंबर 2012

आज के हालात ...


छोटी बहर की गज़लों के दौर में प्रस्तुत है एक और गज़ल, आशा है पसंद आयगी ...

आवाम हाहाकार है 
सब ओर भ्रष्टाचार है 

प्रतिपक्ष है ऐंठा हुवा 
सकते में ये सरकार है 

सेवक हैं जनता के मगर 
राजाओं सा व्यवहार है 

घेराव की न सोचना 
मुस्तैद पहरेदार है 

रोटी नहीं इस देश में 
मंहगी से मंहगी कार है 

मिल बाँट कर खाते हैं पर 
इन्कार है इन्कार है  

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अजब ये सिलसिला क्यों ...


इरादा बुलबुला क्यों 
अजब ये सिलसिला क्यों   
  
झड़े पतझड़ में पत्ते 
हवा से है गिला क्यों 

फटे हैं जेब सारे 
हवा में है किला क्यों 

गए जो खुदकशी को 
उन्हें तिनका मिला क्यों 

शहर में दिन दहाड़े 
लुटा ये काफिला क्यों 

विरह की आग में फिर   
तपे बस उर्मिला क्यों 

छला तो इंद्र ने था 
अहिल्या ही शिला क्यों  

बुधवार, 29 अगस्त 2012

अब गुज़री तो तब गुज़री ...


अब गुज़री तो तब गुज़री 
धीरे धीरे सब गुज़री 

तन्हाई में फिर कैसे 
पूछो ना साहब गुज़री 

मुद्दत तक रस्ता देखा 
इस रस्ते तू अब गुज़री   

दिन बीता तेरी खातिर 
तेरी खातिर शब् गुज़री 

महफ़िल महफ़िल घूम लिए 
तन्हाई पर कब गुज़री 

मोती तब ही चुन पाया   
गहरे सागर जब गुज़री 

बुधवार, 22 अगस्त 2012

इक तबस्सुम में ये दम है ...


दिन हैं छोटे रात कम है 
साथ उनका दो कदम है  

फुर्र हो जाते हैं अपने 
वक़्त का कैसा सितम है 

तू है या एहसास तेरा 
या मेरे मन का वहम है 

दूर होने पर ये जाना 
आज फिर क्यों आँख नम है 

दूसरों को कौन रोए 
सब को बस अपना ही गम है  
  
छोड़ के मैं जा न पाया  
इक तबस्सुम में ये दम है  

सोमवार, 13 अगस्त 2012

सुख दुःख से जब परे हुए हो ...


सब से परदा करे हुए हो   
तन्हाई में घिरे हुए हो   

पत्तों से ये हवा ने बोला     
पतझड़ से क्यों डरे हुए हो   

भाव नहीं है दया का दिल में 
अंदर से क्या मरे हुए हो 

संगी साथी नहीं रहेंगे  
गुस्से से जो भरे हुए हो 

बदकिस्मत हो तभी तो अपनी   
डाली से यूं झरे हुए हो 

जीवन उस दिन समझ सकोगे 
सुख दुःख से जब परे हुए हो  

रविवार, 5 अगस्त 2012

कैसी है तेरी सरहद ...


कविताओं के दौर से निकल के पेश है आज एक गज़ल ... आशा है पसंद आएगी ...

चाहे मेरा जितना कद  
पर बापू तू है बरगद  

बंटवारे का खेल हुवा 
खींची अपनी अपनी हद     

बेटे ने बस पूछ लिया  
अम्मा है कितनी गदगद   

जूते चप्पल चलते हैं 
कैसी है अपनी संसद 

अंदर आना नामुमकिन   
कैसी है तेरी सरहद