बुधवार, 27 जून 2012

बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ


“बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ” डॉ उर्मिला सिंह, (ब्लॉग: “मन के-मनके”) के अपने शब्दों में “यह पुस्तक एक खोज है, उस स्वर्ग की जो हमारी मुट्ठी में बंद है” वो आगे लिखती हैं “मैंने अपने स्वर्ग को स्वयं ढूँढा है, स्वयं रचा है और उसे पाया है”.
और सच कहूं तो जब मैंने इस पुस्तक को पढ़ने की शुरुआत की तो मुझे भी लगा की वाकई स्वर्ग तो हमारे आस पास ही बिखरा हुवा है छोटी छोटी खुशियों में, पर हम उसे ढूंढते रहते हैं, खोजते रहते हैं मृग की तरह.

अपनी शुरूआती कविता में उर्मिला जी कहती हैं की स्वर्ग खोजने बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है ये तो आस पास ही फैला है, देखिये ...    
सूनी गोद में
किलकारियां भरते हुए
अनाथ बचपन को
आँचल से ढंकते हुए
बिखरे हैं, स्वर्ग
चारों.....तरफ

आगे आगे उनका कवी मन सचेत भी करता है, यहां तक की अपने आप से भी प्रश्न खड़ा करता है और कहता है

अपने निज अस्तित्व की खोज में
अपनत्व के खंडहरों पर चलते रहे
बहुत देर हो जाएगी और ....
खंडहरों के भी रेगिस्तान हो जाएंगे
ढहता हुवे टीला, रेत का
दबी फुसफुसाहटों में
कहता रह जाएगा..
बिखरे...हैं स्वर्ग
चारों...तरफ 

मुझे याद आता है जब पहली बार हमारे मोहल्ले में ब्लैक एंड वाईट टी.वी. आया तो तो हम भी इतने खुश थे जैसे वो हमारे घर में आया हो. हफ्ते में एक दिन आने वाला चित्रहार और कृषि दर्शन भी ऐसे देखते की बस इससे ज्यादा कोई खुशी ही नहीं जीवन में. और आज जबकि सब कुछ है सब के पास फिर भी इतनी खुशी नहीं ... शायद इस लिए ही उर्मिला जी ने कहा है की खुशी ढूंढनी है तो बाहर निकलो अपने आप से और महसूस करो ...

पुस्तक की अधिकाँश कविताएं इन्ही बिखरे हुवे स्वर्ग की तलाश है ... हर कविता आपको जागृत करती हुयी सी है की ये देखो स्वर्ग यहां है ... यहां है ... और यहां भी है ... यहां उन सब कविताओं को लिख के आपका मज़ा खराब नहीं करना चाहता ...


आपको एक किस्सा सुनाता हूँ जानकार आश्चर्य होगा किताब पढ़ने के बाद ... मैंने बिल्डिंग के कुछ बच्चों से पूछा की मुझे अपने बचपन की कुछ यादें बताओ जिनसे तुम्हे खुशी मिली हो और जो तुम्हें याद हो तो उनके पास कुछ जन्म दिन की यादें, कुछ अपने स्कूल की बातें, और बहुत जोर डालने पे जहां जहां घूमने गए उन जगहों की बाते ही याद थीं ... फिर जब उन्होंने मुझसे पूछा तो लगा मेरे पास तो जैसे हजारों यादें हैं बचपन की ... छोटी छोटी बातें जिनमें जीवन का स्वर्ग सच में था ... छत पे बिस्तर लगा कर सोना, तारों और बादलों में शक्लें बनाना, गिल्ली डंडा और लट्टू खेलना, छुट्टियों में मामा या बूआ के घर जाना, आम चूपना, गन्ने चूसना, मधुमक्खी के छत्ते तोड़ना, बिजली जाने पे ऊधम मचाना, होली की टोलियाँ बनाना ... और देखा ... बच्चे बोर हो के चले गए अपने अपने फेस बुक पे ...    

असल बात तो ये है की स्वर्ग की पहचान भी नहीं हो पाती कभी कभी और इसलिए उर्मिला जी कहती हैं ...

स्वर्ग पाने से पहले
पहचान उसकी है जरूरी
स्वर्ग के भेष में, छुपे हैं
चारों तरफ कितने बहरूपिए

अगर गौर से देखें तो स्वर्ग तो पहले भी हमारे पास था और आज भी हमारे पास ही है बस हमें ढूँढना होगा छोटी छोटी खुशियों में.

इस पुस्तक के माध्यम से उर्मिला जी सचेत करना चाहती हैं की जागो, देखो आस पास की वो सभी चीजें जिनमें स्वर्ग की आभा सिमिट आई है, वो दिखाना चाहती हैं की कौन से पल हैं जीवन में जिनमें स्वर्ग पाया जा सकता है पर जाने अनजाने उन लम्हों कों देख नहीं पाते.

मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूँ की मुझे उर्मिला जी की ये किताब पढ़ने का मौका मिला, अपने बच्चों कों भी आग्रह कर के पढ़ने को कहा है जिससे वो भी जान सकें की “बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ”

पुस्तक का प्रकाशन जाने माने प्रकाशन “शिवना प्रकाशन पी सी लैब, सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर – ४६६००१ (म.प्र)” से हुवा है मूल्य १२५ रूपये. आप इसे उर्मिला जी से भी प्राप्त कर सकते हैं. उनका ई मेल है ...

Mobile: +91-8958311465

मंगलवार, 19 जून 2012

अंधेरा ...


ठीक उसी वक्त 
जब अंधेरा घर वापसी की तैयारी करता है 
उजाला बादलों के पीछे से अपने आने की खबर देने लगता है     
भूलने लगते हैं सब अंधेरे का अस्तित्व  
हालांकि सच तो ये है 
दिन का उजाला मन के अंधेरे को ढांप नहीं पाता 

उस दिन मझे भी ऐसा महसूस हुवा था 
तुम चली गई हमेशा हमेशा के लिए उस रौशनी के साथ 
बिना सोचे समझे की रौशनी का अस्तित्व केवल अंधेरे से है 
एक ही सिक्के के दो पहलू 

मैं तो उसी लम्हे से शैतान बन गया था 
अंधेरे के साथ आता रहा, जाता रहा  
और अब तो कभी कभी 
रौशनी के आने पे भी पसरा रहता हूँ 
कभी पेड़ की छाया में 
या कभी गुनाह की आड़ में ... 

सच बताना क्या तुम मुझे अभी भी प्यार नहीं करतीं ...?   
अंधेरे से तो तुम्हे भी प्यार था बचपन से ...? 

सोमवार, 11 जून 2012

खत ...


तेरी यादों से पीछा छुड़ाने के बाद
और नींद की आगोश में जाने से पहले
न जाने रात के कौन से पहर
तेरे हाथों लिखे खत  
खुदबखुद दराज से निकलने लगते हैं  

कागज़ के परे  
एहसास की चासनी में लिपटे शब्द
और धूल में तब्दील होते उनके अर्थ
चिपक जाते हैं बीमार बिस्तर से

लगातार खांसने के बावजूद तेरे अस्तित्व की धसक
सासें रोकने लगती है   
लंबी होती तेरी परछाई
वजूद पे अँधेरे की चादर तान देती है  

यहां वहां बिखरे कागज़
सच या सपने का फर्क ढूँढने नहीं देते
सुबह दिवार से लटकी मजबूरियां और तेरे खतों के साथ  
बिस्तर से लिपटी धूल  
गली के नुक्कड़ पे झाड़ आता हूं
उन कोरे कागजों में रोज आग लगाता हूं

पर कमबख्त तेरे ये खत
खत्म होने का नाम नहीं लेते ...

रविवार, 3 जून 2012

अम्मा ...


छुपा कर बेटे बहु से
वो आज भी सहेजती है
बासी अखबार
संभाल कर रखती है
पुरानी साडियां
जोड़ती रहती है
घर का टूटा सामान

सब से आँखों बचा कर
रोज देखती है खिडकी के बाहर
कान लगाये सुनती है
कुछ जानी पहचानी
कुछ अन्जानी सी आवाजें 

पर नहीं आती वो आवाज
जिसका रहता है इंतज़ार माँ को

“पुराने कपडे, पुराना सामान, रद्दी-अखबार दे दो
बदले में बर्तन ले लो”

इलाका तो वही है बरसों से
कुछ पडोसी भी वही हैं 
बस अम्मां समझ नहीं पाई
कब मोहल्ला शहर में तब्दील हो गया 

गुज़रती उम्र के साथ
अम्मा की आदत भी तो नहीं छूटती ... 

गुरुवार, 24 मई 2012

मेरी जाना ...


रोज सिरहाने के पास पड़ी होती है   
चाय की गर्म प्याली और ताज़ा अखबार 
याद नहीं पड़ता कब देखा 
माँ की दवाई और बापू के चश्मे से लेकर ...       
बच्चों के जेब खर्च और नंबरों का हिसाब 

पता नहीं कौन सी चाभी भरी रहती है तुम्हारे अंदर 

सबके उठने से पहले से लेकर 
सबके सो जाने के बाद तक  
हर आहट पे तुम्हें जागते देखा है 
सब्जी वाले से लेकर मांगने वाला तक 
तुम्हारे दरवाज़े पे दस्तक देता है  

सुबह से शाम तक  
तुम्हारी झुकी पलकें और दबे होठों के बीच छुपी मुस्कुराहट में   
न जाने कितने किरदार गुजर जाते हैं 
आँखों के सामने से  

मेरी जाना ... 
तुम्हारा प्यार जानने के लिए 
ज़रूरी नहीं तुम्हारी खामोशी को जुबां देना   
या आँखों में लिखी इबारत पढ़ना ...  

मंगलवार, 15 मई 2012

जीवन ...


जीने के लिए ज़रूरी नही
प्रेम की ऊर्जा 
रौशनी भरे ख्वाब

कुछ अनकही मजबूरियां भी  
टूटने नहीं देतीं
साँसों की डोर

यूं ही चलता रहता है ये सफर 
साँसों का क़र्ज़ उठाये
मौत की इंतज़ार में

जीवन इसको भी तो कहते है ... 

सोमवार, 7 मई 2012

सजीव कविता ...


गज़लों के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक कविता ... आशा है आपको पसंद आएगी

तुम कहती हो लिखो कोई कविता
मेरे पे ...
बस मेरे पे ...
 
और मैं सोचने लगता हूँ
क्या लिखूं
तुम पेबस तुम पे ...   

क्योंकि तुमको अपने से अलग तो कभी सोच ही नहीं पाया मैं
तो अपने आप पर लिखूं ...
पर कैसे ...

वैसे भी कुछ लिखने के लिए 
अतीत या भविष्य में उतरना होगा
कुछ पल के लिए ही सही
तुमसे दूर तो होना होगा

बताओ ...
क्या सह पाओगी ये दूरी ...

अपने आप पे कविता या कुछ पल की दूरी
कहो ... क्या है जरूरी ...

क्या अच्छा नहीं हम यूं ही जीते रहें ...
वर्तमान को संजोते रहें ...
ये भी तो इक कविता है समय के पंखों पे लिखी ...
हम दोनों की सजीव कविता ... 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई ...


धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई 
जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई  

नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक 
रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई 

मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें     
देखते ही देखते सेहत संभल गई 

दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता 
फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई 

वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया 
चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई 

लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं 
काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई 

लोग हैं मसरूफ अंदाजा नहीं रहा   
चुटकले मस्ती ठिठोली फिर हजल गई    

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ ...


छू लेती है जब मुझको तो अच्छा हो जाता हूँ  
अम्मा से जब मिलता हूँ तो बच्चा हो जाता हूँ  

करता हूँ अब्बा से छुप कर जब कोई शैतानी 
चहरे को मासूम बना के सच्चा हो जाता हूँ 

राखी या होली दीवाली या लोहडी बैसाखी  
दीदी के पीहर आते ही अब्बा हो जाता हूँ 

दस्तक जब देता हूँ बीती यादों के कमरे में 
दीवारों की सीलन से मैं कच्चा हो जाता हूँ 

खाँसी करता रहता हूँ जब बेटे की बैठक में 
उजली सी दीवारों का मैं धब्बा हो जाता हूँ 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

बड़ी मुश्किल है यूँ रिश्ता निभाना ...


किसी को उम्र भर सर पर बिठाना
बड़ी मुश्किल है यूँ रिश्ता निभाना

हज़ारों ठोकरें मारीं हो जिसने
उसी पत्थर को सीने से लगाना

मेरे गीतों में खुद को पाओगे तुम
कभी तन्हाई में सुनना सुनाना

बड़ी मासूम सी उनकी अदा है
उठा कर के गिराना फिर उठाना

जुनूने इश्क में होता है अक्सर
लगी हो चोट फिर भी मुस्कुराना

जला कर ख़ाक कर सकते हैं घर को
चरागों से है रोशन यूँ ज़माना

कहाँ आसान होता है किसी को 
किसी भी गैर का हंसना हँसाना

नहीं आती है सबको रास शोहरत
बुलंदी पर नही रहता ठिकाना 

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 साहिल पर कितने पत्थर मिल जाएँगे
 मोती तो गहरे जा कर ही मिलते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 कलियों को इन पेड़ों पर ही रहने दो
 गुलदस्ते में फूल कहाँ फिर खिलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं

 बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया
 कंप्यूटर की बातें करते रहते हैं

कहते हैं गुरु बिन गत नहीं ... उपरोक्त गज़ल में भी कुछ शेरों में दोष है और उसको गुरुदेव पंकज सुबीर जी की पारखी नज़र ने देख लिया ... उनका बहुत बहुत आभार गज़ल को इस नज़रिए से देखने का ... यहां मैं शेर के दोष और उनके सुझाव और विश्लेषण को लिख रहा हूँ जिससे की मेरे ब्लॉग को पढ़ने वालों को भी गज़ल की बारीकियां समझने का मौका मिलेगा ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं ( मतले में ईता का दोष बन रहा है किन्‍तु ये छोटी ईता है जिसे हिंदी में मान्‍य किया गया है । मतले के दोनों काफियों में रखते और करते में जो ‘ते’ है वो शब्‍द से हटने के बाद भी मुकम्‍मल शब्‍द ‘रख’ और ‘कर’ बच रहे हैं । इसका मतलब ‘ते’ रदीफ हो गया है । तो अब रदीफ केवल ‘हैं’ नहीं होकर ‘ते हैं’ हो गया है । बचे हुए ‘रख’ और ‘कर’ समान ध्‍वनि वाले शब्‍द अर्थात काफिया होने की शर्त पर पूरा नहीं उतर रहे हैं । खैर ये छोटी ईता है सो इसे हिंदी में माफ किया गया है । मगर वैसे ये है दोष ही । ) 

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं ( रदीफ और काफिये की ध्‍वनियों को मतले के अलावा किसी दूसरे शेर के मिसरा उला में नहीं आना चाहिये हुस्‍ने मतला को छोड़कर । तो इसको यूं किया जा सकता है ‘दूर कहां रह पाते हैं पुरखे हमसे’)
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं ( इसमें आाखिर में रदीफ का दोहराव और काफिये की ध्‍वनि का दोहराव है इसको यूं करना होगा ‘कर देते हैं दो आंसू तूफान खड़़ा ) 
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में ( रदीफ की ध्‍वनि आ रही है इसको यूं करना होगा ‘आपस में होती है तू तू मैं मैं अब’ )
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं

मंगलवार, 27 मार्च 2012

लौटना बच्चों का बाकी है अभी तक गाँव में ...

जिस्म काबू में नहीं और मौत भी मिलती नहीं
या खुदाया रहम कर अब जिंदगी कटती नहीं

वक्त कैसा आ गया तन्हाइयां हैं हम सफर
साथ में यादें हैं उनकी दिल से जो मिटती नहीं

लौटना बच्चों का बाकी है अभी तक गाँव में
कुछ बुजुर्गों की नज़र इस राह से हटती नहीं

हाथ में जुम्बिश नहीं है आँख में है मोतिया
उम्र के इस दौर में अपनों पे भी चलती नहीं

डूब के मर जाऊं जिसमें उम्र या वापस मिले
वो नदी अब तो हमारे शहर से बहती नहीं

टूट कर अपनी जड़ों से कब तलक रह पाओगे
खंडहरों की नीव लंबे वक्त तक रहती नहीं

धूप है बारिश कभी तो छाँव की बदली भी है
एक ही लम्हे पे आकर जिंदगी रूकती नहीं

बुधवार, 21 मार्च 2012

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया ...

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया
फिर अचानक सामने सर दे दिया

ले लिए सपने सुनहरी धूप के
और फिर खारा समुन्दर दे दिया

एक बस फरमान साहूकार का
छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया

लहलहाती फसल ले ली सूद में
जोतने को खेत बंजर दे दिया

नौच खाया जिस्म सबके सामने
चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
खुदकशी का नाम दे कर दे दिया

तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया

बुधवार, 14 मार्च 2012

न ज़ख्मों को हवा दो ...

न ज़ख्मों को हवा दो
कोई मरहम लगा दो

हवा देती है दस्तक
चरागों को बुझा दो

लदे हैं फूल से जो
शजर नीचे झुका दो

पडोसी अजनबी हैं
दिवारों को उठा दो

मुहब्बत मर्ज़ जिनका
उन्हें तो बस दुआ दो

मेरी नाकामियों को
सिरे से तुम भुला दो

जुनूने इश्क में तो
फकत उनसे मिला दो

बुधवार, 7 मार्च 2012

नेह गुलाल ...

सभी पढ़ने वालों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं ... रंगों का पर्व सब को प्रेम के रंग में रंगे ... दिलों का वैर मिटे जीने की उमंग जगे ...

दो हाथों के मध्य तुम्हारे
कंचन जैसे गाल
जाने कौन बात पे हो गये
अधरों जैसे लाल

स्पर्श मात्र को जाने तुमने
क्या समझा जो
सिमट गयीं तुम ऐसे जैसे
छुई मुई की डाल

प्रेम की लाली
बदन पे तेरे ऐसी बिखरी
बिन होली के रंग गया जैसे
कोई नेह गुलाल

अंग अंग से
अंकुर फुट रहे यौवन के
चंचल बलखाती इठलाती
हिरनी जैसी चाल

कारी बदरी ज्यों
चंदा को छू उड़ जाए
गालों से अठखेली करते
चंचल रेशम बाल

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

जो करते तर्क हैं बस तर्क की खातिर हमेशा ...

ठिठुरती रात में बैठे जला कर आग अक्सर
सुनाते हैं ग़मों में वो खुशी का राग अक्सर

हवा के बुलबुले नेताओं के वादे, इरादे
बहुत जल्दी उतर जाती है इनकी झाग अक्सर

प्रजा का तंत्र है या राजनीति की व्यवस्था
तिजोरी पर मिले हैं फन उठाए नाग अक्सर

जड़ों पर खून की छींटे हमेशा डालते हैं
उजड जाते हैं अपनी फसल से वो बाग अक्सर

व्यवस्था की तिजोरी हाथ में रहती है जिनके
वही रहते हैं दौरे वक्त में बेदाग़ अक्सर

जो करते तर्क हैं बस तर्क की खातिर हमेशा
नज़र आते हैं उनको चाँद में भी दाग अक्सर

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

वो सूरज से बगावत कर रहा है ...

कविता के दौर से निकल कर पेश है एक गज़ल ... आशा है आपको पसंद आएगी ...

अंधेरों की हिफाज़त कर रहा है
वो सूरज से बगावत कर रहा है

अभी देखा हैं मैंने इक शिकारी
परिंदों से शराफत कर रहा है

खड़ा है आँधियों में टिमटिमाता
कोई दीपक हिमाकत कर रहा है

गली के मोड पर रखता है मटके
वो कुछ ऐसे इबादत कर रहा है

वो कहता है किताबों में सजा कर
के तितली पर इनायत कर रहा है

अभी सीखा नहीं बंदे ने उड़ना
परिंदों की शिकायत कर रहा है

बुजुर्गों को सरों पे है बिठाता
शुरू से वो ज़ियारत कर रहा है

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

आज ...

कभी कभी
पंख लगा के उड़ता समय
आभास नहीं होने देता किसी विशेष दिन का
खास कर
जब दिन ऐसे बीत रहे हों की इससे अच्छे दिन हो ही नहीं सकते

ऐसे में अचानक ही जादुई कायनात
अपने इन्द्रधनुष में छेद कर
किसी विशेष दिन को और सतरंगी कर देती है

पता है आज सुबह से
हवा की सरगोशी रह रह के कुछ कहना चाह रही है
महकती बसंत पंख लगा के उड़ना चाहती है
ओस की बूंदों पे लिखा पैगाम
किसी के नाम करना चाहती है

तुम्हें तो मालुम ही है इसका राज़
फिर क्यों नहीं आ जातीं मेरे पहलू में

मुझे पता है आज सब तुमसे बात करना चाहते हैं
हो सके तो मुलाक़ात भी करना चाहते हैं

पर मैं

तुम्हें पलकों में बंद करके सो जाना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ सपनों की सतरंगी दुनिया में
खो जाना चाहता हूँ ...

तुम चलोगी न मेरे साथ

आज ...

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

नीली आँखें ...

भागना चाहता था मैं
समय के पंखों पे सवार हो कर
इतना दूर
की मेरा साया भी मुझे न ढूंढ सके

आँखे खुली रखना चाहता था
तू सपने में भी करीब न आ सके
डूबना चाहता था समुन्दर में
की होश भी बाकी न रह सके

मैंने कोशिश की

खुला आसमान देख कर भागा
नीले समुन्दर में छलांग भी लगाई
पर हर बार की तरह
तेरी आँखों की गहराई में फंस के रह गया
जिसके शांत पारदर्शी समुन्दर में
खुला आसमान साफ नज़र आता था

बुधवार, 25 जनवरी 2012

मेरा अस्तित्व ...

लम्हा लम्हा
तुम जलती रहीं
कतरा कतरा
मैं पिघलता रहा

बूँद बूँद टपकता मेरा अस्तित्व
धीरे धीरे समुन्दर सा होने लगा
मेरे होने का एहसास
कहीं गहरे में डूब गया

तुम अब भी जल रही हो

ये बात अलग है
तिल तिल ये समुन्दर अब सूखने लगा है
धुंवा धुंवा मेरा एहसास
अब खोने लगा है

गरमाने लगी है कायनात
सूख रहे हैं धरती के होठ

हाँ ... मुझे भी तो एक मूसलाधार बारिश की
सख्त जरूरत है

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

अहम या इमानदारी ...

जबकि मुझे लगता है
हमारी मंजिल एक थी
मैं आज भी नही जान सका
क्यों हमारा संवाद
वाद विवाद की सीमाएं लांघ कर
मौन में तब्दील हो गया

अतीत का कौन सा लम्हा
अँधेरा बन के तुम्हारी आँखों में पसर गया
प्रेम की बलखाती नदी
कब नाले में तब्दील हुयी
जान नहीं सका

जूते में लगी कील की तरह
आते जाते तुम पैरों में चुभने लगीं
हलकी सी चुभन जहर बन के नसों में दौड़ने लगी

रिश्तों के बादल
बरसे पर भिगो न सके

अब जबकि मैं
और शायद तुम भी
उसी चिंगारी की तलाश में हो
मैं चाहता हूँ की अतीत के तमाम लम्हे
जिस्म से उखड़ जाएं

पर क्या करूं
साए की तरह चिपकी यादें
जिस्म का साथ नहीं छोड़ रहीं

और सच कहूँ तो .... मुझे तो ये भी नहीं पता
ऐसी सोच मेरा अहम है या इमानदारी

बुधवार, 11 जनवरी 2012

कोयला खादान का एक मजदूर ...

आँखों में तैरती प्रश्नों की भीड़
मुँह में ज़ुबान रखने का अदम्य साहस

दिल में चिंगारी भर गर्मी
और जंगल जलाने का निश्चय

पहाड़ जैसी व्यवस्था
और दो दो हाथ करने की चाह
साँस लेता दमा
और हाथों में क्रांति का बिगुल

हथोड़े की चोट को
शब्दों में ढालने की जंगली जिद्द
जिस्म के पसीने से निकलती
गाड़े लाल रंग की बू

उसे तो मरना ही था

कोयले की खादान में रह कर
कमीज़ का रंग सफेद जो था...

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

बदलाव ...

वो रचना चाहते हैं नया इतिहास
पर नहीं भूलना चाहते
खरोच के निशान

बदलना चाहते हैं परम्पराएं
पर नहीं छोड़ना चाहते अधूरा विश्वास

बनाना चाहते हैं नए नियम
नहीं बदलना चाहते पुरानी परिपाटी

खुला रख के घावों को
करना चाहते हैं निर्माण

लहू के रंग से लिखना चाहते हैं
प्रेम की नयी इबारत

ज़ख़्मी ईंटों की नीव पे
खड़ा करना चाहते हैं
बुलंद इमारत

क्या सच में इतने मासूम हैं