बुधवार, 9 जनवरी 2013

साथ तेरा ...


होता तो मुझे था 
कुछ कुछ, हर बार    

कभी नाक बहती थी, कभी बुखार 
कभी भूत का डर तो कभी स्कूल की मार 
कभी नौकरी में समस्या 
कभी मासिक खर्च का भार 

मेरे किसी भी दुःख दर्द में 
तू तो हर वक़्त बस साथ होती थी 
सहलाती हुई 
दूर से मुस्कुराती हुई 

मन कहाँ मानता था 
तुझे कुछ हो भी सकता है 

गहरी खामोशी देख कर विश्वास न हुआ 
की तू इस दुनिया में नहीं है माँ 

हालांकि तेरे पास बैठे सब रो रहे थे   

आंसू तो शायद मेरे भी निकलने लगे थे 

पर एक मज़े की बात बताऊं    
इस बार भी दुःख मुझे ही हुवा    
और इस बार भी तू मेरे साथ ही थी 
दूर से मुस्कुराती हुई  

बुधवार, 2 जनवरी 2013

द्वंद्व ...


तमाम कोशिशों के बावजूद  
उस दीवार पे 
तेरी तस्वीर नहीं लगा पाया 

तूने तो देखा था 

चुपचाप खड़ी जो हो गई थीं मेरे साथ 
फोटो-फ्रेम से बाहर निकल के 

एक कील भी नहीं ठोक पाया था     
सूनी सपाट दीवार पे 

हालांकि हाथ चलने से मना नहीं कर रहे थे   
शायद दिमाग भी साथ दे रहा था 
पर मन ... 
वो तो उतारू था विद्रोह पे   

ओर मैं ... 

मैं भी समझ नहीं पाया 
कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं 
फ्रेम की चारदिवारी में    

तुम से बेहतर मन का द्वंद्व 
कौन समझ सकता है माँ ...  

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

एहसास ...


मेरे लिए खुशी का दिन 
और तुम्हारे लिए ... 

सालों बाद जब पहली बार घर की देहरी से बाहर निकला 
समझ नहीं पाया था तुम्हारी उदासी का कारण 

हालांकि तुम रोक लेतीं तो शायद रुक भी जाता 

या शायद नहीं भी रुकता ... 

पर मुझे याद है तुमने रोका नहीं था 
(वैसे व्यक्तिगत अनुभव से देर बाद समझ आया, 
माँ बाप तरक्की में रोड़ा नहीं डालते) 

सच कहूं तो उस दिन के बाद से   
अचानक यादों का सैलाब सा उमड़ आया था जेहन में 
गुज़रे पल अनायास ही दस्तक देने लगे थे  
हर लम्हा फांस बनके अटकने लगा था 
जो अनजाने ही जिया था सबके और तेरे साथ 

भविष्य के सपनों पर कब अतीत की यादें हावी हो गयीं   
पता नहीं चला  

खुशी के साथ चुपके से उदासी कैसे आ जाती है 
तब ही समझ सका था मैं 

जानता हूं वापस लौटना आसान था 
पर खुद-गर्जी ... या कुछ और ...

बहरहाल ... लौट नहीं पाया उस दिन से ... 

आज जब लौटना चाहता हूं 
तो लगता है देर हो गई है ... 

और अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...   

रविवार, 16 दिसंबर 2012

माँ ... तेरे जाने के बाद ...


सब कह रहे हैं 
तू इस लोक से 
परलोक की यात्रा पर अग्रसर है 

कर्म-कांड भी इस निमित्त हो रहे हैं   

पिंड से पिंड का मिलान 
साल भर रौशनी के लिए दीपक 
तीन सो पैंसठ नीम के दातुन 
और भी क्या क्या ...  

भवसागर सहजता से पार हो 
ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं सब 

पर तू तो बैठी है कोने में माँ   
शांत, चुप-चाप, टकटकी लगाये  

समझ सकता हूं 
तेरी उदासी का कारण 

कदम कदम पे तुझसे 
पूछ पूछ कर काम करने वाले 
तेरे मन की नहीं सुन रहे 
हो रहा है बंदोबस्त   
जबरन तेरी यात्रा का 

पर क्या तुझको भेजना संभव होगा ... 

असंभव को संभव करने का प्रयास 
अचानक हम दोनों मुस्कुरा उठते हैं ...  

रविवार, 9 दिसंबर 2012

माँ तो माँ है ...


मैंने देखा तुम मुस्कुरा रही हो 
देख रही हो हर वो रस्म 
जो तुम्हारी सांसों के जाने के साथ ही शुरू हो गयी थी 

समझ तो तुम भी गयीं थीं 
अब ज्यादा देर तुम्हें इस घर में नहीं टिका सकेंगे हम 
अंतिम संस्कार के बहाने 
बरसों से जुड़ा ये नाता 
कुछ पल से ज्यादा नहीं सहा जाएगा  

कुछ देर तक 
दूर से आने वालों का इंतज़ार 
अंतिम दर्शन 
फिर चार कन्धों की सवारी 

समय के बंधन में बंधे 
सौंप आएंगे तुझे अग्नि के हवाले 
तेरे शरीर के पूर्णत: चले जाने का 
इंतज़ार भी न कर सकेंगे  

जिंदगी लौट आएगी धीरे धीरे पुरानी रफ़्तार पे 

मुझे पता है 
तुम तब भी मुस्कुरा रही होगी ...    

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

माँ ...


पिछला कुछ समय शायद जीवन के सबसे कठिन दौर की तरह बीता है. अचानक ही २५ सितम्बर को मेरी माता जी का स्वर्गवास हो गया जिसके लिए मैं तैयार नहीं था. शायद ये ऐसा आघात है जिसके लिए इंसान कभी भी तैयार नहीं होता ... पर नियति कुछ ऐसी है की सहना पड़ता है.
सच कहूं तो मन अभी भी इस बात को मान नहीं रहा, लगता है जैसे एक खराब सपना था जिसे याद करने का भी मन नहीं होता. सोते, जागते, सोचते हुवे जब भी माँ को सोचता हूं ... उनसे उसी तरह से बात करता हुवा महसूस करता हूं जैसे पहले करता था ...    





सब कह रहे थे तू नहीं रही
पर तू तो वहीं थी 
मुस्कुराती हुई  

मैं रो रहा था ...
तू बोली रो क्यूँ रहा है 

इस कमरे में जाता तो दूसरे कमरे में टहलने लगती
वहाँ जाता तो इस कमरे में आ जाती

जब कोई कंधा देता  
तू बोल पड़ती
थक गया क्या ... चल कंधा दे 
कंधा देता तो बोलती “ज्यादा देर मत उठा थक जाएगा”

लकड़ी लगाते हुवे भी तू पास ही थी
कान में बुदबुदाई
कोई बात नहीं मुंह पे भी रख मोटी लकड़ी
शरीर है पूरा जलना जरूरी है

तू हर किसी के साथ नज़र आ रही थी  
उस वक्त भी
जब पूरी बिरादरी तिनका तोड़ के तेरे साथ
इस लोक का सम्बन्ध तोड़ रही थी

हमेशा की तरह मुस्कुराते हुवे  
तू कान में धीरे से बोली 

क्या तिनका तोड़ने से सम्बन्ध टूट जाते हैं ...?


मंगलवार, 25 सितंबर 2012

शाम, श्याम ...


छोटी बहर की गज़लों के क्रम में छोटी से छोटी बहर में कुछ कहने का प्रयोग किया है ... आशा है आपको पसंद आएगा ... 

शाम  
श्याम  

जप लो  
नाम  

बोल  
राम   

तू ही  
धाम  

सुर को  
थाम  

खोल   
जाम  

क्या है  
काम  

(गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से) 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

तन्हाई है ...


जो छाई है 
तन्हाई है 

घर की तुलसी 
मुरझाई है    

जो है टूटा  
अस्थाई है 

कल था पर्वत  
अब राई है 

अब शर्म नहीं  
चिकनाई है 

महका मौसम 
तू आई है 

दुल्हन देखो   
शरमाई है 

(गुरुदेव पंकज जी के सुझाव पे कुछ कमियों को दूर करने के बाद) 
  

बुधवार, 12 सितंबर 2012

आज के हालात ...


छोटी बहर की गज़लों के दौर में प्रस्तुत है एक और गज़ल, आशा है पसंद आयगी ...

आवाम हाहाकार है 
सब ओर भ्रष्टाचार है 

प्रतिपक्ष है ऐंठा हुवा 
सकते में ये सरकार है 

सेवक हैं जनता के मगर 
राजाओं सा व्यवहार है 

घेराव की न सोचना 
मुस्तैद पहरेदार है 

रोटी नहीं इस देश में 
मंहगी से मंहगी कार है 

मिल बाँट कर खाते हैं पर 
इन्कार है इन्कार है  

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

अजब ये सिलसिला क्यों ...


इरादा बुलबुला क्यों 
अजब ये सिलसिला क्यों   
  
झड़े पतझड़ में पत्ते 
हवा से है गिला क्यों 

फटे हैं जेब सारे 
हवा में है किला क्यों 

गए जो खुदकशी को 
उन्हें तिनका मिला क्यों 

शहर में दिन दहाड़े 
लुटा ये काफिला क्यों 

विरह की आग में फिर   
तपे बस उर्मिला क्यों 

छला तो इंद्र ने था 
अहिल्या ही शिला क्यों