मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

माँ ... एक रूप


याद नहीं तेरे होते 
कभी ईश्वर से कुछ माँगा 

हालांकि ऐसा नहीं 
की ईश्वर में आस्था नहीं   
पर तेरे आँचल का विस्तार इतना ज्यादा था 
की उसके बाहर जाने की 
ज़रूरत नहीं पड़ी 

सब कहते हैं 
ईश्वर को तो किसी ने देखा नहीं 
माँ ईश्वर का रूप ही होती ही  

शायद पागल हैं 

मुझसे पूछो  

होती तो बस माँ ही है 
जो जीते जी ईश्वर होती है 
ओर जब नहीं होती 
ईश्वर के नाम से होती है  

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

वो एक लम्हा ...


जब तक तुम साथ थीं 
बच्चों का बाप होने के बावजूद 
बच्चा ही रहा 

तेरे जाने के साथ 
ये बचपना भी अनायास साथ छोड़ गया 
उम्र के पायदान 
अब साफ़ नज़र आते हैं 

कहते हैं एक न एक दिन 
जाना तो सभी ने है  
समय तो सभी का आता है 

पर फिर भी मुझे   
शिकायत है वक़्त से 
क्यों नहीं दी माँ के जाने की आहट 
एक इशारा, एक झलक 

क्यों नहीं रूबरू कराया उस लम्हे से 

हालांकि रोक तो मैं भी नहीं पाता उसे
पर फिर भी ... 

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

कहाँ हो तुम ...


ये सड़कें, घर, फूल-पत्ते, अड़ोसी-पड़ोसी 
सभी तो उदास हैं 

तेरे चले जाने के बाद  
लगा की इस शहर में लौटने की वजह खत्म हो गई   
बीती उम्र की पक्की डोर ... झटके में टूट गई  

पर ऐसा हो न सका 

कुछ ही दिनों में 
शहर की हर बात याद आने लगी 
यादों का सैलाब 
हर वो मुकाम दिखाने लगा 
जहाँ की खुली हवा में तूने सांस लेना सिखाया        
ऊँगली पकड़ के चलना सिखाया   

लौटने को मजबूर हो गया उन रास्तों पर  

हालांकि जहाँ तुम नहीं हो   
उस शहर आना आसान नहीं 

पर न आऊं तो जी पाना भी तो मुमकिन नहीं  

क्या करूं ... 
अजीब सी प्यास सताती है अब हर वक़्त 
बंजारा मन कहीं टिक नहीं पाता 

सुना है इन तारों में अब तुम भी शामिल हो 
कहाँ हो तुम माँ ... 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

माँ का साया ...


धूप तब भी नहीं चुभी 
की साया था तेरी घनी छाँव का 
मेरे आसमान पर  

ओर धूप तेरे जाने के बाद भी नहीं चुभी 
की तेरी यादों की धुंध   
बादलों की घनी छाँव बन के 
डटी रही सूरज के आगे   

जानता हूं 
समय की बेलगाम रफ़्तार ने 
सांसों के प्रवाह से 
तुझे मुक्त कर दिया   

पर मेरे वजूद में शामिल तेरा अंश 

मेरे रहते 
आसान तो न होगा 
उसे मुक्त करना ...    

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

माँ का दिल ...


कहते हैं गंगा मिलन
मुक्ति का मार्ग है

कनखल पे अस्थियां प्रवाहित करते समय
इक पल को ऐसा लगा
सचमुच तुम हमसे दूर जा रही हो ...

इस नश्वर संसार से मुक्त होना चाहती हो
सत्य की खोज में
श्रृष्टि से एकाकार होना चाहती हो

पर गंगा के तेज प्रवाह के साथ
तुम तो केवल सागर से मिलना चाहती थीं
उसमें समा जाना चाहती थीं

जानतीं थीं
गंगा सागर से अरब सागर का सफर
चुटकियों में तय हो जाएगा    
उसके बाद तुम दुबई के सागर में
फिर से मेरे के करीब होंगी ...    

किसी ने सच कहा है
अपनी माँ के दिल को जानना
मुश्किल नहीं ...  

(१३ वर्षों से दुबई रहते हुवे मन में ऐसे भाव उठाना स्वाभाविक है) 

बुधवार, 16 जनवरी 2013

बता ... क्या करूं ...


तूने मेरा हाथ पकड़ा 
मैं चलने लगा 
फिर चलता गया, चलता गया, चलता गया 

पता नही कब हाथ छूटा    

या मैंने छुड़ा लिया ... 

आँख खुली तो तन्हा सड़क पे हांफ रहा था 

अजनबी आँखों की चुभन 
घात लगाए खूनी पंजे 

जानता हूं इस सब से बचने का ढंग माँ 

तूने ही तो सिखाया था 
जीने का अंदाज़ 
हालात से जूझने का संकल्प 

इन सब से पार पा लूँगा 
मुश्किलें भी आसान कर लूँगा 

पर एक बार फिर से 
तेरी ऊँगली पकड़ने का मन कर रहा है 
बच्चा होने का मन कर रहा है 

बता क्या करूं ... 
   

बुधवार, 9 जनवरी 2013

साथ तेरा ...


होता तो मुझे था 
कुछ कुछ, हर बार    

कभी नाक बहती थी, कभी बुखार 
कभी भूत का डर तो कभी स्कूल की मार 
कभी नौकरी में समस्या 
कभी मासिक खर्च का भार 

मेरे किसी भी दुःख दर्द में 
तू तो हर वक़्त बस साथ होती थी 
सहलाती हुई 
दूर से मुस्कुराती हुई 

मन कहाँ मानता था 
तुझे कुछ हो भी सकता है 

गहरी खामोशी देख कर विश्वास न हुआ 
की तू इस दुनिया में नहीं है माँ 

हालांकि तेरे पास बैठे सब रो रहे थे   

आंसू तो शायद मेरे भी निकलने लगे थे 

पर एक मज़े की बात बताऊं    
इस बार भी दुःख मुझे ही हुवा    
और इस बार भी तू मेरे साथ ही थी 
दूर से मुस्कुराती हुई  

बुधवार, 2 जनवरी 2013

द्वंद्व ...


तमाम कोशिशों के बावजूद  
उस दीवार पे 
तेरी तस्वीर नहीं लगा पाया 

तूने तो देखा था 

चुपचाप खड़ी जो हो गई थीं मेरे साथ 
फोटो-फ्रेम से बाहर निकल के 

एक कील भी नहीं ठोक पाया था     
सूनी सपाट दीवार पे 

हालांकि हाथ चलने से मना नहीं कर रहे थे   
शायद दिमाग भी साथ दे रहा था 
पर मन ... 
वो तो उतारू था विद्रोह पे   

ओर मैं ... 

मैं भी समझ नहीं पाया 
कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं 
फ्रेम की चारदिवारी में    

तुम से बेहतर मन का द्वंद्व 
कौन समझ सकता है माँ ...  

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

एहसास ...


मेरे लिए खुशी का दिन 
और तुम्हारे लिए ... 

सालों बाद जब पहली बार घर की देहरी से बाहर निकला 
समझ नहीं पाया था तुम्हारी उदासी का कारण 

हालांकि तुम रोक लेतीं तो शायद रुक भी जाता 

या शायद नहीं भी रुकता ... 

पर मुझे याद है तुमने रोका नहीं था 
(वैसे व्यक्तिगत अनुभव से देर बाद समझ आया, 
माँ बाप तरक्की में रोड़ा नहीं डालते) 

सच कहूं तो उस दिन के बाद से   
अचानक यादों का सैलाब सा उमड़ आया था जेहन में 
गुज़रे पल अनायास ही दस्तक देने लगे थे  
हर लम्हा फांस बनके अटकने लगा था 
जो अनजाने ही जिया था सबके और तेरे साथ 

भविष्य के सपनों पर कब अतीत की यादें हावी हो गयीं   
पता नहीं चला  

खुशी के साथ चुपके से उदासी कैसे आ जाती है 
तब ही समझ सका था मैं 

जानता हूं वापस लौटना आसान था 
पर खुद-गर्जी ... या कुछ और ...

बहरहाल ... लौट नहीं पाया उस दिन से ... 

आज जब लौटना चाहता हूं 
तो लगता है देर हो गई है ... 

और अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...   

रविवार, 16 दिसंबर 2012

माँ ... तेरे जाने के बाद ...


सब कह रहे हैं 
तू इस लोक से 
परलोक की यात्रा पर अग्रसर है 

कर्म-कांड भी इस निमित्त हो रहे हैं   

पिंड से पिंड का मिलान 
साल भर रौशनी के लिए दीपक 
तीन सो पैंसठ नीम के दातुन 
और भी क्या क्या ...  

भवसागर सहजता से पार हो 
ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं सब 

पर तू तो बैठी है कोने में माँ   
शांत, चुप-चाप, टकटकी लगाये  

समझ सकता हूं 
तेरी उदासी का कारण 

कदम कदम पे तुझसे 
पूछ पूछ कर काम करने वाले 
तेरे मन की नहीं सुन रहे 
हो रहा है बंदोबस्त   
जबरन तेरी यात्रा का 

पर क्या तुझको भेजना संभव होगा ... 

असंभव को संभव करने का प्रयास 
अचानक हम दोनों मुस्कुरा उठते हैं ...