मंगलवार, 18 जून 2013

नाता ...

अब्बू के तो पाँव है छूता, माँ से लाड लड़ाता है 
अपने-पन का ये कैसा फिर माँ बेटे का नाता है 

डरता है या कर ना पाता, अब्बू से मन की बातें 
आगे पीछे माँ से पर वो सारे किस्से गाता है 

हाथ नहीं हो अब्बू का जैसे इंसान बनाने में 
सबके आगे बस वो अपनी माँ का राग सुनाता है 

मुश्किल हो या दुख जितना अब्बू से बाँट नहीं पाता 
बिन बोले माँ के सीने लग के हल्का हो जाता है 

उम्र के साथ वो अब्बू जितना हो जाता है पर फिर भी   
माँ के आगे अपने को फिर भी बच्चा ही पाता है   

ऐसी तो है बात नहीं की अब्बू से है प्यार नहीं    
माँ के आगे पर बेटे को कोई नहीं फिर भाता है 

मंगलवार, 11 जून 2013

पूछना ना क्या गलत है क्या सही है ...

माँ मेरी ये बात मुझको कह गई है 
जो मिले वो हंस के लो मिलना वही है 

दर्द के उस छोर पे सुख भी मिलेगा  
रुक न जाना जिंदगी चलती रही है  

कोशिशें गर हों कहीं भागीरथी सी     
धार गंगा की वहां हो कर बही है 

चलते चलते पांव में छाले पड़ेंगे 
ये समझना आजमाइश की घड़ी है   

दुख पहाड़ों सा अगर जो सामने हो 
सोच लेना तिफ्ल है कुछ भी नहीं है 

वक़्त के फरमान तो आते रहेंगे 
पूछना ना क्या गलत है क्या सही है 


सोमवार, 27 मई 2013

काजल रोज़ लगाने का मन करता है ...


तुझसे लाड लड़ाने का मन करता है 
बचपन में फिर जाने का मन करता है 
तेरा आना मुश्किल है फिर भी अम्मा 
तुझको पास बुलाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

याद है नानी जब जब घर में आती थी 
तू उस दिन खुद भी बच्चा बन जाती थी 
गाती थी जिन गीतों को तू मस्ती में   
उन गीतों को गाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

लग न जाए नज़र लगाती थी काजल 
लगता था उस वक़्त की अम्मा है पागल 
अब जब सर पे नहीं रहा कोई आँचल 
काजल रोज़ लगाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

करता हूं महसूस तेरा साया अक्सर 
राह में जब भी आता है कोई पत्थर 
कांटे जब जब करते हैं मुझको विचलित 
तेरी गोदी जाने का मन करता है 
तुझसे लाड लड़ाने का ... 

सोमवार, 20 मई 2013

पत्ते, आँगन, तुलसी माँ ...


चौंका, बर्तन, पूजा, मंदिर, पत्ते, आँगन, तुलसी माँ, 
सब्जी, रोटी, मिर्च, मसाला, मीठे में फिर बरफी माँ, 

बिस्तर, दातुन, खाना, पीना, एक टांग पे खड़ी हुई,   
वर्दी, टाई, बस्ता, जूते, रिब्बन, चोटी, कसती माँ,  

दादा दादी, बापू, चाचा, भईया, दीदी, पिंकी, मैं, 
बहु सुनो तो, अजी सुनो तो, उसकी मेरी सुनती माँ,  

धूप, हवा, बरसात, अंधेरा, सुख, दुख, छाया, जीवन में, 
नीव, दिवारें, सोफा, कुर्सी, छत, दरवाजे, खिड़की माँ,   

मन की आशा, मीठे सपने, हवन समिग्री जीवन की, 
चिंतन, मंथन, लक्ष्य निरंतर, दीप-शिखा सी जलती माँ, 

कितना कुछ देखा जीवन में, घर की देहरी के भीतर, 
इन सब से अंजान कहीं फिर, बैठी स्वैटर बुनती माँ, 

रविवार, 12 मई 2013

मातृ दिवस ...


सब कह रहे हैं 
आज मातृ दिवस है 

तुझे याद करने का दिन 

पर याद तो तब किया जाता है न माँ 
जब किसी को भूला जाए 
तो क्या जो आज का दिन मनाते हैं 
भूल चुके हैं माँ को ...? 

या आज के दिन याद करके 
फिर से भुलाने की तैयारी में हैं माँ को ...? 

शायद ये कोशिश हैं मनाने की उस परपरा को 
जहां माँ तो फिर भी माँ ही रहती है 
पर भूल जाते हैं बच्चे अपने बेटे होने का फ़र्ज़ 

और किसी एक दिन के सहारे ही सही   
उस एहसास को याद कराना भी तो जरूरी है 

हालांकि ये अपनी परंपरा नहीं 
पर तू तो जानती है समय के चक्र को 
परिवर्तन के नियम को 
जिसने घेर लिया है 
हम सबको भी अपने चक्र में 

वैसे भी जब हर दिन तू रहती है साथ 
याद आती है किसी न किसी बहाने  
तो आज एक और बहाने से भी तुझे याद करूं 
कोई बुराई तो नहीं इस बात में ... 

मुझे मालुम है तू हंस रही है आज ...   

सोमवार, 6 मई 2013

भीनी यादें ...


नाज़ुक सा था नाक हमेशा बहती थी 
पल्लू थामें रीं रीं रीं रीं करता था 
धुँधला सा है याद मुझे अब भी अम्मा 
तेरे आगे पीछे फिरता रहता था  

हलकी सी जब चोट कहीं लग जाती थी 
घंटों गोदी में ले कर बहलाती थी  
तेरी आँखें भी गीली हो जाती थीं 
मेरी आँखों से जब आंसू गिरता था 
धुंधला सा है याद ..... 

हिंदी, इंग्लिश, गणित पढाती थी मुझको 
पीटी, गाना, खेल सिखाती थी मुझको 
रोज़ नए पकवान खिलाती थी मुझको 
मन ही मन मैं तेरी पूजा करता था 
धुंधला स है याद .....

बिन मांगे ही सब कुछ तू दे देती थी 
पता नहीं कैसे सब कुछ सुन लेती थी 
ज्ञानी है तू या फिर अंतर्यामी है 
मेरे दिल को अक्सर ऐसा लगता था 
धुंधला सा है याद .....

मेरी बातों को तू सुनती रहती थी 
जाने कौन से सपने बुनती रहती थी 
साथ सदा तू मेरे जागा करती थी 
पढ़ने को जब चार बजे में उठता था 
धुंधला सा है याद .....

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

वक़्त के आगे भला किसकी चली है ...


घर की देहरी से कहां बाहर गई है 
नीव का पत्थर ही बन के माँ रही है 

बचपने में डांट के रोती थी खुद भी 
अब नहीं वो डांटती मुझको कभी है   

घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी 
अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है 

दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी  
घर में जब तक साथ वो मेरे रही है  

रोक लेता मैं अगर ये बस में होता 
वक़्त के आगे भला किसकी चली है 

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

घर की हर शै गीत उसी के गाती है ...


कई मित्रों का आग्रह था की गज़ल नहीं लिखी बहुत समय से ... इसलिए प्रस्तुत है एक गज़ल ... विषय तो वही है जिसकी स्मृति हमेशा मन में सहती है ... 

सुख दे कर वो दुःख सबके ले आती है
अम्मा चुपके से सबको सहलाती है

कर देती है अपने आँचल का साया 
तकलीफों की धूप घनी जब छाती है

अपना दुःख भी दुःख है, याद नहीं रखती 
सबके दुःख में यूं शामिल हो जाती है

पहले बापू की पत्नी, फिर मेरी माँ
अब वो बच्चों की दादी कहलाती है

सुख, दुःख, छाया, धूप यहीं है, स्वर्ग यहीं
घर की देहरी से कब बाहर जाती है

सूना सूना रहता है घर उसके बिन 
घर की हर शै गीत उसी के गाती है  

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

सुकून की तलाश ...


कितना सुकून देता है उन सड़कों पे लौटना 
जहां लिखा करते थे खडिया से अपना नाम कभी   
हाथ बढा के आसमान को छू लेने का होंसला लिए 
गुज़र जाता था वक़्त 
समय पे अपने निशान छोड़ता 

यही तो थी वो सड़क जहां तूने चलना सिखाया था 
वादियों से वापस आती अपनी ही आवाज़ें हम सफर होती हैं 
कोई साथ न हो तो भी परछाइयां साथ देती हैं 
तूने ही तो कहा था 

तभी तो इस तन्हा सफर मे तन्हाइयों का एहसास 
डस नहीं पाया, डरा नहीं पाया       

वैसे भी तेरे कहे के आगे, मैंने सोचा नहीं 

सच पूछो तो उन ब्रह्म-वाक्यों के सहारे 
जीवन कितना सहज हो जाता है, अब तक महसूस कर रहा हूं 

अपने छिले हुए घुटनों को देख 
बढ़ जाती है शिद्दत, उन तमाम रस्तों पे लौटने की 
चाहता हूं वहां उम्र के उस दौर में जाना   
जब फिर से किसी की ऊँगली की जरूरत हो मुझे 
  
मैं जानता हूं तुम्हारी ऊँगली नहीं मिलने वाली माँ 
पर तेरा अक्स लिए 
मेरी बेटी तो है उन सड़कों पे ले जाने के लिए ... 
     

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

कुछ बेवजह की बातें ...


लगा तो लेता तेरी तस्वीर दीवार पर 
जो दिल के कोने वाले हिस्से से 
कर पाता तुझे बाहर 

कैद कर देता लकड़ी के फ्रेम में 
न महसूस होती अगर    
तेरे क़दमों की सुगबुगाहट   
घर के उस कोने से 
जहां मंदिर की घंटियाँ सी बजती रहती हैं    

भूल जाता माँ तुझे 
न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक 
या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता   
अपने अक्स से झांकता तेरा चेहरा 
  
की भूल तो सकता था रौशनी का एहसास भी   
जो होती न कभी सुबह 
या भूल जाता सूरज अपने आने की वजह   

ऐसी ही कितनी बेवजह बातों का जवाब 
किसी के पास नहीं होता