सोमवार, 16 सितंबर 2013

समझती है अभी भी पांचवीं में पढ़ रहा हूं मैं ...

बुढापे में भी बच्चा हूं मुझे ऐसे निहारेगी 
कभी लल्ला, कभी राजा मुझे अम्मा पुकारेगी 

मेरी माँ पे असर होता नहीं है बात का कोई 
में घर लौटूं नज़र हर हाल में मेरी उतारेगी 

समझती है अभी भी पांचवीं में पढ़ रहा हूं मैं 
नहा करके जो निकलूँ बाल वो मेरे संवारेगी 
 
कभी परदेस से लौटूं नहीं घर देर हो जाए 
परेशानी में अम्मा रात आँखों में गुजारेगी 

जहां तुलसी लगाई पेड़ पीपल का लगाया था 
अभी भी अपने हाथों से उस आँगन को बुहारेगी 

उदासी का सबब खामोश रह के जान लेगी फिर    
छुपा के अपने आँचल में वो होले से दुलारेगी 


सोमवार, 9 सितंबर 2013

कोशिश - माँ को समेटने की ...

तू साथ खड़ी मुस्कुरा रही थी    
तेरा अस्थि-कलश जब घर न रख के 
मंदिर रखवाया गया  

यकीन जानना    
वो तुझे घर से बाहर करने की साजिश नहीं थी   

बरसों पुराने इस घर से 
जहाँ की हर शै में तू ही तू है 
तुझे दूर भी कैसे कर सकता था कोई  

देख ... 
मुस्कुरा तो तू अब भी रही है      
देख रही है अपनी चीज़ों को झपट लेने का खेल 

तुझसे बेहतर ये कौन समझ सकता है 
ये तेरे वजूद को मिटा देने की योजना नही 

सब जानते हैं अपने होते हुए 
कमी रहने ही नहीं दी तूने किसी भी चीज़ की  

ये तो तेरे एहसास को समेट लेने की एक कोशिश है 
तुझसे जुड़े रहने का एक बहाना 
  
तभी तो तेरी संजीवनी को सब रखना चाहते है अपने करीब 
ताकि तू रह सके ... हमेशा उनके पास, उनके साथ ... 

  

सोमवार, 2 सितंबर 2013

समय ...

एक ही झटके में सिखा दीं वो तमाम बातें 
समय ने 
सीख नहीं सका, बालों में सफेदी आने के बावजूद 
उस पर मज़े की बात      
न कोई अध्यापक, न किताब, न रटने का सिलसिला 
जब तक समझ पाता, छप गया पूरा पाठ दिमाग में 
जिंदगी भर न भूलने के लिए   

सोचता था पा लूँगा हर वो चीज़ समय से लड़ के 
जो लेना चाहता हूं 
समय के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुआ 
हालांकि तू हमेशा कहती रही समय की कद्र करने की ... 

सच तो ये है की सपने में भी नहीं सोच सका 
रह पाऊंगा तेरे बगेर एक भी दिन    
पर सिखा दिया समय ने, न सिर्फ जीना, बल्कि जीते भी रहना 
तेरे चले जाने के बाद भी इस दुनिया में 

तू अक्सर कहा करती थी वक़्त की मार का इलाज 
हकीम लुकमान के पास भी नहीं ...    
समय की करनी के आगे सर झुकाना पड़ता है ... 

सही कहती थी माँ 
समय के एक ही वार ने हर बात सिखा दी 
   

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

हादसे जो राह में मिलते रहे ...

फूल बन के उम्र भर खिलते रहे 
माँ की छाया में जो हम पलते रहे 

बुझ गई जो रौशनी घर की कभी   
हौंसले माँ के सदा जलते रहे 

यूं ही सीखोगे हुनर चलने का तुम 
बचपने में पांव जो छिलते रहे 

साथ में चलती रही माँ की दुआ 
काफिले उम्मीद के चलते रहे 

हर कदम हर मोड़ पे माँ साथ थी 
उन्नती के रास्ते खुलते रहे  

माँ बदल देती है खुशियों में उन्हें 
हादसे जो राह में मिलते रहे  

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

यात्रा ...

गुस्सा तो है पर तू निष्ठुर नहीं ... 
अक्सर ऐसा तुम कहा करती थीं माँ   

पर पता नहीं कैसे एक ही दिन में इतना बदलाव आ गया 
तुम भी चलीं गयीं 
और मैंने भी जाने दिया 

कर दिया अग्नी के हवाले उस शरीर को 
जिसका कभी मैं हिस्सा था   
याद भी न आई वो थपकी 
जिसके बिना करवटें बदलता था 
वो गोदी, जहाँ घंटों चैन की नीद लेता था    

उस दिन सबके बीच 
(जब सब कह रहे थे ये तुम्हारी अंतिम यात्रा की तैयारी है) 
कुछ पल भी तुम्हें रोके ना रख सका 

ज़माने के रस्मों रिवाज़ जो निभाने थे   

कहा तो था सबने पर सच बताना 
क्या वो सच में तुम्हारी अंतिम यात्रा थी ...?  

पता है ... उस भीड़ में, मैं भी शामिल था ... 
    

रविवार, 4 अगस्त 2013

सपना माँ का ...

मैं देखता था सपने कुछ बनने के 
भाई भी देखता था कुछ ऐसे ही सपने 
बहन देखती थी कुछ सपने जो मैं नहीं जान सका 
पर माँ जरूर जानती थी उन्हें, बिना जाने ही   

सपने तो पिताजी भी देखते थे हमारे भविष्य के 
एक छोटे से मकान के, सुखी परिवार के    
समाज में, रिश्तेदारी में एक मुकाम के 

हर किसी के पास अपने सपनों की गठरी थी 
सबको अपने सपनों से लगाव था, 
अनंत फैलाव था, जहां चाहते थे सब छलांग लगाना 
वो सब कुछ पाना, जिसकी वो करते थे कल्पना 

ऐसा नहीं की माँ नहीं देखती थी सपने 
वो न सिर्फ देखती थी, बल्कि दुआ भी मांगती थी उनके पूरे होने की 
मैं तो ये भी जानता हूं ...   
हम सब में बस वो ही थीं, जो सतत प्रयास भी करती थी 
अपने सपनों को पूर्णतः पा लेने की 

हाँ ... ये सच है की एक ही सपना था माँ का   
और ये बात मेरे साथ साथ घर के सब जानते थे   
और वो सपना था ... 
हम सब के सपने पूरे होने का सपना  
उसके हाथ हमारे सपने पूरे होने की दुआ में ही उठते रहे   

हालंकि सपने तो मैं अब भी देखता हूँ 
शायद मेरे सपने पूरे होने की दुआ में उठने वाले हाथ भी हैं     

पर मेरे सपने पूरे हों ... 
बस ऐसा ही सपने देखने वाली माँ नहीं है अब ... 

  

बुधवार, 24 जुलाई 2013

वत्सल काया ...

पता होता है उन्हें 
की रौशनी का एक जलता चिराग जरूर होता है अंधेरे के उस छोर पे 
जहां बदलने लगती है जीवन की आशा, घोर निराशा में 
की मुश्किलों की आंच से जलने वाला चराग   
उस काया ने ही तो रक्खा होता है दिल के किसी सुनसान कोने में 

पता होता है उन्हें 
की नहीं मिलते खुशियों के खजाने उस तिलिस्मी दुनिया से   
जिसका दरवाज़ा बस, बस में है अलीबाबा के 
उन चालिस चोरों के अलावा 
की जिंदगी की हर शै मैं बिखरी खुशियां ढूँढने का फन 
चुपचाप उस काया ने ही उतारा होता है गहरे कहीं    

पता होता है उन्हें  
की कट जाएंगे जिंदगी के तमाम ऊबड़ खाबड़ रस्ते, सहज ही 
की उस खुरदरी सतह पे चलने का हुनर भी सिखाया होता है उसी काया ने   

ओर फिर साथ होता है एहसास, उस काया का  
जो कभी अकेला नहीं होने देता 

पंछी जब छोड के जाते हैं घोंसला, लौटने के लिए 
तो पता होता है उन्हें की खड़ी होगी झुर्रियों से लदी वत्सल काया     
असीसों से लदे दो हाथ उठाये, उनके इंतज़ार में 

तैयार तो मैं भी था, (या शायद नहीं था) लौटने को उस घरोंदे में 
पर देर तो हो ही गई थी मुझसे   

उस वत्सल काय की जगह, अब तेरी तस्वीर टंगी है माँ  

बुधवार, 17 जुलाई 2013

माँ

रात में दादी के पांव दबाती   
पिता के कमजोर कंधे मजबूती से थामे 
घर की चरमराती दिवार हाथों पे उठाए  
पैरों में चक्री लगाए हर शै में नज़र आती 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी   

महीने की पहली तारीख 
सिगरेट के पैसे निकालने का बाद 
बची पगार माँ के हाथ में थमाने के अलावा 
पिताजी बस खेलते थे ताश 
(हालांकि ये शिकायत नहीं, 
और माँ को तो बिलकुल नहीं) 
कभी नहीं देखा उन्होंने खर्चे का हिसाब 
मेरी बिमारी से लेकर मुन्नी की किताबों का जवाब 
सब कुछ अपने सर पे रक्खे 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी 

हालांकि होता था पापा का नाम  
बिरादरी में लगने वाले हर तमगे के पीछे 
मेरे नम्बरों से लेकर मुन्नी के मधुर व्यवहार तक 
कई बार देखा है पापा को अपनी पीठ थपथपाते 
पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ 
जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं 

सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से 

भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते 
  

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

माँ का हिस्सा ...

मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी    
वो बनाती रही, मैं खाता रहा    
न मैं रुका, न वो 
उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ   

सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में  
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत प्रयास      
बिना कहे, बिना सोचे, बिना किसी दर्द के   

कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है   
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया 
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से   
हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया 

अब जब वो नहीं है मेरे साथ 
पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं 

हां ... इतना जानता हूं 
वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई 
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में 

सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं 
पर विश्वास है माँ की कोशिश पे 
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन 

और फिर ... 
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं 

बुधवार, 3 जुलाई 2013

यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी ...

अपने मन की बातें तब तब बोलती थी    
यादों की खिड़की जब अम्मा खोलती थी 

गीत पुरानी फिल्मों के जब गाती थी 
अल्हड बचपन में खुद को ले जाती थी 
कानों में जैसे शक्कर सा घोलती थी   
यादों की खिड़की ... 

मुश्किल न हो घर में उसके रहने से  
ठेस न लग जाए उसके कुछ कहने से  
कहने से पहले बातों को तोलती थी  
यादों की खिड़की ... 

नब्बे के दद्दा थे, बापू सत्तर के  
लग जाती थी चोट, फर्श थे पत्थर के     
साठ की अम्मा पर घूंघट में डोलती थी   
यादों की खिड़की ...