सोमवार, 24 मार्च 2014

जानना प्रेम को ...

प्रेम का क्या कोई स्वरुप है? कोई शरीर जिसे महसूस किया जा सके, छुआ जा सके ... या वो एक सम्मोहन है ... गहरी  नींद में जाने से ठीक पहले कि एक अवस्था, जहाँ सोते हुवे भी जागृत होता है मन ... क्या सच में प्रेम है, या है एक माया कृष्ण की जहाँ बस गोपियाँ ही गोपियाँ हैं, चिर-आनंद की अवस्था है ... फिर मैं ... मैं क्या हूँ ... तुम्हारी माया में बंधा कृष्ण, या कृष्ण सम्मोहन में बंधी राधा ... पर जब प्रेम है, कृष्ण है, राधा है, गोपियाँ हैं, मैं हूँ, तू है ... तो क्या जरूरी है जानना प्रेम को ...


कई बार करता हूँ कोशिश
कैनवस के बे-रँग परदे पे तुझे नए शेड में उतारने की

चेतन मन बैठा देता है तुझे पास की ही मुंडेर पर
कायनात के चटख रँग लपेटे

शुरू होती है फिर एक जद्दोजहद चेतन और अवचेतन के बीच
गुजरते समय के साथ उतरने लगते हैं समय के रँग

शून्य होने लगता है तेरा अक्स
खुद-ब-खुद घुल जाते हैं रँग
उतर आती है तू साँस लेती कैनवस के बे-रँग परदे पर
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
पूजा कि थाली हाथों में लिए
पलकें झुकाए सादगी भरे रूप में

सच बताना जानाँ
क्या रुका हुआ है समय तभी से
या आई है तू सच में मेरे सामने इस रूप में ...?       

मंगलवार, 18 मार्च 2014

दास्ताँ ...

प्रेम राधा ने किया, कृष्ण ने भी ... मीरा ने भी, हीर और लैला ने भी ... पात्र बदलते रहे समय के साथ प्रेम नहीं ... वो तो रह गया अंतरिक्ष में ... इस ब्रह्मांड में किसी न किसी रूप में ... भाग्यवान होते हैं वो पात्र जिनका चयन करता है प्रेम, पुनः अवतरित होने के लिए ... तुम भी तो एक ऐसी ही रचना थीं सृष्टि की ...


वो सर्दियों की शाम थी
सफ़ेद बादलों के पीछे छुपा सूरज
बेताब था कुछ सुनने को

गहरी लंबी खामोशी के बाद
मेरा हाथ अपने हाथों में थामे तुमने कहा

आई लव यु

उसके बाद भी मुंदी पलकों के बीच
बहुत देर तक हिलते रहे तुम्हारे होंठ
पर खत्म हो गए थे सब संवाद उस पल के बाद
थम गयीं थी सरगोशियाँ कायनात की

मत पूछना मुझसे
उस धुंधली सी शाम कि दास्ताँ

कुछ मंज़र आसान नहीं होते उतारना
थोड़ी पड़ जाती हैं सोलह कलाएँ
गुम जाते हैं सारे शब्द कायनात के



सोमवार, 10 मार्च 2014

पूरी होती एक दुआ ...

कुछ बातों को ज़हन में आने से रोकना मुमकिन नहीं होता ... कुछ पल हमेशा तैरते रहते हैं यादों के गलियारे में ... कुछ एहसास भी मुद्दतों ताज़ा रहते हैं ... ज़िंदगी गिने-चुने लम्हों के सहारे भी बिताई जा सकती है बशर्ते उन लम्हों में तुम हो और हो पूरी होती एक दुआ ...

चाहता हूँ तुम बनो शहजादी
कि सोना चाहता हूँ तुम्हारी बाहों को सिरहाना बना कर
पूरब की खिड़की पे डाल देना अँधेरे का पर्दा
रोक लेना ये चाँद ज़िंदगी के फिसल जाने तक
कि लेना चाहता हूँ इक लंबी नींद
तुमसे लिपट कर

आसमान से गिरते हर तारे के साथ
रख देता हूँ एक दुआ
कि देखता होगा मेरी दुआओं का "खाता" कोई
कुछ तो होगा निज़ाम इस दुनिया को बनाने वाले का
माँ अक्सर कहा करती थी किस्मत वाला हूँ मैं

मीलों फैला रेत का पीला समुन्दर
इसलिए भी मुझे अच्छा लगने लगा है
कि बना सकता हूँ तेरे अनगिनत मिट्टी के पुतले
कि डालना चाहता हूँ उनमें जान
कि मांगी हैं लाखों दुआएं उस खुदा से
कुछ पल को कायनात का निज़ाम पाने की

  

सोमवार, 3 मार्च 2014

एक बात ... ज़रूरी है जो ...

पचपन डिग्री पारे में रेत के रेगिस्तान पे चलते हुए अगर मरीचिका न मिले तो क्या चलना आसान होगा ... तुम भी न हो और हो सपने देखने पे पाबंदी ... ऐसे तो नहीं चलती साँसें ... जरूरी होता है एक हल्का सा झटका कभी कभी, रुकी हुई सूइयाँ चलाने के लिए ...


वो मेरे इंतज़ार का दरख़्त था
सर्दियों में भी फूल नहीं खिले उस पर
हालाँकि उसकी घनी छाँव में पनपने वाली झाड़ी
लदी रहती थी लाल फूलों से

सुनो सफ़ेद पँखों वाली चिड़िया
बसंत से पहले  
उनकी चिट्ठी जरूर लाना

आने वाले पतझड़ के मौसम में
जरूरी है पलाश का खिलना  

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

यादों के झरोखे से ...

लोग अक्सर कहते हैं यादों के अनगिनत लम्हों पर धूल की परत चढती रहती है ... समय की धीमी चाल शरीर पे लगा हर घाव धीरे धीरे भर देती है ... पर क्या सचमुच ऐसा ही होता है ... समय बीतता है ... या बीतते हैं हम ... बीतती है उम्र, ये शरीर, हाथ-पाँव, आँखें जिनमें उतर आती है मोतिये की धूल ... पर यादें ... उनका क्या ... धार-दार होती रहती हैं समय की साथ ... तभी तो तुम्हारी तस्वीर भी बूढी नहीं हुई समय की साथ ... तुम भी तो वैसे की वैसी ही हो यादों में ...  


पपड़ी पपड़ी झर गया समय
तुम्हारी तस्वीर के आस-पास की दिवार से
झड़ जाती है जैसे उम्र भर की रौशनी
दो कत्थई आँखों के उजाले से
फिसल जाता है स्याह नशा
आवारा से उड़ते रूखे बालों से
और उड़ जाती है चेहरे की नमी
अन-गिनत झुर्रियों के निशान छोड़ के

हालाँकि ताज़ा है वो गहरा एहसास
जिसके इर्द-गिर्द बुने थे कुछ लम्हे
समय की मौजूदगी में
प्रेम को हाजिर-नाजिर जान के

उसी समय का हवाला दे कर
डूब जाना चाहता हूँ मैं ... लंबी प्रार्थना में
क्योंकि सब कुछ बदल कर भी
नहीं बदली तुम्हारी तस्वीर समय ने
एक उम्मीद, एक चाहत से टिकी रहती है नज़र
शायद लौटेगी तुम बीती पगडण्डी पर

दुःख का घुमंतू बादल भी तो लौट आते हैं
बरस दर बरस बरसने को ...


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मेरी वेलेंटाइन...

प्रेम किसी एक दिन का मोहताज नहीं ... जब सब कुछ लगा हो दाव पर तो हर लम्हा उस प्रेम को सजीव करने का प्रयास करता है ... प्रकृति का हर रंग प्रेम के रंग में घुलने लगता है और एक नई कायनात अंगड़ाई लेती है ... वो तेरी और मेरी कायनात नहीं ... बस होती है तो प्रेम की ... और प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, कोई एक नाम नहीं होता ... जैसे तुम्हारा भी तो कोई नाम नहीं ... कभी जानाँ, कभी जंगली गुलाब तो कभी अनीता (मेरी वो, मेरी एजी) या कभी ...

वेलेंटाइन ...
सुनो मेरी वेलेंटाइन

घास पे लिखी है इक कहानी
ओस की बूँदों से मैंने

फिजाँ में घुलने से पहले
तुम चहल-कदमी कर आना
बेरंग पानी की बूँदों में
मुहब्बत के रँग भर आना

रोक लूँगा कुछ घड़ी
ये बादे-सबा
थाम लूँगा इक लम्हा
कुनमुनाती धूप

तुम चुपके से कहानी के
किरदार में समा जाना

सुनो मेरी वेलेंटाइन
ज़िंदगी बन के आना ...  

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कुछ एहसास ...

खुद से बातें करते हुए कई बार सोचा प्रेम क्या है ... अंजान पगडंडी पे हाथों में हाथ डाले यूँ ही चलते रहना ... या किसी खूबसूरत बे-शक्ल के साथ कल्पना की लंबी उड़ान पे सात समुंदर पार निकल जाना ... किसी शांत नदी के मुहाने कस के इक दूजे का हाथ थामे सूरज को धीरे धीरे पानी में पिघलते देखना ... या बिना कुछ कहे इक दूजे के हर दर्द को हँसते हुए पी लेना ... बिना आवाज़ कभी उस जगह पे खड़े मिलना जहाँ शिद्दत से किसी के साथ की ज़रूरत हो ... कुछ ऐसे ही तो था अपना रिश्ता जहाँ ये समझने की चाहत नहीं थी की प्रेम क्या है ...

लिख तो लेता कितने ही ग्रन्थ
जो महसूस कर पाता कुछ दिन का तेरा जाना

कह देता कविता हर रोज़ तुझ पर
जो सोच पाता खुद को तेरे से अलग

शब्द उग आते अपने आप
जो गूंजती न होती तेरी जादुई आवाज़
मेरे एहसास के इर्द-गिर्द

तुम पूछती हो हर बार
क्यों नहीं लिखी कविता मेरे पे, बस मेरे पे

चलो आज लिख देता हूँ वो कविता
बंद करके अपनी आखें, देखो मन की आँखों से मेरी ओर
और पढ़ लो ज़िंदगी की सजीव कविता
तुम्हारी और मेरी सम्पूर्ण कविता

सुनो ...
अब न कहना तुम पे कविता नहीं लिखता

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

कागज़ों में योजना अच्छी नहीं ...

फिर मिलन की कामना अच्छी नहीं
दर्द की संभावना अच्छी नहीं

हो सके तो कर्म का सन्धान हो
बस उदर की साधना अच्छी नहीं

शूल भी लेने पड़ेंगे साथ में
पुष्प की ही चाहना अच्छी नहीं

आज तेरा कल किसी के पास है
अर्थ की आराधना अच्छी नहीं

वो बने जो हो सके कार्यान्वित
कागज़ों में योजना अच्छी नहीं

कर नहीं सकते तो क्यों हो बोलते
व्यर्थ की आलोचना अच्छी नहीं

ये न होगा वो न होगा ये कठिन
मन में ये अवधारणा अच्छी नहीं 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए ...

इकट्ठा हो गए हैं लोग तो तक़रीर हो जाए
करो इतनी मेहरबानी जुबां शमशीर हो जाए

जो दिल की आग है इतना जले की रौशनी बनके
मेरा चेहरा मेरे ज़ज़्बात की तहरीर हो जाए

सभी के हाथ में होती है किस्मत की भी इक रेखा
जो किस्मत में नहीं क्यों चाहते जागीर हो जाए

इनायत हो तेरी मुझको सिफत इतनी अता कर दे
लिखूँ जो हूबहू वैसी मेरी तकदीर हो जाए

कहाँ बनते हैं राँझा आज के इस दौर में आशिक
मगर सब चाहते माशूक उनकी हीर हो जाए

गज़ल कहता हूँ पर मेरे खुदा इतनी इनायत कर
मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए

सोमवार, 20 जनवरी 2014

कायनात का ये कौन चित्रकार है ...

इक हसीन हादसे का वो शिकार है
कह रहे हैं लोग सब की वो बीमार है

शाल ओढ़ के ज़मीं पे चाँद आ गया
आज हुस्न पे तेरे गज़ब निखार है

जल तरंग बज रही है खिल रही हिना
वादियों में गुनगुना रहा ये प्यार है

चाँद की शरारतों का हो रहा असर
बिन पिए नशा है छा रहा ख़ुमार है

तू ही तू है, तू ही तू है, तू ही हर कहीं
जिस्मों जाँ पे अब तेरा ही इख्तियार है

हर कली, नदी, फिजाँ, बहार कह रही
कायनात का ये कौन चित्रकार है