रविवार, 27 जुलाई 2014

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है ...

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है
फिर भी कितना थोड़ा है

बाबस्ता यादें उस से
घर जो हमने छोड़ा है

परदेसी हो कर जाना
कौन सा नाता तोड़ा है

शहरों के रास्तों पर तो
हर कोई बस रोड़ा है

गुमनामी में है जिसने
तूफां का रुख मोड़ा है

उसके दोड़े घर चलता
वो जुम्मन का घोड़ा है

तंग हैं उनके दिल उतने
जितना आँगन चौड़ा है

रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है


सोमवार, 14 जुलाई 2014

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब ...

किसी के हाथ में ख़ंजर, कहीं फरमान होता है
तुम्हारी दोस्ती में ये बड़ा नुक्सान होता है

नहीं आसान इसकी सरहदों तक भी पहुँच पाना
बुलंदी का इलाका इसलिए सुनसान होता है

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब
शहर का आइना ये देख कर हैरान होता है

जो तिनके के सहारे तैरने का दम नहीं रखते
भंवर में थामना उनको कहाँ आसान होता है

लड़कपन बीत जाता है, जवानी भी नहीं रहती
बुढापा उम्र भर इस जिस्म का मेहमान होता है 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

खटखटाते रहो, खटखटाते रहो ...

प्रेम का गीत है, गीत गाते रहो
गुनगुनाते रहो, गुनगुनाते रहो

तितलियों ने कहा, फूल को चूम कर
खिलखिलाते रहो, खिलखिलाते रहो

रात जुगनू से बोली, सहर आने तक
झिलमिलाते रहो, झिलमिलाते रहो

पंछियों को जगा कर, ये बोली किरन
चहचहाते रहो, चहचहाते रहो

सर्द मौसम कहे, धूप के कान में
कुनमुनाते रहो, कुनमुनाते रहो

दिल में ख़ंजर उतारा कहा प्यार से
मुस्कुराते रहो, मुस्कुराते रहो

दिल की कुण्डी कभी तो खुलेगी सुनो
खटखटाते रहो, खटखटाते रहो

सोमवार, 30 जून 2014

दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया ...

पानी हवा थी धूप पनपना नहीं आया
गमले के फूल को तो महकना नहीं आया

जो सोचते थे कैद नहीं, घर है ये पिंजरा
उनको खुली हवा में चहकना नहीं आया

तलवार की तो धार पे चलते रहे थे हम
उनकी गली से हमको गुज़ारना नहीं आया

रह रह के मुझे दिख रहा है एक ही चेहरा
कैसे कहूं की दिल को धड़कना नहीं आया

मजबूत छत भिगो न सके तोड़ दी झुग्गी
गुस्ताख़ बादलों को बरसना नहीं आया

अरमान हैं ये दिल के या गीली सी है लकड़ी
मुद्दत से जल रही है धधकना नहीं आया

ज़ुल्मों सितम पे खून यहाँ खौलता तो है
दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया



सोमवार, 9 जून 2014

शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है ...

अँधेरों को यही एहसासे-ज़िल्लत हो रही है
शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है

कभी शर्मा के छुप जाना कभी हौले से छूना
न ना ना ना यकीनन ही मुहब्बत हो रही है

मेरी आवारगी की गुफ्तगू में नाम तेरा
अदब से ही लिया था पर मज़म्मत हो रही है

चुना है रास्ता कैसा, पड़ी है क्या किसी को
बुलंदी पर जो हैं उनकी ही इज्ज़त हो रही है

यहाँ पर कहकहों का शोर है लेकिन अदब से
ये कैसा घर है पहरे में मसर्रत हो रही है

उकूबत है हिमाकत या बगावत है दिये की
हवा के सामने आने की ज़ुर्रत हो रही है

झुकी पलकें, खुले गेसू, दुपट्टा आसमानी
ये दुनिया तो तेरे आने से जन्नत हो रही है


सोमवार, 2 जून 2014

कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या ...

खौफ़ की चादर तले बुलबुल कहेगी क्या
काट दोगे पंख तो चिड़िया उड़ेगी क्या

बीज, मिट्टी, खाद सब कुछ है मगर फिर भी
खून से सींचोगे तो सरसों उगेगी क्या

दिन तो निकलेगा अँधेरी रात हो जितनी
बादलों से रोशनी यूँ रुक सकेगी क्या

बोलनी होगी तुम्हें ये दास्ताँ अपनी
तुम नहीं बोलोगे तो दुनिया सुनेगी क्या

सामने चुप पीठ पीछे जहर सी बातें
यूँ हवा दोगे तो चिंगारी बुझेगी क्या

जुस्तजू को यूँ न परखो हर कदम पर तुम
कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या

सोमवार, 19 मई 2014

पर सजा का हाथ में फरमान है ...

काठ के पुतलों में कितनी जान है
देख कर हर आइना हैरान है

कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

मैं चिरागों की तरह जलता रहा
क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
छोड़ कर जाना बहुत आसान है

जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
पर सजा का हाथ में फरमान है 

सोमवार, 12 मई 2014

सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं ...

मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं

मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं

है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं

वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं

रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं

चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं 

मंगलवार, 6 मई 2014

दो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

दो जमा दो पाँच जब होने लगे
अंक अपने मायने खोने लगे

कौन रखवाली करेगा घर कि जब
बेच के घोड़े सभी सोने लगे

मुश्किलों का क्या करोगे सामना
चोट से पहले ही जो रोने लगे

फैलती है सत्य की खुशबू सदा
झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
दुश्मनी के बीज जो बोने लगे