सोमवार, 3 नवंबर 2014

गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता ...

ये माना साथ निभाना हमें नहीं आता
किसी को छोड़ के जाना हमें नहीं आता

वो जिसकी जेब में खंजर ज़ुबान पर मिश्री
उसी से हाथ मिलाना हमें नहीं आता

मिलेगी हमको जो किस्मत में लिखी है शोहरत
किसी के ख्वाब चुराना हमें नहीं आता

हुनर है दर्द से खुशियों को खींच लाने का
विरह के गीत सुनाना हमें नहीं आता

खुदा का शुक्र है इन बाजुओं में जुंबिश है
निवाला छीन के खाना हमें नहीं आता

इसे ग़ज़ल न कहो है फकत ये तुकबंदी
गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं ...

गर्दनों पे आरियाँ चारों तरफ हैं
खून की पिचकारियाँ चारों तरफ हैं

ना किलेबंदी करें तो क्या करें हम
युद्ध की तैयारियाँ चारों तरफ हैं

जिस तरफ देखो तबाही ही तबाही
वक़्त की दुश्वारियाँ चारों तरफ हैं

गौर से रखना कदम दामन बचाना
राख में चिंगारियाँ चारों तरफ हैं

जेब में है माल तो फिर इश्क़ करना
हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं 

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना ...

हसीनों की निगाहों से गुज़रना
है मुश्किल डूब के फिर से उभरना

वो जिसने आँख भर देखा नहीं हो
उसी के इश्क में बनना संवरना

तुम्हें जो टूटने का शौंक है तो
किसी के ख्वाब में फिर से उतरना

किसी कागज़ की कश्ती के सहारे
न इस मझधार में लंबा ठहरना

समझदारी कहाँ है पंछियों के
बिना ही बात पंखों को कुतरना

रहूँ चाहे कहीं पर दिल ये मांगे
मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना


सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को ...

बुझा दो रोशनी छेड़ो नहीं सोए पतंगों को
जगा देती हैं दो आँखें जवाँ दिल की उमंगों को

जो जीना चाहते हो ज़िन्दगी की हर ख़ुशी दिल से
जरा रोशन करो उजड़ी हुई दिल की सुरंगों को

जिसे मेहनत की आदत है उसे ये राज़ मालुम है
बुलंदी दे ही देती है हवा उड़ती पतंगों को

दबा दो लाख मिटटी में सुलग उठते हैं अंगारे
छुपाना है नहीं आसान उल्फत की तरंगों को

ये खुशबू, फूल, तितली, रेत, सागर, आसमां, मिटटी
ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

समय ...

समय की ताकत को पहचानने वाले पल, बस कुछ ही आते हैं जीवन में ... आज की तारीख के बारे में सोचता हूँ तो कुछ ऐसा ही महसूस होता है ... बीतते बीतते आज माँ से बिछड़े दो साल हो ही गए ... हालांकि उस दीवार पर आज भी उनकी फोटो नहीं लगा पाया ... स्वर्गीय, श्रधांजलि जैसे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करने से पहले घबराहट होने लगती है ... ये जरूर है की सोचते सोचते कई बार संवाद जरूर करने लगता हूँ माँ के साथ विशेष कर जब जब उसका तर्क समय की ताकत को पहचानने के लिए होता है ...


मुझे पाता है
तुम कहीं नहीं जाओगी

हालांकि जो कुछ भी तुम्हारे बस में था
उससे कहीं ज्यादा कर चुकी हो हम सब के लिए

सच मायने में जो हमारा फ़र्ज़ था
तुम तो वो भी कर चुकी हो
बिना बताए, बिना जतलाए

तुमसे बेहतर कौन जानता था हमारी क्षमता को

इसी विश्वास के बल पे कह रहा हूँ
तुम रहोगी आस पास हमेशा हमेशा के लिए

वैसे भी माँ को बच्चों से दूर
कौन रख सका है भला ... 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी ...

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी



मंगलवार, 9 सितंबर 2014

ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं ...

शामिल हूँ खेल में अभी बीमार मैं नहीं
हारा अनेक बार पर इस बार मैं नही

माना हजूम है तो क्या कुछ कायदे तो हैं
झंडा भले है हाथ में सरदार मैं नहीं

हूँ आज भी टिका हुआ सच के ही जोर पर
ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं

माना ये ज़िंदगी, ख़ुशी, ये गम तुझी से है
ये दोस्ती ही है तुम्हारा प्यार मैं नहीं

खुद चल के ही मुकाम पाना चाहता हूँ मैं
घुटनों में दर्द है तो क्या लाचार मैं नहीं

सीने में दर्द है तो है, रोने में हर्ज क्या
चुपचाप गम को सह सकूँ किरदार मैं नहीं

बुधवार, 3 सितंबर 2014

जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या ...

हौंसला है तो उतर पतवार से होता है क्या
जीत लम्बी हो तो छोटी हार से होता है क्या

हर शिकन मिट जाएगी, ये घाव भी भर जाएगा
आज़मा के देख मेरे प्यार से होता है क्या

बूँद ना बन जाए फिर सैलाब इसको रोक लो
फिर न कहना आँसुओं की धार से होता है क्या

वक़्त रहते ही समझ लो मुख़्तसर सी बात है
खुल के बोलो प्यार है, इज़हार से होता है क्या

जीत उसकी है जो पहले वार का रखता है दम
तेज़ चाहे धार हो, तलवार से होता है क्या

थाल पूजा का लिए जो दूर से है देखती
जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या

रविवार, 10 अगस्त 2014

बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है ...

जम कर पसीना बाजुओं से जब निकलता है
मुश्किल से तब जाकर कहीं ये फूल खिलता है

ये बात सच है तुम इसे मानो के ना मानो
बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है

कुछ हौंसला, अरमान कुछ, कुछ ख्वाहिशें दिल की
तूफ़ान में यूँ ही नहीं तो दीप जलता है

ये थी शरारात, दिल्लगी या इश्क़ जो भी हो
बस ख्वाब उनका ही मेरी आँखों में पलता है

दिन भर की अपनी आग, अपनी तिश्नगी लेकर
तपता हुआ सूरज समुंदर में पिघलता है  

रविवार, 3 अगस्त 2014

वक़्त को आज़मा के देखो तो ...

दर्द में मुस्कुरा के देखो तो
गीत खुशियों के गा के देखो तो

जीत लोगे तमाम दुनिया तुम
दाव खुद पे लगा के देखो तो

हौंसला है तो साथ देता है
वक़्त को आज़मा के देखो तो

हद भी होती है ज़ुल्म सहने की
शान से सर उठा के देखो तो

उसमें अपना ही अक्स दिखता है
माँ के नज़दीक जा के देखो तो

बाप दे देगा जो भी मांगोगे
तुम कभी सर झुका के देखो तो