गुरुवार, 18 जून 2015

सुनहरी सफ़र-नामा ...

चमकते मकान, लम्बी कारें, हर तरह की सुविधाएँ, दुनिया नाप लेने की ललक, पैसा इतना की खरीद सकें सब कुछ ... क्या जिंदगी इतनी भर है ... प्रेम, इश्क, मुहब्बत, लव ... इनकी कोई जगह है ... या कोई ज़रुरत है ... और है तो कब तक ... कन्फ्यूज़न ही कन्फ्यूज़न उम्र के उतराव पर ... पर होने को तो उम्र के चढ़ाव पर भी हो सकता है ...

इससे पहले की झरने लगे प्रेम का ख़ुमार
शांत हो जाए तबाही मचाता इश्क का सैलाब
टूटने लगें मुद्दतों से खिलते जंगली गुलाब
धुंधलाने लगें ज़िंदगी की किताब पे लिखे आसमानी हर्फ़
उतरने लगे आँखों में हकीकत का मोतिया
कडुवा सच लिए "अल्जाइमर" की खौफनाक चालें
जला डालें खुशबू भरी यादों के हसीन मंज़र

खड़ी कर लेना मुहब्बत की चमचमाती इमारत

घूम आना उन तमान रास्तों पर
जहां इश्क की गर्मी से जंगली फूल खिला करते थे
बसा लेना चौंच लड़ाते पंछियों की कुछ यादें
कैद कर लेना पलकें झुकाए सादगी भरा उनका रूप
 
पुराने किले की किसी ऊंची सी लाल मीनार पर
खोद आना नुकीले पत्थर से अपना नाम

की करना है दर्ज वर्तमान होते इतिहास में
अपनी मुहब्बत का भूला बिसरा सुनहरी सफ़र-नाम




सोमवार, 8 जून 2015

अनकहे सच ...

हर प्रेम की इन्तहा मिलन तो नहीं ... फिसलन भरी राह कुछ पलों में जीवन गाथा से गुज़र जाती है पर बीते समय की हर गाथा सुहानी हो, जरूरी नहीं ... हर अतीत की याद मीठी हो, ये भी तो जरूरी नहीं ...

खुद की तलाश में
समय की काली पगडण्डी पर
इतना पीछे लौट गया की
बिखरी यादों के गोखरू पैरों को लहू-लुहान करने लगे
गुज़रे लम्हों के आवारा भूत ठेंगा दिखाने लगे

चुपके चुपके चलता बे-आवाज पदचापों का शोर
सीसा डालने के बावजूद बहरा करने लगा
जगह जगह बिखरे सपनों के अधजले कचरे सड़ांध मारने लगे
सांस लेने की मजबूरी में तेरी खुशबू लिपटी हवा
फेफड़ों को खोखला करने लगी

जीने मरने की कसमों के सियारी पद-चाप
विश्वास के जंगली कुत्तों की गुर्राहट

झपट्टा मारने को तैयार
प्रेम की खूनी इबारत से हांफती खूंखार बिल्लियाँ
दबे पाँव मुझको घेरने लगीं

चाँद की पीली रौशनी और तेरे बादली साए की धुंध के बीच
अनगिनत शक्लें बदलता समय
तेरे ही अक्स में तब्दील होने लगा

पलटी हुयी सफ़ेद आँखों की चुभन
काले बालों का बढ़ता जंगल
और नैपथ्य से आती विद्रूप हंसी की आवाजें
मुझे अपने आप से खींचने लगीं हैं

घुटन बढ़ने लगी है  ...

यकायक दूर से आती
फड़फड़ाते पन्नों की आवाज चुप हो जाती है
डायरी के पन्नों में इतिहास होता वर्तमान
साँस लेने लगता है


     

रविवार, 31 मई 2015

सैडिस्टिक प्लेज़र ...

लड़ना, हारना, बदलना फिर लड़ना वो भी अपने आप से ... परास्त होते होते मजा आने लगता है अपनी हार पर, अपनी जुस्तजू पर ... कई बार जब संवेदना मर जाती है ये मजा शैतानी मजे में बदल जाता है पर फिर भी हारता तो खुद ही है इंसान ...

कई बार
चैहरे को खूँटी पे टांग
पैरों को दरवाजे पे उतार
देह से विदेह
स्वयं को देखने की कोशिश में
खो देता हूँ अपना अस्तित्व

हर बार
खाली कमजोर शरीर में
कलुषित विचार
अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं
विचारों को कुंठित करने वाले जिवाणु
शब्दों का अपहरण कर
मनचाहा लिखवा लेते हैं

खुद को पाने की कोशिश में
"जो होना चाहता हूँ" का सौदा करता हूँ
"जो नहीं होना चाहता" का मुखौटा लगाता हूँ
फिर कई दिन
अंतर्द्वंद की विभीषिका में जीता हूँ

शब्दों की अग्नि सुलगते सुलगते
फिर कर देती है उद्वेलित
देह से विदेह हो
फिर स्वयं को देखता हूँ
कुछ और जीवाणुओं से लड़ता हूँ
परास्त होता हूँ
नया सौदा करता हूँ

हाँ ... सौदा करना नहीं छोड़ता
सैडिस्टिक प्लेज़र नाम की चीज़ भी तो होती है ...

  

मंगलवार, 19 मई 2015

ईगो ...

ज़िंदगी क्या इतनी है के दूजे की पहल का इंतज़ार करते रहो ... और वो भी कब तक ... प्रेम नहीं, ऐसा तो नहीं ... यादों से मिटा दिया, ऐसा भी नहीं ... तो फिर क्यों खड़ी हो जाती है कोई दीवार, बाँट देती है जो दुनिया को आधा-आधा ...

दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इंच भर की दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल नहीं होती

जरूरी है तो बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
बहुत ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना      

गुरुवार, 14 मई 2015

किस्सा रोज का ...

संवेदना ... कुछ वर्षों में ये शब्द, शायद शब्दकोष में ढूंढना पड़े ... वैसे तो आज भी मुश्किल से दिखाई देता है ... पर क्यों ... क्या हम कबूतर हैं? आँखें मूंदे रहेंगे और बिल्ली नहीं देखेगी ... दूसरों के साथ होता है ये सब, हमारे साथ तो कभी हो ही नहीं सकता ... और अगर हो गया तो ... क्या हमारा इतिहास भी ऐसा ही होने वाला है ...

भरा पूरा दिन
सरकारी हस्पताल से एक किलोमीटर दूर
मौत से जूझती चंद सांसें
जीवन की जद्दोजहद
भीड़ से आती फुसफुसाहट

"हे भगवान ... कितना खून बह रहा है"
"अरे भाई कोई पुलिस को बुलाओ"
"अरे किसी ने कार का नंबर नोट किया क्या"
"हाय कितना तड़प रहा है बेचारा"
"लोग अंधों की तरह गाड़ी चलाते हैं"
"जरा देखो सांस चल रही है की नहीं"
"क्या जमाना आ गया भाई"
"चलो भाई चलो क्या मजमा लगा रक्खा है"
"अरे ऑटो रिक्शा जरा साइड हो"
बिना बात ही ट्रेफिक जाम कर दिया
वैसे ही आज ऑफिस की देर हो गई

अगले दस मिनटों में भीड़ छटने लगी
तड़पता जिस्म भी ठंडा हो गया
सड़क से गुजरने वाली गाड़ियां
बच बच के निकलने लगीं
शाम होते होते म्यूनिस्पेल्टी वाले
लाश उठा ले गए

रोज़ की तरह चलती रफ़्तार
वैसे हो चलती रही जैसे कुछ हुआ ही नहीं

शुक्रवार, 1 मई 2015

मजदूर ...

रस्म निभाई के लिए एक दिन कुछ कर लेना क्या उस दिन का मज़ाक उड़ाना नहीं ... या कहीं ऐसा तो नहीं कम से कम एक दिन और हर साल उसी दिन को मनाना, अनसुलझे विषय को निरंतर जिन्दा रखने की जद्दोजहद हो ... जो भी हो काश ऐसी क्रांति आए की दिन मनाने की परंपरा ख़त्म हो सके समस्या के समाधान के साथ ...

वो अपने समय का
मशहूर मजदूर नेता था
आग उगलते नारों के चलते
कई बार अखबार की सुर्खियाँ बना

धुंआ उगलती चिमनियों के
नुक्कड़ वाले खोखे पे
रात उसकी लाश मिली

उसकी जागीर में थी
टूटी कलम
क्रांतिकारियों के कुछ पुराने चित्र
मजदूर शोषण पे लिखी
ढेर सारी रद्दी
पीले पड़ चुके पन्नों की कुछ किताबें
जो जोड़ी हवाई चप्पल
मैला कुचेला कुरता
और खून से लिखे विचार

आज एक बार फिर
वो शहर की अखबार में छपा

पर इस बार लावारिस लाश की
शिनाख्त वाले कॉलम में 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

कुछ तस्वीरें ...

इंसान की खुद पे पाबंदी कभी कामयाब नहीं होती ... कभी कभी तो तोड़ने की जिद्द इतनी हावी हो जाती है की पता नहीं चलता कौन टूटा ... सपना, कांच या जिंदगी ... फुसरत के लम्हे आसानी से नही मिलते ... खुद से करने को ढेरों बातें  ... काश टूटने से पहले पूरी हो चाहत ...  

सिगरेट के धुंए से बनती तस्वीर
शक्ल मिलते ही
फूंक मार के तहस नहस

हालांकि आ चुकी होती हो तब तब
मेरे ज़ेहन में तुम

दागे हुए प्रश्नों का अंजाना डर
ताकत का गुमान की मैं भी मिटा सकता हूँ
या "सेडस्टिक प्लेज़र"

तस्वीर नहीं बनती तो भी बनता हूँ
(मिटानी जो है)

सच क्या है कुछ पता नहीं
पर मुझे बादल भी अच्छे नहीं लगते
शक्लें बनाते फिरते हैं आसमान में
कभी कभी तो जम ही जाते हैं एक जगह
एक ही तस्वीर बनाए
शरीर पे लगे गहरे घाव की तरह

फूंक मारते मारते अक्सर बेहाल हो जाता हूँ
सांस जब अटकने लगती है
कसम लेता हूँ बादलों को ना देखने की

पर कम्बख्त ये सिगरेट नहीं छूटेगी मुझसे ...

रविवार, 19 अप्रैल 2015

चीथड़े यादों के ...

सोचो ... यदि उम्र बांटते हुए यादें संजोने के शक्ति न देता ऊपर वाला तो क्या होता ... ठूंठ जैसा खुश्क इंसान ... सच तो ये है की यादें बहुत कुछ कर जाती हैं ... दिन बीत जाता है पलक झपकते और रात ... कितने एहसास जगा जाती है ... कई बार सोचता हूँ उम्र से लम्बी यादें न हों तो जिंदगी कैसे कटे ...

पता नही वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
बेफिक्री से घुस आती हो कम्बल में
दौड़ती रहती हो फिर जिस्म की रग-रग में पूरी रात
जागते और सोएपन के एहसास के बीच
मुद्दतों का सफ़र आसानी से तय हो जाता है

अजीब सा आलस लिए आती है जब सुबह
अँधेरे का काला पैरहन ओढ़े तुम लुप्त हो जाती हो
बासी रात का बोझिल एहसास
रात होने के भ्रम से बहार नहीं आने देता

(हालांकि कह नहीं सकता ... ये भी हो सकता है की मैं उस
भ्रम से बाहर नहीं आना चाहता)

तमाम खिड़कियाँ खोलने पर भी पसरी रहती है सुस्ती
कभी बिस्तर, तो कभी कुर्सी पर
कभी कभी तो हवाई चप्पल पर
(कम्बख्त चिपक के रह जाती है फर्श से)

पता नहीं वो तुम होती हो या तुम्हारी याद
पर दिन के सुजाग लम्हों में
यादों के ये चीथड़े
जिस्म से उखाड़ फैकने का मन नहीं करता ...

रविवार, 12 अप्रैल 2015

शब्दों के नए अर्थ ...

कितना अच्छा है ख़्वाबों में रहना ... अपनी बनाई दुनिया जहाँ हर कोई हो बस मोहरा ... मन चाहा करवा लिया ... जब चाह बदल दिया ... उठा दिया, सुला लिया ... जो सोचा हूबहू वैसा ही हुआ ...

चलो मिल कर
शब्दों को दें नए अर्थ, नए नाम
क्रांति की बातों में कायरता का एहसास हो
विप्लव के स्वरों में रुदन का गान

दोस्ती के मायने दुश्मनी
(गलत है पर सच है)
प्यार के अर्थ में बेवफाई की बू आए
(पर ये हो शुरूआती मतलब ...
अंत तक तो प्यार वैसे भी बेवफाई में बदल जाता है)

फूल का कहें पत्ता
पत्ते को काँटा और काँटे का नाम फूल
(शायद ये ठीक नहीं ...  दोनों एक सा ही चुभते हैं)

भुखमरी, गरीबी, जहर, बीमारी
मजदूर, जनता, भिखारी
सब को बना दें पर्यायवाची शब्द
(मतलब एक सा जो है)

भ्रष्टाचार को ईमानदार
(नहीं नहीं ... शब्दों के अर्थों में कुछ फर्क तो होना चाहिए)

नेता को मदारी
(वो तो अब भी है)
नहीं तो सांप, नहीं तो लोमड़ी
(ये भी मिलते जुलते शब्द हैं)
तो चलो भगवान
(वो तो अब भी अपने आप को मानते हैं)
लगता है "नेता" शब्द को नए अर्थ देना आसान नहीं
(चलिए दुबारा लौटते हैं इसे नया अर्थ देने)

हाँ तो अगला शब्द ...

आम को करेला
और अन्य सभी फलों को भी करेले के समूह का फल
(इतने कडुवे जो हो गए हैं)

गेहूं दाल और सब्जियों को भी मिथक सा नाम दे दें
(किताबों में भी छोड़ने हैं कुछ शब्द)

सुबह को बोले रात और रात को भी रात
(गुम जो है "सुबह" अनगिनत जिंदगियों से)

धूप ...
अरे इसके तो बहुत से अर्थ मिल जायेंगे
जरा दिमाग के घोड़े दौडाएं

ऐसे ही अनगिनत शब्दों को मिल कर नए अर्थ दें
क्या पता जिंदगी बदले न बदले
कुछ मायने ही बदल जाएँ

हाँ ... अगर "बदल" शब्द के मायने नहीं बदले तो ...

रविवार, 5 अप्रैल 2015

विचार ...

तपस्या जरूरी है सृजन के लिए और क्रांति के लिए ... विचार ... एक ऐसा विचार जो लेता रहे सांस दिल के किसी कोने में ... सतत सुलगने की आकांक्षा लिए ... आग जैसे धधकने की चाहत लिए ... महामारी सा फ़ैल जाने की उन्माद लिए ...

उधार के शब्दों से
विप्लव नहीं आता
परिवर्तन की लहर
आग के दरिया से उठनी जरूरी है

कुंद विचार
दासता की बेड़ी नहीं काट पाते
चासनी में डूबी लेखनी
गहरे अर्थ नहीं लिख पाती

क्रांति लिखने को
जरूरी है स्याही का लाल होना
कलम का तलवार होना
कागज़ के बदले
सख्त सीने की चट्टान होना

तब कहीं जाकर धरती की कोख से
अंगार के बीज पनपते हैं

निर्माण की प्रक्रिया
प्रसव पीड़ा से कम नहीं