रविवार, 12 जुलाई 2015

सोच लो ताज हो न ये सर का ...

रास्ता जब तलाशने निकले
खुद के क़दमों को नापने निकले

रोक लेते जो रोकना होता
हम तो थे सब के सामने निकले

जिंदगी दांव पे लगा डाली
इश्क में हम भी हारने निकले

कब से पसरा हुआ है सन्नाटा
चीख तो कोई मारने निकले

चाँद उतरा है झील में देखो
लोग पत्थर उछालने निकले

सोच लो ताज हो न ये सर का
तुम जो बोझा उतारने निकले

रविवार, 5 जुलाई 2015

दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए ...

कविताओं के दौर से निकल कर प्रस्तुत है एक गज़ल, आशा है आप को पसंद आएगी ...

बाज़ुओं को तोल कर बोझा उठाना सीखिए
रुख हवा का देख कर कश्ती चलाना सीखिए

गम के बादल आज हैं कल धुप होगी गुनगुनी
दर्द होठों पर छुपा कर मुस्कुराना सीखिए

ज़िंदगी देती है मौका हर किसी इंसान को
लक्ष्य पर ही भेद हो ऐसा निशाना सीखिए

वादियों की हर अदा में प्रेम का संगीत है
पंछियों के साथ मिल कर गुनगुनाना सीखिए

ज़िंदगी में क्या पता फिर कौन से हालात हों
दुश्मनी को भूल कर रिश्ते बनाना सीखिए
 



सोमवार, 29 जून 2015

बुन्दा

हर पुराने को समेट के रखना क्या ठीक है ... फिर उन्ही पुरानी चीज़ों को बार बार देखना, फिर से सहेजना, क्या ये ठीक है ... क्या चीज़ों का, यादों का कूड़ा दर्द के अलावा कुछ देता है ... सहेजने के बाद क्या निकाल फैंकना आसान है इन्हें ... शायद हाँ, शायद ना ...

मुश्किल होता है
पुरानी दराज़ साफ़ करना
बेतरतीब बिखरी यादों के अनगिनत सफे
कुछ को फाड़ देना
कुछ को सीधे कचरे में ठेल देना
और कुछ को ...
अपनी ही नज़र बचा के सहेज लेना

यादें फैंकना
जिस्म से कई हजार साँसें नौच लेने के बराबर होता है
हालांकि उम्र फिर भी ख़त्म होने का नाम नहीं लेती

याद है अमावस की वो काली रात
मेरे सीने से लग के रोते रोते
तुम्हारे कान का बुन्दा अटक गया था मेरी कमीज़ के साथ
उस दिन नज़र बचा के जेब में रख लिया था मैंने उसे

तुम तो अपना बोझ हल्का करके चली गयीं
पर ये बुन्दा फांस की तरह अटका रहा सीने में
संभलते संभलते इक उम्र छिज गई थी जिंदगी से

इस बार सफों को समेटने की कोशिश में
वो बुन्दा भी छिटक आया दराज़ के किसी कोने से

कितनी अजीब बात है न ...
अब जब सांस कुछ थमने लगी थी
फांस की तरह अटकी यादें भी बह चुकी थीं
आज फिर ...
नज़र बचा कर ये बुन्दा सहेजने का मन करता है  

बुधवार, 24 जून 2015

सोच ...

प्रेम में डूब जाना योगी हो जाना तो नहीं ... फिर जीवन से आगे किसने देखा ... अचानक एक छोटे से सुख का मिलना, फिर उस सुख को अपने ही आस-पास बनाये रखने की चाह बनाए रखना ... थोड़ा सा स्वार्थी होना बेमानी तो नहीं ...

क्योंकि ऊंचाई का सफ़र
तन्हाई के रास्ते से गुज़रता है
मैं यह नहीं कहूँगा
की तुम जीवन में नई ऊँचाइयाँ छुओ

मैंने तो अपनी उड़ान का दायरा
उसी दिन तय कर लिया था
जिस दिन तुम ज़िन्दगी में आईं

मैं यह भी नहीं कहूँगा
तुमको मेरी उम्र लग जाए

क्योंकि मेरी उम्र की सीमा तो तय है
तुम्हारी उम्र की तरह
और में जीना चाहता हूँ हर गुज़रता लम्हा
तेरे और बस तेरे ही साथ

हाँ मैं जानता हूँ
खुदगर्जी की पराकाष्ठा है ये
अपने से आगे नहीं सोच पाने का स्वार्थ

पर क्या करूं ये सोच ये सोच भी तो कमबख्त
तेरे पे आकर ही ख़त्म होती है

गुरुवार, 18 जून 2015

सुनहरी सफ़र-नामा ...

चमकते मकान, लम्बी कारें, हर तरह की सुविधाएँ, दुनिया नाप लेने की ललक, पैसा इतना की खरीद सकें सब कुछ ... क्या जिंदगी इतनी भर है ... प्रेम, इश्क, मुहब्बत, लव ... इनकी कोई जगह है ... या कोई ज़रुरत है ... और है तो कब तक ... कन्फ्यूज़न ही कन्फ्यूज़न उम्र के उतराव पर ... पर होने को तो उम्र के चढ़ाव पर भी हो सकता है ...

इससे पहले की झरने लगे प्रेम का ख़ुमार
शांत हो जाए तबाही मचाता इश्क का सैलाब
टूटने लगें मुद्दतों से खिलते जंगली गुलाब
धुंधलाने लगें ज़िंदगी की किताब पे लिखे आसमानी हर्फ़
उतरने लगे आँखों में हकीकत का मोतिया
कडुवा सच लिए "अल्जाइमर" की खौफनाक चालें
जला डालें खुशबू भरी यादों के हसीन मंज़र

खड़ी कर लेना मुहब्बत की चमचमाती इमारत

घूम आना उन तमान रास्तों पर
जहां इश्क की गर्मी से जंगली फूल खिला करते थे
बसा लेना चौंच लड़ाते पंछियों की कुछ यादें
कैद कर लेना पलकें झुकाए सादगी भरा उनका रूप
 
पुराने किले की किसी ऊंची सी लाल मीनार पर
खोद आना नुकीले पत्थर से अपना नाम

की करना है दर्ज वर्तमान होते इतिहास में
अपनी मुहब्बत का भूला बिसरा सुनहरी सफ़र-नाम




सोमवार, 8 जून 2015

अनकहे सच ...

हर प्रेम की इन्तहा मिलन तो नहीं ... फिसलन भरी राह कुछ पलों में जीवन गाथा से गुज़र जाती है पर बीते समय की हर गाथा सुहानी हो, जरूरी नहीं ... हर अतीत की याद मीठी हो, ये भी तो जरूरी नहीं ...

खुद की तलाश में
समय की काली पगडण्डी पर
इतना पीछे लौट गया की
बिखरी यादों के गोखरू पैरों को लहू-लुहान करने लगे
गुज़रे लम्हों के आवारा भूत ठेंगा दिखाने लगे

चुपके चुपके चलता बे-आवाज पदचापों का शोर
सीसा डालने के बावजूद बहरा करने लगा
जगह जगह बिखरे सपनों के अधजले कचरे सड़ांध मारने लगे
सांस लेने की मजबूरी में तेरी खुशबू लिपटी हवा
फेफड़ों को खोखला करने लगी

जीने मरने की कसमों के सियारी पद-चाप
विश्वास के जंगली कुत्तों की गुर्राहट

झपट्टा मारने को तैयार
प्रेम की खूनी इबारत से हांफती खूंखार बिल्लियाँ
दबे पाँव मुझको घेरने लगीं

चाँद की पीली रौशनी और तेरे बादली साए की धुंध के बीच
अनगिनत शक्लें बदलता समय
तेरे ही अक्स में तब्दील होने लगा

पलटी हुयी सफ़ेद आँखों की चुभन
काले बालों का बढ़ता जंगल
और नैपथ्य से आती विद्रूप हंसी की आवाजें
मुझे अपने आप से खींचने लगीं हैं

घुटन बढ़ने लगी है  ...

यकायक दूर से आती
फड़फड़ाते पन्नों की आवाज चुप हो जाती है
डायरी के पन्नों में इतिहास होता वर्तमान
साँस लेने लगता है


     

रविवार, 31 मई 2015

सैडिस्टिक प्लेज़र ...

लड़ना, हारना, बदलना फिर लड़ना वो भी अपने आप से ... परास्त होते होते मजा आने लगता है अपनी हार पर, अपनी जुस्तजू पर ... कई बार जब संवेदना मर जाती है ये मजा शैतानी मजे में बदल जाता है पर फिर भी हारता तो खुद ही है इंसान ...

कई बार
चैहरे को खूँटी पे टांग
पैरों को दरवाजे पे उतार
देह से विदेह
स्वयं को देखने की कोशिश में
खो देता हूँ अपना अस्तित्व

हर बार
खाली कमजोर शरीर में
कलुषित विचार
अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं
विचारों को कुंठित करने वाले जिवाणु
शब्दों का अपहरण कर
मनचाहा लिखवा लेते हैं

खुद को पाने की कोशिश में
"जो होना चाहता हूँ" का सौदा करता हूँ
"जो नहीं होना चाहता" का मुखौटा लगाता हूँ
फिर कई दिन
अंतर्द्वंद की विभीषिका में जीता हूँ

शब्दों की अग्नि सुलगते सुलगते
फिर कर देती है उद्वेलित
देह से विदेह हो
फिर स्वयं को देखता हूँ
कुछ और जीवाणुओं से लड़ता हूँ
परास्त होता हूँ
नया सौदा करता हूँ

हाँ ... सौदा करना नहीं छोड़ता
सैडिस्टिक प्लेज़र नाम की चीज़ भी तो होती है ...

  

मंगलवार, 19 मई 2015

ईगो ...

ज़िंदगी क्या इतनी है के दूजे की पहल का इंतज़ार करते रहो ... और वो भी कब तक ... प्रेम नहीं, ऐसा तो नहीं ... यादों से मिटा दिया, ऐसा भी नहीं ... तो फिर क्यों खड़ी हो जाती है कोई दीवार, बाँट देती है जो दुनिया को आधा-आधा ...

दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इंच भर की दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल नहीं होती

जरूरी है तो बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
बहुत ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना      

गुरुवार, 14 मई 2015

किस्सा रोज का ...

संवेदना ... कुछ वर्षों में ये शब्द, शायद शब्दकोष में ढूंढना पड़े ... वैसे तो आज भी मुश्किल से दिखाई देता है ... पर क्यों ... क्या हम कबूतर हैं? आँखें मूंदे रहेंगे और बिल्ली नहीं देखेगी ... दूसरों के साथ होता है ये सब, हमारे साथ तो कभी हो ही नहीं सकता ... और अगर हो गया तो ... क्या हमारा इतिहास भी ऐसा ही होने वाला है ...

भरा पूरा दिन
सरकारी हस्पताल से एक किलोमीटर दूर
मौत से जूझती चंद सांसें
जीवन की जद्दोजहद
भीड़ से आती फुसफुसाहट

"हे भगवान ... कितना खून बह रहा है"
"अरे भाई कोई पुलिस को बुलाओ"
"अरे किसी ने कार का नंबर नोट किया क्या"
"हाय कितना तड़प रहा है बेचारा"
"लोग अंधों की तरह गाड़ी चलाते हैं"
"जरा देखो सांस चल रही है की नहीं"
"क्या जमाना आ गया भाई"
"चलो भाई चलो क्या मजमा लगा रक्खा है"
"अरे ऑटो रिक्शा जरा साइड हो"
बिना बात ही ट्रेफिक जाम कर दिया
वैसे ही आज ऑफिस की देर हो गई

अगले दस मिनटों में भीड़ छटने लगी
तड़पता जिस्म भी ठंडा हो गया
सड़क से गुजरने वाली गाड़ियां
बच बच के निकलने लगीं
शाम होते होते म्यूनिस्पेल्टी वाले
लाश उठा ले गए

रोज़ की तरह चलती रफ़्तार
वैसे हो चलती रही जैसे कुछ हुआ ही नहीं

शुक्रवार, 1 मई 2015

मजदूर ...

रस्म निभाई के लिए एक दिन कुछ कर लेना क्या उस दिन का मज़ाक उड़ाना नहीं ... या कहीं ऐसा तो नहीं कम से कम एक दिन और हर साल उसी दिन को मनाना, अनसुलझे विषय को निरंतर जिन्दा रखने की जद्दोजहद हो ... जो भी हो काश ऐसी क्रांति आए की दिन मनाने की परंपरा ख़त्म हो सके समस्या के समाधान के साथ ...

वो अपने समय का
मशहूर मजदूर नेता था
आग उगलते नारों के चलते
कई बार अखबार की सुर्खियाँ बना

धुंआ उगलती चिमनियों के
नुक्कड़ वाले खोखे पे
रात उसकी लाश मिली

उसकी जागीर में थी
टूटी कलम
क्रांतिकारियों के कुछ पुराने चित्र
मजदूर शोषण पे लिखी
ढेर सारी रद्दी
पीले पड़ चुके पन्नों की कुछ किताबें
जो जोड़ी हवाई चप्पल
मैला कुचेला कुरता
और खून से लिखे विचार

आज एक बार फिर
वो शहर की अखबार में छपा

पर इस बार लावारिस लाश की
शिनाख्त वाले कॉलम में