मंगलवार, 31 मई 2016

ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया ...

जब से ये फुटपाथ रहने का ठिकाना हो गया
बारिशों में भीगने का इक बहाना हो गया

ख़त कभी पुर्ज़ा कभी कोने में बतियाते रहे
हमने बोला कान में तो फुसफुसाना हो गया

हम कहेंगे कुछ तो कहने का हुनर आता नहीं
जग सुनाएगा तो कह देंगे फ़साना हो गया

सीख लो अंदाज़ जीने का परिंदों से ज़रा
मिल गया दो वक़्त का तो चहचहाना हो गया

जिंदगी की कशमकश में इस कदर मसरूफ हूँ
खुद से ही बातें किए अब तो ज़माना हो गया

आपकी इज्ज़त के चलते हो गए खामोश हम
ये न समझो इसका मतलब सर झुकाना हो गया  

मंगलवार, 24 मई 2016

पाना है आकाश जिन्हें फिर पाने दो ...

भूख लगी है दो रोटी तो खाने दो
कुछ पल को बस छाया है सुस्ताने दो

हाथ उठाया जब बापू ने गुस्से में
अम्मा बोली बच्चा है समझाने दो

बरगद का इक पेड़ है मेरे आँगन में
आंधी हो तूफ़ान उन्हें तो आने दो

अपनी मिट्टी उनको खींच के लाएगी
छोड़ के जाते हैं जो उनको जाने दो

काला बादल है फिर मेरे कब्ज़े में
सूखे खेतों में पानी बरसाने दो

कागज़ के जो फूल उगाये रहते हैं
ऐसे पेड़ों को जड़ से मुरझाने दो

मुझको मेरी माँ का साया काफी है
पाना है आकाश जिन्हें फिर पाने दो

सोमवार, 16 मई 2016

आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो ...

रिश्ता नया बने तो पुराना नहीं भूलो
तुम दोस्ती का फर्ज़ निभाना नहीं भूलो

जो फूल आँधियों की शरारत से हैं टूटे
उन को भी देवता पे चढ़ाना नहीं भूलो

जागे हुओं को यूँ भी उठाना नहीं आसाँ
जो सो रहे हैं उनको उठाना नहीं भूलो

इंसान हो तो साथ हो इंसानियत इतनी
तुम डूबतों को तिनका थमाना नहीं भूलो

तुमको जो आसमान को छूने की है चाहत
आँखों में रोज़ सपने सजाना नहीं भूलो

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने ...

भरोसे से निकलोगे जब काम करने
बचा लोगे खुद को लगोगे जो गिरने

सफेदी सरों पे लगी है उतरने 
समझ लो जवानी लगी अब बिखरने

किनारा हूँ मैं आँख भर देख लेना 
चलो जब समुंदर को बाहों में भरने

यहाँ चैन से कौन जीने है देता 
न जब चैन से कोई देता है मरने

वहीं पर उजाला नहीं हो सका है
जहां रोक रक्खीं हैं बादल ने किरनें

तेरे ख़त के टुकड़े गिरे थे जहां पर
वहीं पर निकल आए पानी के झरने

है आसान तलवार पे चलते रहना
कहा, हम चले जब मुहब्बत में गिरने

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए ...

चोट खाई गिर पड़े खड़े हुए
ज़िंदगी में इस कदर बड़े हुए

दर्द दे रहे हैं अपने क्या करूं
तिनके हैं जो दांत में अड़े हुए

उनको कौन पूछता है फूल जो
आँधियों की मार से झड़े हुए

दौर है बदल गए बुज़ुर्ग अब
घर की चारपाई में पड़े हुए

तुम कभी तो देख लेते आइना
हम तुम्हारी नाथ में हैं जड़े हुए

मत कुरेदिए हमारे ज़ख्म को
कुछ पुराने दर्द हैं गड़े हुए

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

फकत पैसे ही पैसे और पैसे ...

मुझे ये जिंदगी मिलती है ऐसे
तेरी जुल्फों का पेचो-ख़म हो जैसे

तेरी आँखों में आंसू आ गए थे
तुझे मैं छोड़ के जाता भी कैसे

फड़कती है नहीं बाजू किसी की
रगों में बह रहा है खून वैसे

तरक्की ले गई अमराइयां सब
शजर ये रह गया जैसे का तैसे

हवस इंसान की मिटती नहीं है
फकत पैसे ही पैसे और पैसे

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता ...

मुझे इक शख्स अपना सा है शीशे में नज़र आता
जो आना चाहता था घर मगर किस मुंह से घर आता

इधर की छोड़ दी, पकड़ी नहीं परदेस की मिट्टी
कहो कैसे अँधेरा चीर कर ऊंचा शजर आता

वो जिसकी याद में आंसू ढलक आते हैं चुपके से
मेरी नज़रों में ऐसे ही कभी वो बे-खबर आता

सुनाता वो कभी अपनी, सुनाते हम कभी अपनी
कभी कोई मुसाफिर बन के अपना हम-सफ़र आता

उसे मिट्टी की चाहत खींच लाई थी वतन अपने
नहीं तो छोड़ कर बच्चों को क्या कोई इधर आता

जिसे परदेस की मिट्टी हवा पानी ने सींचा था
वो अपना है मगर क्यों छोड़ के मेरे शहर आता
     

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

देखो परख लो सच सभी इस प्यार से पहले ...

हो दिल्लगी ना, सोच लो इज़हार से पहले
देखो परख लो सच सभी इस प्यार से पहले

अपने गुनाहों को कभी भी मान मैं लूँगा
पर हो खुले में पैरवी इकरार से पहले

टूटा अगर तो जुड़ न पाएगा कभी रिश्ता
सोचो हज़ारों बार तुम व्यवहार से पहले

जो दिल में है सब खुल के उनको बोलने तो दो
मौका जरूरी है किसी इनकार से पहले

यूँ ही नहीं सर टेकना गर देवता भी हो
ठोको बजा कर देख लो सत्कार से पहले

तैयार हूँ मैं हारने को जंग दुनिया की
तुम जीत निष्चित तो करो इस हार से पहले

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

बस यही माँ की इक निशानी थी ...

ट्रंक लोहे का सुरमे-दानी थी
बस यही माँ की इक निशानी थी

अब जो चुप सी टंगी है खूँटी पे
ख़ास अब्बू की शेरवानी थी

मिल के रहते थे मौज करते थे
घर वो खुशियों की राजधानी थी

झील में तैरते शिकारे थे
ठण्ड थी चाय जाफ़रानी थी

छोड़ के जा रही थी जब मुझको
मखमली शाल आसमानी थी

उम्र के साथ ही समझ पाया
हाय क्या चीज़ भी जवानी थी

उफ़ ये गहरा सा दाग माथे पर
बे-वफ़ा प्यार की निशानी थी
(तरही गज़ल) 

बुधवार, 2 मार्च 2016

पल दो पल सुस्ताना सीख ...

झगड़ों को निपटाना सीख
रिश्तेदार बनाना सीख

खुद पे दाव लगाना है तो
अपना बोझ उठाना सीख

घाव तो अक्सर भर जाते हैं
गहरे दाग मिटाना सीख

मुद्दत से जो साथ है तेरे
उसका साथ निभाना सीख

बैठी होगी भूखी प्यासी
सही समय घर जाना सीख

तेजी के इस दौर में भईया
पल दो पल सुस्ताना सीख