शनिवार, 7 जनवरी 2017

शिद्दत ...

गज़लों के लम्बे दौर से बाहर आने की छटपटाहट हो रही थी ... सोचा नए साल के बहाने फिर से कविताओं के दौर में लौट चलूँ ... उम्मीद है आप सबका स्नेह यूँ ही बना रहेगा ...

तुम्हें सामने खड़ा करके बुलवाता हूँ कुछ प्रश्न तुमसे ... फिर देता हूँ जवाब खुद को खुद के ही प्रश्नों का ... हालांकि बेचैनी है की बनी रहती है फिर भी ... अजीब सी रेस्टलेसनेस ... आठों पहर ...   

क्यों डूबे रहते हो यादों में ... ?
क्या करूं
समुन्दर का पानी जो कम है डूबने के लिए
(तुम उदासी ओढ़े चुप हो जाती हो, जवाब सुनने के बाद)

अच्छा ऐसा करो वापस आ जाओ मेरे पास
यादें खत्म हो जाएंगी खुद-ब-खुद
(क्या कहती हो ... संभव नहीं ...)

चलो ऐसा करो
पतझड़ के पत्तों की तरह
जिस्म से पुरानी यादों को काटने का तिलिस्म
मुझे भी सिखा दो

ताज़ा हवा के झोंके नहीं आते मेरे करीब
मुलाकात का सिलसिला जब आदत बन गया   
तमाम रोशनदान बंद हो गए थे

सुबह के साथ फैलता है यादों का सैलाब

रात के पहले पहर दिन तो सो जाता है
पर रौशनी कम नहीं होती
यादों के जुगनू जो जगमगाते पूरी रात

मालुम है मुझे शराब ओर तुम्हारी मदहोशी का नशा 
टूटने के बाद तकलीफ देगा 

पर क्या करूं
शिद्दत कम नहीं होती ... 

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो ...

दोस्तों नव वर्ष की पूर्व-संध्या पे आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं ... नव वर्ष सभी के लिए सुख, शांति और समृद्धि ले के आए ... सब को बहुत बहुत मंगल-कामनाएं ...
   
नए साल में नए गुल खिलेंनई हो महक नया रंग हो
यूं ही खिल रही हो ये चांदनी यूं ही हर फिज़ां में उमंग हो

तेरी सादगी मेरी ज़िंदगीतेरी तिश्नगी मेरी बंदगी
मेरे हम सफ़र मेरे हमनवामैं चलूं जो तू मेरे संग हो  

जो तेरे करम की ही बात हो मैं ख़ास हूँ वो ख़ास हो
तेरे हुस्न पर हैं सभी फिदातेरे नूर में वो तरंग हो   

तो नफ़रतों की बिसात हो तो मज़हबों की ही बात हो
उदास कोई भी रात हो चमन में कोई भी जंग हो 

कहीं खो जाऊं शहर में मैंमेरे हक़ में कोई दुआ करे
ना तो रास्ते  मेरे गाँव के , मेरे घर की राह न तंग हो


बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया ...

इक उम्र लग गई है मगर मान तो गया
मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया

अब जो भी फैंसला हो वो मंज़ूर है मुझे
जिसको भी जानना था वो सच जान तो गया 

दीपक हूँ मैं जो बुझ न सकूंगा हवाओं से 
कोशिश तमाम कर के ये तूफ़ान तो गया

बिल्डर की पड़ गई है नज़र रब भली करे
बच्चों के खेलने का ये मैदान तो गया

टूटे हुए किवाड़ सभी खिड़कियाँ खुली
बिटिया के सब दहेज़ का सामान तो गया
 
कर के हलाल दो ही दिनों में मेरा बजट
अच्छा हुआ जो घर से ये मेहमान तो गया 
(तरही गज़ल)

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे ...

रात के अँधेरे में, धूप हो खिली जैसे
यूँ लगे है कान्हा ने, रास हो रची जैसे

ज़ुल्फ़ की घटा ओढ़े, चाँद जैसे मुखड़े पर
बादलों के पहरे में, चांदनी सोई जैसे

सिलसिला है यादों का, या धमक क़दमों की
होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे

चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में
घर के छोटे आँगन में, जिंदगी बसी जैसे

यूँ तेरा अचानक ही, घर मेरे चली आना
दिल के इस मोहल्ले में आ गयी ख़ुशी जैसे
(तरही गज़ल)

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो ...

हम झूठ भी कहेंगे तो सच मानते हैं वो
कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो

हर बात पे कहेंगे हमें कुछ नहीं पता
पर खाक हर गली की सदा छानते हैं वो

कुछ लोग टूट कर भी नहीं खींचते कदम
कर के हटेंगे बात अगर ठानते हैं वो

बारिश कभी जो दर्द की लाता है आसमां
चादर किसी याद की फिर तानते हैं वो

तो क्या हुआ नज़र से नहीं खुल के कह सके

भाषा को खूब प्रेम की पहचानते है वो ...

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इस शहर की शांति तो भंग है ...

नाम पर पूजा के ये हुड़दंग है
इस शहर की शांति तो भंग है

लूटता है आस्था के नाम पर 
अब कमाने का निराला ढंग है

हर कोई आठों पहर है भागता  
जिंदगी जैसे के कोई जंग है

घर का दरवाज़ा तो चौड़ा है बहुत
दिल का दरवाज़ा अगरचे तंग है

आइना काहे उसे दिखलाए हैं
उड़ गया चेहरे का देखो रंग है

युद्ध अपना खुद ही लड़ते हैं सभी
जिंदगी में कौन किसके संग है

सोमवार, 14 नवंबर 2016

इन आँखों से ये ख्वाब ले लो ...

अपने ख़त का जवाब ले लो
इन हाथों से गुलाब ले लो

चाहो मिलना कभी जो मुझ से
दिल की मेरे किताब ले लो

अनजाने ही दिए थे जो फिर
उन ज़ख्मों का हिसाब ले लो

मिलने वाला बने न दुश्मन
चेहरे पर ये नकाब ले लो

अमृत सा वो असर करेगी
उनके हाथों शराब ले लो

काटेंगे ये सफ़र अकेला
इन आँखों से ये ख्वाब ले लो

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

अम्मा का दिल टूट गया ...

पुरखों का घर छूट गया
अम्मा का दिल टूट गया

दरवाज़े पे दस्तक दी
अन्दर आया लूट गया

मिट्टी कच्ची होते ही
मटका धम से फूट गया

मजलूमों की किस्मत है
जो भी आया कूट गया

सीमा पर गोली खाने
अक्सर ही रंगरूट गया

पोलिथिन आया जब से
बाज़ारों से जूट गया 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

गड्ढे में ...

मौत ने कैसा रंग जमाया गड्ढे में
मिट्टी को मिट्टी से मिलाया गड्ढे में

नेकी कर गड्ढे में डालो अच्छा है
वर्ना जितना साथ निभाया गड्ढे में

पहले तो गज भर खोदो मिल जाता था
पानी के अब खूब रुलाया गड्ढे में

मेहनत से बिगड़ी बातें बन जाती हैं
मकड़ी ने है पाठ पढ़ाया गड्ढे में

ग्रहण लगा था बचपन में तब अब्बू ने
पानी भर के चाँद दिखाया गड्ढे में

जीवन भर का साथ मगर मौत आने पर
जल्दी जल्दी हमें सुलाया गड्ढे में

घर जाते तक दुनियादारी जाग गई
मिल के डाले फूल भुलाया गड्ढे में