मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे ...

लटक रहा हूँ में उलझे से सवालों जैसे
तू खिडकियों से कभी झाँक उजालों जैसे

है कायनात का जादू के असर यादों का
सुबह से शाम भटकता हूँ ख्यालों जैसे

समय जवाब है हर बात को सुलझा देगा
चिपक के बैठ न दिवार से जालों जैसे

किसी भी शख्स को पहचान नहीं हीरे की
मैं छप रहा हूँ लगातार रिसालों जैसे

में चाहता हूँ की खेलूँ कभी बन कर तितली
किसी हसीन के रुखसार पे बालों जैसे

बजा के चुटकी में बाजी को पलट सकता हूँ
मुझे न खेल तू शतरंज की चालों जैसे

करीब आ के मेरे हाथ से छूटी मंजिल
किसी गरीब की किस्मत से निवालों जैसे 

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये ...

खिलखिलाती हुई तू मिली है प्रिये
उम्र भर रुत सुहानी रही है प्रिये

आसमानी दुपट्टा झुकी सी नज़र
इस मिलन की कहानी यही है प्रिये

कौन से गुल खिले, रात भर क्या हुआ
सिलवटों ने कहानी कही है प्रिये

तोलिये से है बालों को झटका जहाँ
ये हवा उस तरफ से बही है प्रिये

ये दबी सी हंसी चूड़ियों की खनक
घर के कण कण में तेरी छवी है प्रिये

जब भी आँगन में चूल्हा जलाती है तू
मुझको देवी सी हरदम लगी है प्रिये

बाज़ुओं में मेरी थक के सोई है तू
पल दो पल ज़िंदगानी अभी है प्रिये

(पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर तरही मुशायरे में लिखी एक ग़ज़ल)


सोमवार, 8 दिसंबर 2014

नेह सागर सा छलकना चाहिए ...

प्रेम आँखों से झलकना चाहिए
देह चन्दन सा महकना चाहिए

बाग वन आकाश नदिया सब तेरा
मन विहग चंचल चहकना चाहिए

गंध तेरे देह की यह कह रही
मुक्त हो यौवन दहकना चाहिए

पंछियों की कलरवें उल्लास हो
नेह सागर सा छलकना चाहिए

दृष्टि का अनुबंध वो जादू करे
बिन पिए ही मय बहकना चाहिए


मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना ...

मील के पत्थर कभी इस रह-गुज़र के देखना
लोग मिल जाएंगे फिर मेरे शहर के देखना

दूर तक तन्हा मिलेगी रेत रेगिस्तान की
फल मगर मीठे मिलेंगे इस शजर के देखना

चुट्कियों में नाप लोगे प्रेम की गहराई तुम
मन के गहरे ताल में पहले उतर के देखना

पल दो पल में देख लोगे आदमी का सच सभी
दिल को पहले आईने सा साफ़ कर के देखना

इश्क के खिलने लगेंगे फूल पीली रेत पर
प्रेम के सहरा में पहले खुद उतर के देखना

प्रेम के आकाश पर बस कृष्ण है औ कृष्ण है
वेदना में विरह की राधा निखर के देखना   

सोमवार, 24 नवंबर 2014

गांधी की तस्वीर लगाई होती है ...

आसमान पे नज़र टिकाई होती है
खेतों में जब फसल उगाई होती है 

शहरों की चंचल चितवन के क्या कहने
मेकप की इक परत चढ़ाई होती है

दफ्तर में तो धूल जमी होती है पर
गांधी की तस्वीर लगाई होती है

उनका दिल टूटा तो वो भी जान गए
मिलने के ही बाद जुदाई होती है

चौड़ा हो जाता है बापू का सीना
बेटे की जिस रोज कमाई होती है

बूढी कमर झुकी होती है पर घर की
जिम्मेदारी खूब उठाई होती है

हो जाता है दिल सूना, घर सूना सा
बेटी की जिस रोज बिदाई होती है

चलते चलते एक और शेर ...
जिसने भी ये आग लगाई होती है
तीली हलके से सुलगाई होती है





सोमवार, 17 नवंबर 2014

धूप छाँव उम्र निकलती रही ...

बूँद बूँद बर्फ पिघलती रही
ज़िंदगी अलाव सी जलती रही

चूड़ियों को मान के जंजीर वो
खुद को झूठे ख्वाब से छलती रही

है तेरी निगाह का ऐसा असर
पल दो पल ये साँस संभलती रही

मौसमों के खेल तो चलते रहे
धूप छाँव उम्र निकलती रही

गम कभी ख़ुशी भी मिली राह में
कायनात शक्ल बदलती रही

रौशनी ही छीन के बस ले गए
आस फिर भी आँख में पलती रही


सोमवार, 10 नवंबर 2014

सुर्ख़ियों में न कभी खबर में आ सके ...

शाम आ सके न वो सहर में आ सके
दर्द फिर कभी न रह-गुज़र में आ सके

कायनात प्रेम से सजा दो इस कदर
लौट के वो शख्स अपने घर में आ सके

जिक्र है हमारा महफ़िलों में आज भी
पर कभी न आपकी नज़र में आ सके

दो ही आंसुओं ने डाल दी थी बेड़ियाँ
फिर कभी न लौट के सफ़र में आ सके

हद से बढ़ गई थी बेरुखी जनाब की
इसलिए न अपने हम शहर में आ सके

मर मिटे जो सिरफिरे वतन की आन पर
सुर्ख़ियों में ना कभी खबर में आ सके 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता ...

ये माना साथ निभाना हमें नहीं आता
किसी को छोड़ के जाना हमें नहीं आता

वो जिसकी जेब में खंजर ज़ुबान पर मिश्री
उसी से हाथ मिलाना हमें नहीं आता

मिलेगी हमको जो किस्मत में लिखी है शोहरत
किसी के ख्वाब चुराना हमें नहीं आता

हुनर है दर्द से खुशियों को खींच लाने का
विरह के गीत सुनाना हमें नहीं आता

खुदा का शुक्र है इन बाजुओं में जुंबिश है
निवाला छीन के खाना हमें नहीं आता

इसे ग़ज़ल न कहो है फकत ये तुकबंदी
गज़ल के शेर बनाना हमें नहीं आता 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं ...

गर्दनों पे आरियाँ चारों तरफ हैं
खून की पिचकारियाँ चारों तरफ हैं

ना किलेबंदी करें तो क्या करें हम
युद्ध की तैयारियाँ चारों तरफ हैं

जिस तरफ देखो तबाही ही तबाही
वक़्त की दुश्वारियाँ चारों तरफ हैं

गौर से रखना कदम दामन बचाना
राख में चिंगारियाँ चारों तरफ हैं

जेब में है माल तो फिर इश्क़ करना
हुस्न की मक्कारियाँ चारों तरफ हैं 

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना ...

हसीनों की निगाहों से गुज़रना
है मुश्किल डूब के फिर से उभरना

वो जिसने आँख भर देखा नहीं हो
उसी के इश्क में बनना संवरना

तुम्हें जो टूटने का शौंक है तो
किसी के ख्वाब में फिर से उतरना

किसी कागज़ की कश्ती के सहारे
न इस मझधार में लंबा ठहरना

समझदारी कहाँ है पंछियों के
बिना ही बात पंखों को कुतरना

रहूँ चाहे कहीं पर दिल ये मांगे
मिटूं तो घर की मिट्टी में बिखरना


सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को ...

बुझा दो रोशनी छेड़ो नहीं सोए पतंगों को
जगा देती हैं दो आँखें जवाँ दिल की उमंगों को

जो जीना चाहते हो ज़िन्दगी की हर ख़ुशी दिल से
जरा रोशन करो उजड़ी हुई दिल की सुरंगों को

जिसे मेहनत की आदत है उसे ये राज़ मालुम है
बुलंदी दे ही देती है हवा उड़ती पतंगों को

दबा दो लाख मिटटी में सुलग उठते हैं अंगारे
छुपाना है नहीं आसान उल्फत की तरंगों को

ये खुशबू, फूल, तितली, रेत, सागर, आसमां, मिटटी
ज़रा नज़दीक जा कर देखिये जीवन के रंगों को 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

समय ...

समय की ताकत को पहचानने वाले पल, बस कुछ ही आते हैं जीवन में ... आज की तारीख के बारे में सोचता हूँ तो कुछ ऐसा ही महसूस होता है ... बीतते बीतते आज माँ से बिछड़े दो साल हो ही गए ... हालांकि उस दीवार पर आज भी उनकी फोटो नहीं लगा पाया ... स्वर्गीय, श्रधांजलि जैसे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करने से पहले घबराहट होने लगती है ... ये जरूर है की सोचते सोचते कई बार संवाद जरूर करने लगता हूँ माँ के साथ विशेष कर जब जब उसका तर्क समय की ताकत को पहचानने के लिए होता है ...


मुझे पाता है
तुम कहीं नहीं जाओगी

हालांकि जो कुछ भी तुम्हारे बस में था
उससे कहीं ज्यादा कर चुकी हो हम सब के लिए

सच मायने में जो हमारा फ़र्ज़ था
तुम तो वो भी कर चुकी हो
बिना बताए, बिना जतलाए

तुमसे बेहतर कौन जानता था हमारी क्षमता को

इसी विश्वास के बल पे कह रहा हूँ
तुम रहोगी आस पास हमेशा हमेशा के लिए

वैसे भी माँ को बच्चों से दूर
कौन रख सका है भला ... 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी ...

पत्थर मिलेंगे टूटे, तन्हाइयां मिलेंगी
मासूम खंडहरों में, परछाइयां मिलेंगी

इंसान की गली से, इंसानियत नदारद
मासूम अधखिली से, अमराइयां मिलेंगी

कुछ चूड़ियों की किरचें, कुछ आंसुओं के धब्बे
जालों से कुछ लटकती, रुस्वाइयां मिलेंगी

बाज़ार में हैं मिलते, ताली बजाने वाले
पैसे नहीं जो फैंके, जम्हाइयां मिलेंगी

पहले कहा था अपना, ईमान मत जगाना
इंसानियत के बदले, कठिनाइयां मिलेंगी

बातों के वो धनी हैं, बातों में उनकी तुमको
आकाश से भी ऊंची, ऊंचाइयां मिलेंगी

हर घर के आईने में, बस झूठ ही मिलेगा
कचरे के डस्टबिन में, सच्चाइयां मिलेंगी



मंगलवार, 9 सितंबर 2014

ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं ...

शामिल हूँ खेल में अभी बीमार मैं नहीं
हारा अनेक बार पर इस बार मैं नही

माना हजूम है तो क्या कुछ कायदे तो हैं
झंडा भले है हाथ में सरदार मैं नहीं

हूँ आज भी टिका हुआ सच के ही जोर पर
ख़बरें परोसता हुआ अखबार मैं नहीं

माना ये ज़िंदगी, ख़ुशी, ये गम तुझी से है
ये दोस्ती ही है तुम्हारा प्यार मैं नहीं

खुद चल के ही मुकाम पाना चाहता हूँ मैं
घुटनों में दर्द है तो क्या लाचार मैं नहीं

सीने में दर्द है तो है, रोने में हर्ज क्या
चुपचाप गम को सह सकूँ किरदार मैं नहीं

बुधवार, 3 सितंबर 2014

जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या ...

हौंसला है तो उतर पतवार से होता है क्या
जीत लम्बी हो तो छोटी हार से होता है क्या

हर शिकन मिट जाएगी, ये घाव भी भर जाएगा
आज़मा के देख मेरे प्यार से होता है क्या

बूँद ना बन जाए फिर सैलाब इसको रोक लो
फिर न कहना आँसुओं की धार से होता है क्या

वक़्त रहते ही समझ लो मुख़्तसर सी बात है
खुल के बोलो प्यार है, इज़हार से होता है क्या

जीत उसकी है जो पहले वार का रखता है दम
तेज़ चाहे धार हो, तलवार से होता है क्या

थाल पूजा का लिए जो दूर से है देखती
जानती है वो नज़र के वार से होता है क्या

रविवार, 10 अगस्त 2014

बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है ...

जम कर पसीना बाजुओं से जब निकलता है
मुश्किल से तब जाकर कहीं ये फूल खिलता है

ये बात सच है तुम इसे मानो के ना मानो
बस छोड़ कर बदलाव के सब कुछ बदलता है

कुछ हौंसला, अरमान कुछ, कुछ ख्वाहिशें दिल की
तूफ़ान में यूँ ही नहीं तो दीप जलता है

ये थी शरारात, दिल्लगी या इश्क़ जो भी हो
बस ख्वाब उनका ही मेरी आँखों में पलता है

दिन भर की अपनी आग, अपनी तिश्नगी लेकर
तपता हुआ सूरज समुंदर में पिघलता है  

रविवार, 3 अगस्त 2014

वक़्त को आज़मा के देखो तो ...

दर्द में मुस्कुरा के देखो तो
गीत खुशियों के गा के देखो तो

जीत लोगे तमाम दुनिया तुम
दाव खुद पे लगा के देखो तो

हौंसला है तो साथ देता है
वक़्त को आज़मा के देखो तो

हद भी होती है ज़ुल्म सहने की
शान से सर उठा के देखो तो

उसमें अपना ही अक्स दिखता है
माँ के नज़दीक जा के देखो तो

बाप दे देगा जो भी मांगोगे
तुम कभी सर झुका के देखो तो

रविवार, 27 जुलाई 2014

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है ...

उम्र से ज़्यादा जोड़ा है
फिर भी कितना थोड़ा है

बाबस्ता यादें उस से
घर जो हमने छोड़ा है

परदेसी हो कर जाना
कौन सा नाता तोड़ा है

शहरों के रास्तों पर तो
हर कोई बस रोड़ा है

गुमनामी में है जिसने
तूफां का रुख मोड़ा है

उसके दोड़े घर चलता
वो जुम्मन का घोड़ा है

तंग हैं उनके दिल उतने
जितना आँगन चौड़ा है

रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है


सोमवार, 14 जुलाई 2014

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब ...

किसी के हाथ में ख़ंजर, कहीं फरमान होता है
तुम्हारी दोस्ती में ये बड़ा नुक्सान होता है

नहीं आसान इसकी सरहदों तक भी पहुँच पाना
बुलंदी का इलाका इसलिए सुनसान होता है

मुखौटे ओढ़ कर सच की हकीकत ढूंढते हैं सब
शहर का आइना ये देख कर हैरान होता है

जो तिनके के सहारे तैरने का दम नहीं रखते
भंवर में थामना उनको कहाँ आसान होता है

लड़कपन बीत जाता है, जवानी भी नहीं रहती
बुढापा उम्र भर इस जिस्म का मेहमान होता है 

सोमवार, 7 जुलाई 2014

खटखटाते रहो, खटखटाते रहो ...

प्रेम का गीत है, गीत गाते रहो
गुनगुनाते रहो, गुनगुनाते रहो

तितलियों ने कहा, फूल को चूम कर
खिलखिलाते रहो, खिलखिलाते रहो

रात जुगनू से बोली, सहर आने तक
झिलमिलाते रहो, झिलमिलाते रहो

पंछियों को जगा कर, ये बोली किरन
चहचहाते रहो, चहचहाते रहो

सर्द मौसम कहे, धूप के कान में
कुनमुनाते रहो, कुनमुनाते रहो

दिल में ख़ंजर उतारा कहा प्यार से
मुस्कुराते रहो, मुस्कुराते रहो

दिल की कुण्डी कभी तो खुलेगी सुनो
खटखटाते रहो, खटखटाते रहो

सोमवार, 30 जून 2014

दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया ...

पानी हवा थी धूप पनपना नहीं आया
गमले के फूल को तो महकना नहीं आया

जो सोचते थे कैद नहीं, घर है ये पिंजरा
उनको खुली हवा में चहकना नहीं आया

तलवार की तो धार पे चलते रहे थे हम
उनकी गली से हमको गुज़ारना नहीं आया

रह रह के मुझे दिख रहा है एक ही चेहरा
कैसे कहूं की दिल को धड़कना नहीं आया

मजबूत छत भिगो न सके तोड़ दी झुग्गी
गुस्ताख़ बादलों को बरसना नहीं आया

अरमान हैं ये दिल के या गीली सी है लकड़ी
मुद्दत से जल रही है धधकना नहीं आया

ज़ुल्मों सितम पे खून यहाँ खौलता तो है
दिल को मगर किसी के दहकना नहीं आया



सोमवार, 9 जून 2014

शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है ...

अँधेरों को यही एहसासे-ज़िल्लत हो रही है
शहर में क्यों चराग़ों की मरम्मत हो रही है

कभी शर्मा के छुप जाना कभी हौले से छूना
न ना ना ना यकीनन ही मुहब्बत हो रही है

मेरी आवारगी की गुफ्तगू में नाम तेरा
अदब से ही लिया था पर मज़म्मत हो रही है

चुना है रास्ता कैसा, पड़ी है क्या किसी को
बुलंदी पर जो हैं उनकी ही इज्ज़त हो रही है

यहाँ पर कहकहों का शोर है लेकिन अदब से
ये कैसा घर है पहरे में मसर्रत हो रही है

उकूबत है हिमाकत या बगावत है दिये की
हवा के सामने आने की ज़ुर्रत हो रही है

झुकी पलकें, खुले गेसू, दुपट्टा आसमानी
ये दुनिया तो तेरे आने से जन्नत हो रही है


सोमवार, 2 जून 2014

कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या ...

खौफ़ की चादर तले बुलबुल कहेगी क्या
काट दोगे पंख तो चिड़िया उड़ेगी क्या

बीज, मिट्टी, खाद सब कुछ है मगर फिर भी
खून से सींचोगे तो सरसों उगेगी क्या

दिन तो निकलेगा अँधेरी रात हो जितनी
बादलों से रोशनी यूँ रुक सकेगी क्या

बोलनी होगी तुम्हें ये दास्ताँ अपनी
तुम नहीं बोलोगे तो दुनिया सुनेगी क्या

सामने चुप पीठ पीछे जहर सी बातें
यूँ हवा दोगे तो चिंगारी बुझेगी क्या

जुस्तजू को यूँ न परखो हर कदम पर तुम
कटने को तैयार जो गर्दन झुकेगी क्या

सोमवार, 19 मई 2014

पर सजा का हाथ में फरमान है ...

काठ के पुतलों में कितनी जान है
देख कर हर आइना हैरान है

कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

मैं चिरागों की तरह जलता रहा
क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
छोड़ कर जाना बहुत आसान है

जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
पर सजा का हाथ में फरमान है 

सोमवार, 12 मई 2014

सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं ...

मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं

मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं

है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं

वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं

रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं

चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं 

मंगलवार, 6 मई 2014

दो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

दो जमा दो पाँच जब होने लगे
अंक अपने मायने खोने लगे

कौन रखवाली करेगा घर कि जब
बेच के घोड़े सभी सोने लगे

मुश्किलों का क्या करोगे सामना
चोट से पहले ही जो रोने लगे

फैलती है सत्य की खुशबू सदा
झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
दुश्मनी के बीज जो बोने लगे 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अंतराल ...

आज, बीता हुआ कल और आने वाला कल, कितना कुछ बह जाता है समय के इस अंतराल में और कितना कुछ जुड़ जाता है मन के किसी एकाकी कोने में. उम्र कि पगडंडी पर कुछ लम्हे जुगनू से चमकते हैं ... यादों के झिलमिलाते झुरमुट रोकते हैं रास्ता अतीत से वर्तमान का ... ज़िंदगी में तुम हो, प्रेम हो, कुछ यादें हों ... क्या इतना ही काफी नहीं ...

तुम थीं, वर्तमान था
उठते हुए शोर के बीच
खनक रही थी तुम्हारी आवाज़
जो बदल रही थी धीरे धीरे
दूर होती आँखों कि मौन भाषा में
(उस पल तुम मुझसे दूर हो रहीं थीं ...)

फिर एक लंबी परवाज़
और लुप्त हो गया तुम्हारा वर्तमान चेहरा
लौट गया मन अतीत के गलियारे में
गुज़रे हुए लम्हों के बीच

बस तभी से तुम्हारा वर्तमान नज़र नहीं आ रहा

नज़र आ रहा है तो बस
पूजा कि थाली उठाये, पलकें झुकाए
गुलाबी साड़ी में लिपटा, सादगी भरा तुम्हारा रूप

सुनो, जब तुम आना, तो धीरे से आना
अतीत से वर्तमान के बीच
तुम्हें पहचानना भी तो है ...  

        

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

कच्चे शब्द ...

कोशिश में लगी रहती है ये कायनात, तमाम प्रेम करने वालों को उस जगह धकेलने की ... जहां बदलता रहता है सब कुछ, सिवाए प्रेम के ... गिने-चुने से इन ज़र्रों में बस प्रेम ही होता है और होती है बंसी कि धुन ... इसकी राह में जाने वाला हर पथिक बस होता है कृष्ण या राधा और होती है एक धुन आलोकिक प्रेम की ...


समुन्दर के उस कोने पे
टुकड़े टुकड़े उतरता है जहां नीला आसमां
सूरज भी सो जाता है थक के
नीली लहरों कि आगोश में जहां

कायनात के उसी ज़र्रे पे
छोड़ आया हूँ कुछ कच्चे शब्द

पढ़ आना उन्हें फुर्सत के लम्हों में
ढाल आना उसी सांचे में
जो तुमको हो क़ुबूल

कि हमने तो कसम खाई है
हर हाल में तुम्हें पाने की ...
     

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

निर्धारित शब्द ...

अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, तैरते रहते हैं कायनात में ... अर्जुन की कमान से निकले तीर की तरह, तलाश रहती है इन लक्ष्य-प्रेरित शब्दों को निर्धारित चिड़िया की आँख की ... बदलते मौसम के बीच मेरे शब्द भी तो बेताब हैं तुझसे मिलने को ...

ठंडी हवा से गर्म लू के थपेडों तक
खुली रहती है मेरी खिड़की
कि बिखरे हुए सफ़ेद कोहरे के ताने बाने में
तो कभी उडती रेत के बदलते कैनवस पे
समुन्दर कि इठलाती लहरों में
तो कभी रात के गहरे आँचल में चमकते सितारों में
दिखाई दे वो चेहरा कभी
जिसके गुलाबी होठ के ठीक ऊपर
मुस्कुराता रहता है काला तिल

कोई समझे न समझे
जब मिलोगी इन शब्दों से तो समझ जाओगी

मैं अब भी खड़ा हूँ खुली खिडके के मुहाने
आँखों से बुनते अनगिनत शब्द ...

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

मौन ...

मौन क्या है ... दूरियाँ पाटने वाला संवाद या समय के साथ चौड़ी होती खाई ... और संवाद ... वो क्या है ... महज़ एक वार्तालाप ... समझने समझाने का माध्यम ... या आने वाले सन्नाटे की और बढता एक कदम ... शायद अती में होने वाली हर स्थिति की तरह मौन और संवाद की सीमा भी ज़रूरी है वर्ना गिट भर की दूरी उम्र भर के फाँसले से भी तय नहीं हो पाती ...

चादर तान के नींद का बहाना ...

तुम भी तो यही कर रही थीं

छै बाई छै के बिस्तर के बीच मीलों लंबी सड़क
मिलते भी तो कैसे
उलटे पाँव चलना आसान कहाँ होता है

कभी कभी मौन गहरे से गहरा खड्डा भर देता है
पर जब संवाद तोड़ रहा हो दरवाज़े
पड़ोस कि खिड़कियाँ
तो शब्द वापस नहीं लौटते

सर पे चोट लगनी ज़रूरी होती है
हवा में तैरते लम्हे दफ़न करने के लिए
और सच पूछो तो ये चोट
खुद ही मारनी होती है अपने सर

ज़िंदगी बर्फ नहीं होती कि पिघली और खत्म
अपने अपने शून्य के तापमान से
खुद ही बाहर आना होता है ...

मौन की गहरी खाई
आपस के संवाद से ही पाटनी पड़ती है ...

सोमवार, 24 मार्च 2014

जानना प्रेम को ...

प्रेम का क्या कोई स्वरुप है? कोई शरीर जिसे महसूस किया जा सके, छुआ जा सके ... या वो एक सम्मोहन है ... गहरी  नींद में जाने से ठीक पहले कि एक अवस्था, जहाँ सोते हुवे भी जागृत होता है मन ... क्या सच में प्रेम है, या है एक माया कृष्ण की जहाँ बस गोपियाँ ही गोपियाँ हैं, चिर-आनंद की अवस्था है ... फिर मैं ... मैं क्या हूँ ... तुम्हारी माया में बंधा कृष्ण, या कृष्ण सम्मोहन में बंधी राधा ... पर जब प्रेम है, कृष्ण है, राधा है, गोपियाँ हैं, मैं हूँ, तू है ... तो क्या जरूरी है जानना प्रेम को ...


कई बार करता हूँ कोशिश
कैनवस के बे-रँग परदे पे तुझे नए शेड में उतारने की

चेतन मन बैठा देता है तुझे पास की ही मुंडेर पर
कायनात के चटख रँग लपेटे

शुरू होती है फिर एक जद्दोजहद चेतन और अवचेतन के बीच
गुजरते समय के साथ उतरने लगते हैं समय के रँग

शून्य होने लगता है तेरा अक्स
खुद-ब-खुद घुल जाते हैं रँग
उतर आती है तू साँस लेती कैनवस के बे-रँग परदे पर
गुलाबी साड़ी पे आसमानी शाल ओढ़े
पूजा कि थाली हाथों में लिए
पलकें झुकाए सादगी भरे रूप में

सच बताना जानाँ
क्या रुका हुआ है समय तभी से
या आई है तू सच में मेरे सामने इस रूप में ...?       

मंगलवार, 18 मार्च 2014

दास्ताँ ...

प्रेम राधा ने किया, कृष्ण ने भी ... मीरा ने भी, हीर और लैला ने भी ... पात्र बदलते रहे समय के साथ प्रेम नहीं ... वो तो रह गया अंतरिक्ष में ... इस ब्रह्मांड में किसी न किसी रूप में ... भाग्यवान होते हैं वो पात्र जिनका चयन करता है प्रेम, पुनः अवतरित होने के लिए ... तुम भी तो एक ऐसी ही रचना थीं सृष्टि की ...


वो सर्दियों की शाम थी
सफ़ेद बादलों के पीछे छुपा सूरज
बेताब था कुछ सुनने को

गहरी लंबी खामोशी के बाद
मेरा हाथ अपने हाथों में थामे तुमने कहा

आई लव यु

उसके बाद भी मुंदी पलकों के बीच
बहुत देर तक हिलते रहे तुम्हारे होंठ
पर खत्म हो गए थे सब संवाद उस पल के बाद
थम गयीं थी सरगोशियाँ कायनात की

मत पूछना मुझसे
उस धुंधली सी शाम कि दास्ताँ

कुछ मंज़र आसान नहीं होते उतारना
थोड़ी पड़ जाती हैं सोलह कलाएँ
गुम जाते हैं सारे शब्द कायनात के



सोमवार, 10 मार्च 2014

पूरी होती एक दुआ ...

कुछ बातों को ज़हन में आने से रोकना मुमकिन नहीं होता ... कुछ पल हमेशा तैरते रहते हैं यादों के गलियारे में ... कुछ एहसास भी मुद्दतों ताज़ा रहते हैं ... ज़िंदगी गिने-चुने लम्हों के सहारे भी बिताई जा सकती है बशर्ते उन लम्हों में तुम हो और हो पूरी होती एक दुआ ...

चाहता हूँ तुम बनो शहजादी
कि सोना चाहता हूँ तुम्हारी बाहों को सिरहाना बना कर
पूरब की खिड़की पे डाल देना अँधेरे का पर्दा
रोक लेना ये चाँद ज़िंदगी के फिसल जाने तक
कि लेना चाहता हूँ इक लंबी नींद
तुमसे लिपट कर

आसमान से गिरते हर तारे के साथ
रख देता हूँ एक दुआ
कि देखता होगा मेरी दुआओं का "खाता" कोई
कुछ तो होगा निज़ाम इस दुनिया को बनाने वाले का
माँ अक्सर कहा करती थी किस्मत वाला हूँ मैं

मीलों फैला रेत का पीला समुन्दर
इसलिए भी मुझे अच्छा लगने लगा है
कि बना सकता हूँ तेरे अनगिनत मिट्टी के पुतले
कि डालना चाहता हूँ उनमें जान
कि मांगी हैं लाखों दुआएं उस खुदा से
कुछ पल को कायनात का निज़ाम पाने की

  

सोमवार, 3 मार्च 2014

एक बात ... ज़रूरी है जो ...

पचपन डिग्री पारे में रेत के रेगिस्तान पे चलते हुए अगर मरीचिका न मिले तो क्या चलना आसान होगा ... तुम भी न हो और हो सपने देखने पे पाबंदी ... ऐसे तो नहीं चलती साँसें ... जरूरी होता है एक हल्का सा झटका कभी कभी, रुकी हुई सूइयाँ चलाने के लिए ...


वो मेरे इंतज़ार का दरख़्त था
सर्दियों में भी फूल नहीं खिले उस पर
हालाँकि उसकी घनी छाँव में पनपने वाली झाड़ी
लदी रहती थी लाल फूलों से

सुनो सफ़ेद पँखों वाली चिड़िया
बसंत से पहले  
उनकी चिट्ठी जरूर लाना

आने वाले पतझड़ के मौसम में
जरूरी है पलाश का खिलना  

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

यादों के झरोखे से ...

लोग अक्सर कहते हैं यादों के अनगिनत लम्हों पर धूल की परत चढती रहती है ... समय की धीमी चाल शरीर पे लगा हर घाव धीरे धीरे भर देती है ... पर क्या सचमुच ऐसा ही होता है ... समय बीतता है ... या बीतते हैं हम ... बीतती है उम्र, ये शरीर, हाथ-पाँव, आँखें जिनमें उतर आती है मोतिये की धूल ... पर यादें ... उनका क्या ... धार-दार होती रहती हैं समय की साथ ... तभी तो तुम्हारी तस्वीर भी बूढी नहीं हुई समय की साथ ... तुम भी तो वैसे की वैसी ही हो यादों में ...  


पपड़ी पपड़ी झर गया समय
तुम्हारी तस्वीर के आस-पास की दिवार से
झड़ जाती है जैसे उम्र भर की रौशनी
दो कत्थई आँखों के उजाले से
फिसल जाता है स्याह नशा
आवारा से उड़ते रूखे बालों से
और उड़ जाती है चेहरे की नमी
अन-गिनत झुर्रियों के निशान छोड़ के

हालाँकि ताज़ा है वो गहरा एहसास
जिसके इर्द-गिर्द बुने थे कुछ लम्हे
समय की मौजूदगी में
प्रेम को हाजिर-नाजिर जान के

उसी समय का हवाला दे कर
डूब जाना चाहता हूँ मैं ... लंबी प्रार्थना में
क्योंकि सब कुछ बदल कर भी
नहीं बदली तुम्हारी तस्वीर समय ने
एक उम्मीद, एक चाहत से टिकी रहती है नज़र
शायद लौटेगी तुम बीती पगडण्डी पर

दुःख का घुमंतू बादल भी तो लौट आते हैं
बरस दर बरस बरसने को ...


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मेरी वेलेंटाइन...

प्रेम किसी एक दिन का मोहताज नहीं ... जब सब कुछ लगा हो दाव पर तो हर लम्हा उस प्रेम को सजीव करने का प्रयास करता है ... प्रकृति का हर रंग प्रेम के रंग में घुलने लगता है और एक नई कायनात अंगड़ाई लेती है ... वो तेरी और मेरी कायनात नहीं ... बस होती है तो प्रेम की ... और प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, कोई एक नाम नहीं होता ... जैसे तुम्हारा भी तो कोई नाम नहीं ... कभी जानाँ, कभी जंगली गुलाब तो कभी अनीता (मेरी वो, मेरी एजी) या कभी ...

वेलेंटाइन ...
सुनो मेरी वेलेंटाइन

घास पे लिखी है इक कहानी
ओस की बूँदों से मैंने

फिजाँ में घुलने से पहले
तुम चहल-कदमी कर आना
बेरंग पानी की बूँदों में
मुहब्बत के रँग भर आना

रोक लूँगा कुछ घड़ी
ये बादे-सबा
थाम लूँगा इक लम्हा
कुनमुनाती धूप

तुम चुपके से कहानी के
किरदार में समा जाना

सुनो मेरी वेलेंटाइन
ज़िंदगी बन के आना ...  

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

कुछ एहसास ...

खुद से बातें करते हुए कई बार सोचा प्रेम क्या है ... अंजान पगडंडी पे हाथों में हाथ डाले यूँ ही चलते रहना ... या किसी खूबसूरत बे-शक्ल के साथ कल्पना की लंबी उड़ान पे सात समुंदर पार निकल जाना ... किसी शांत नदी के मुहाने कस के इक दूजे का हाथ थामे सूरज को धीरे धीरे पानी में पिघलते देखना ... या बिना कुछ कहे इक दूजे के हर दर्द को हँसते हुए पी लेना ... बिना आवाज़ कभी उस जगह पे खड़े मिलना जहाँ शिद्दत से किसी के साथ की ज़रूरत हो ... कुछ ऐसे ही तो था अपना रिश्ता जहाँ ये समझने की चाहत नहीं थी की प्रेम क्या है ...

लिख तो लेता कितने ही ग्रन्थ
जो महसूस कर पाता कुछ दिन का तेरा जाना

कह देता कविता हर रोज़ तुझ पर
जो सोच पाता खुद को तेरे से अलग

शब्द उग आते अपने आप
जो गूंजती न होती तेरी जादुई आवाज़
मेरे एहसास के इर्द-गिर्द

तुम पूछती हो हर बार
क्यों नहीं लिखी कविता मेरे पे, बस मेरे पे

चलो आज लिख देता हूँ वो कविता
बंद करके अपनी आखें, देखो मन की आँखों से मेरी ओर
और पढ़ लो ज़िंदगी की सजीव कविता
तुम्हारी और मेरी सम्पूर्ण कविता

सुनो ...
अब न कहना तुम पे कविता नहीं लिखता

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

कागज़ों में योजना अच्छी नहीं ...

फिर मिलन की कामना अच्छी नहीं
दर्द की संभावना अच्छी नहीं

हो सके तो कर्म का सन्धान हो
बस उदर की साधना अच्छी नहीं

शूल भी लेने पड़ेंगे साथ में
पुष्प की ही चाहना अच्छी नहीं

आज तेरा कल किसी के पास है
अर्थ की आराधना अच्छी नहीं

वो बने जो हो सके कार्यान्वित
कागज़ों में योजना अच्छी नहीं

कर नहीं सकते तो क्यों हो बोलते
व्यर्थ की आलोचना अच्छी नहीं

ये न होगा वो न होगा ये कठिन
मन में ये अवधारणा अच्छी नहीं 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए ...

इकट्ठा हो गए हैं लोग तो तक़रीर हो जाए
करो इतनी मेहरबानी जुबां शमशीर हो जाए

जो दिल की आग है इतना जले की रौशनी बनके
मेरा चेहरा मेरे ज़ज़्बात की तहरीर हो जाए

सभी के हाथ में होती है किस्मत की भी इक रेखा
जो किस्मत में नहीं क्यों चाहते जागीर हो जाए

इनायत हो तेरी मुझको सिफत इतनी अता कर दे
लिखूँ जो हूबहू वैसी मेरी तकदीर हो जाए

कहाँ बनते हैं राँझा आज के इस दौर में आशिक
मगर सब चाहते माशूक उनकी हीर हो जाए

गज़ल कहता हूँ पर मेरे खुदा इतनी इनायत कर
मेरा हर लफ्ज़ मेरे नाम की तस्वीर हो जाए

सोमवार, 20 जनवरी 2014

कायनात का ये कौन चित्रकार है ...

इक हसीन हादसे का वो शिकार है
कह रहे हैं लोग सब की वो बीमार है

शाल ओढ़ के ज़मीं पे चाँद आ गया
आज हुस्न पे तेरे गज़ब निखार है

जल तरंग बज रही है खिल रही हिना
वादियों में गुनगुना रहा ये प्यार है

चाँद की शरारतों का हो रहा असर
बिन पिए नशा है छा रहा ख़ुमार है

तू ही तू है, तू ही तू है, तू ही हर कहीं
जिस्मों जाँ पे अब तेरा ही इख्तियार है

हर कली, नदी, फिजाँ, बहार कह रही
कायनात का ये कौन चित्रकार है 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

होता है डूबते को, तिनके का ही सहारा ...

मौका नहीं है देती, ये ज़िंदगी दुबारा
जो चल पड़े सफर पे, उनको मिला किनारा

ज्ञानी हकीम सूफी, सब कह गए हकीकत
सपनों से उम्र भर फिर, होता नहीं गुज़ारा

देती है साथ तब तक, जब तक ये रौशनी है
परछाई कह रही है, समझो ज़रा इशारा

तिनका उछाल देना, जो बस में है तुम्हारे
होता है डूबते को, तिनके का ही सहारा

बापू हैं याद आते, हैरत में हों कभी तो
मुश्किल जो सामने हो, बस माँ को ही पुकारा

बचपन के चंद किस्से, बाकी थे बस ज़हन में
गुज़रे हुए समय को, कागज़ पे जब उतारा  

सोमवार, 6 जनवरी 2014

सिर किसी की आँख फोड़ कर गया ...

राह में चिराग छोड़ कर गया
जो हवा के रुख को मोड़ कर गया

क्योंकि तय है आज रात का मिलन
जुगनुओं के पँख तोड़ कर गया

बेलगाम भीड़ का वो अंग था
सिर किसी की आँख फोड़ कर गया

जुड़ नहीं सका किसी की प्रीत में
दिल से दर्द जो निचोड़ कर गया

गुनगुना रहें हैं उसके गीत सब
जो ज़मीं से साथ जोड़ कर गया

मखमली लिबास में वो तंग था
सूत का कफ़न जो ओढ़ कर गया