शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो ...

दोस्तों नव वर्ष की पूर्व-संध्या पे आप सभी को ढेरों शुभकामनाएं ... नव वर्ष सभी के लिए सुख, शांति और समृद्धि ले के आए ... सब को बहुत बहुत मंगल-कामनाएं ...
   
नए साल में नए गुल खिलेंनई हो महक नया रंग हो
यूं ही खिल रही हो ये चांदनी यूं ही हर फिज़ां में उमंग हो

तेरी सादगी मेरी ज़िंदगीतेरी तिश्नगी मेरी बंदगी
मेरे हम सफ़र मेरे हमनवामैं चलूं जो तू मेरे संग हो  

जो तेरे करम की ही बात हो मैं ख़ास हूँ वो ख़ास हो
तेरे हुस्न पर हैं सभी फिदातेरे नूर में वो तरंग हो   

तो नफ़रतों की बिसात हो तो मज़हबों की ही बात हो
उदास कोई भी रात हो चमन में कोई भी जंग हो 

कहीं खो जाऊं शहर में मैंमेरे हक़ में कोई दुआ करे
ना तो रास्ते  मेरे गाँव के , मेरे घर की राह न तंग हो


बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया ...

इक उम्र लग गई है मगर मान तो गया
मुझ को वो आज नाम से पहचान तो गया

अब जो भी फैंसला हो वो मंज़ूर है मुझे
जिसको भी जानना था वो सच जान तो गया 

दीपक हूँ मैं जो बुझ न सकूंगा हवाओं से 
कोशिश तमाम कर के ये तूफ़ान तो गया

बिल्डर की पड़ गई है नज़र रब भली करे
बच्चों के खेलने का ये मैदान तो गया

टूटे हुए किवाड़ सभी खिड़कियाँ खुली
बिटिया के सब दहेज़ का सामान तो गया
 
कर के हलाल दो ही दिनों में मेरा बजट
अच्छा हुआ जो घर से ये मेहमान तो गया 
(तरही गज़ल)

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे ...

रात के अँधेरे में, धूप हो खिली जैसे
यूँ लगे है कान्हा ने, रास हो रची जैसे

ज़ुल्फ़ की घटा ओढ़े, चाँद जैसे मुखड़े पर
बादलों के पहरे में, चांदनी सोई जैसे

सिलसिला है यादों का, या धमक क़दमों की
होले-होले बजती हो, बांसुरी कोई जैसे

चूड़ियों की खन-खन में, पायलों की रुन-झुन में
घर के छोटे आँगन में, जिंदगी बसी जैसे

यूँ तेरा अचानक ही, घर मेरे चली आना
दिल के इस मोहल्ले में आ गयी ख़ुशी जैसे
(तरही गज़ल)

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

ये अँधेरा भी छंटेगा धूप को आने तो दो
मुट्ठियों में आज खुशियाँ भर के घर लाने तो दो

खुद को हल्का कर सकोगे ज़िन्दगी के बोझ से
दर्द अपना आँसुओं के संग बह जाने तो दो

झूम के आता पवन देता निमंत्रण प्रेम का
छू सके जो मन-मयूरी गीत फिर गाने तो दो

बारिशों का रोक के कब तक रखोगे आगमन
खोल दो जुल्फें घटा सावन की अब छाने तो दो

सब की मेहनत के भरोसे आ गया इस मोड़ पर
नाम है साझा सभी के तुम शिखर पाने तो दो

पक चुकी है उम्र अब क्या दोस्ती क्या दुश्मनी
वक़्त कितना क्या पता रिश्तों को सुलझाने तो दो ...

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो ...

हम झूठ भी कहेंगे तो सच मानते हैं वो
कहते हैं मुद्दतों से हमें जानते हैं वो

हर बात पे कहेंगे हमें कुछ नहीं पता
पर खाक हर गली की सदा छानते हैं वो

कुछ लोग टूट कर भी नहीं खींचते कदम
कर के हटेंगे बात अगर ठानते हैं वो

बारिश कभी जो दर्द की लाता है आसमां
चादर किसी याद की फिर तानते हैं वो

तो क्या हुआ नज़र से नहीं खुल के कह सके

भाषा को खूब प्रेम की पहचानते है वो ...

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

इस शहर की शांति तो भंग है ...

नाम पर पूजा के ये हुड़दंग है
इस शहर की शांति तो भंग है

लूटता है आस्था के नाम पर 
अब कमाने का निराला ढंग है

हर कोई आठों पहर है भागता  
जिंदगी जैसे के कोई जंग है

घर का दरवाज़ा तो चौड़ा है बहुत
दिल का दरवाज़ा अगरचे तंग है

आइना काहे उसे दिखलाए हैं
उड़ गया चेहरे का देखो रंग है

युद्ध अपना खुद ही लड़ते हैं सभी
जिंदगी में कौन किसके संग है

सोमवार, 14 नवंबर 2016

इन आँखों से ये ख्वाब ले लो ...

अपने ख़त का जवाब ले लो
इन हाथों से गुलाब ले लो

चाहो मिलना कभी जो मुझ से
दिल की मेरे किताब ले लो

अनजाने ही दिए थे जो फिर
उन ज़ख्मों का हिसाब ले लो

मिलने वाला बने न दुश्मन
चेहरे पर ये नकाब ले लो

अमृत सा वो असर करेगी
उनके हाथों शराब ले लो

काटेंगे ये सफ़र अकेला
इन आँखों से ये ख्वाब ले लो

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

अम्मा का दिल टूट गया ...

पुरखों का घर छूट गया
अम्मा का दिल टूट गया

दरवाज़े पे दस्तक दी
अन्दर आया लूट गया

मिट्टी कच्ची होते ही
मटका धम से फूट गया

मजलूमों की किस्मत है
जो भी आया कूट गया

सीमा पर गोली खाने
अक्सर ही रंगरूट गया

पोलिथिन आया जब से
बाज़ारों से जूट गया 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

गड्ढे में ...

मौत ने कैसा रंग जमाया गड्ढे में
मिट्टी को मिट्टी से मिलाया गड्ढे में

नेकी कर गड्ढे में डालो अच्छा है
वर्ना जितना साथ निभाया गड्ढे में

पहले तो गज भर खोदो मिल जाता था
पानी के अब खूब रुलाया गड्ढे में

मेहनत से बिगड़ी बातें बन जाती हैं
मकड़ी ने है पाठ पढ़ाया गड्ढे में

ग्रहण लगा था बचपन में तब अब्बू ने
पानी भर के चाँद दिखाया गड्ढे में

जीवन भर का साथ मगर मौत आने पर
जल्दी जल्दी हमें सुलाया गड्ढे में

घर जाते तक दुनियादारी जाग गई
मिल के डाले फूल भुलाया गड्ढे में 

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए ...

कुछ यूँ फिसल के वो मेरी बाहों में आ गए 
ना चाहते हुए भी निगाहों में आ गए

सच की तलाश थी में अकेला निकल पड़ा
जुड़ते रहे थे लोग जो राहों में आ गए 

हम भीगने को प्रेम की बरसात में सनम
कुछ देर बादलों की पनाहों में आ गए

था प्रेम उनसे उनके लगे झूठ सच सभी
ना चाह कर भी उनके गुनाहों में आ गए

मशहूर हो गया है हमारा भी नाम अब
हम भी किसी हसीन की आहों में आ गए 

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते ...

अपने असूलों को कभी छोड़ा नहीं करते
साँसों की ख़ातिर लोग हर सौदा नहीं करते

महफूज़ जिनके दम पे है धरती हवा पानी
हैं तो ख़ुदा होने का पर दावा नहीं करते

हर मोड़ पर मुड़ने से पहले सोचना इतना
कुछ रास्ते जाते हैं बस लौटा नहीं करते

इतिहास की परछाइयों में डूब जाते हैं
गुज़रे हुए पन्नों से जो सीखा नहीं करते

आकाश तो उनका भी है जितना हमारा है
उड़ते परिंदों को कभी रोका नहीं करते

जो हो गया सो हो गया खुद का किया था सब
अपने किए पे बैठ कर रोया नहीं करते
  

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम
नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकन करो तुम

परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर    
व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुम

तुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरा न देना
समय फिर आए ना ऐसा की आवेदन करो तुम  

अभी भी मान लो सच को बहुत आसान होगा
कहीं लक्षमण की रेखा का न उल्लंघन करो तुम

समझदारी से अपनी बात सबके बीच रखना
कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम 

रविवार, 25 सितंबर 2016

माँ ...

माँ को गए आज चार साल हो गए पर वो हमसे दूर है शायद ही किसी पल ऐसा लगा ... न सिर्फ मुझसे बल्कि परिवार के हर छोटे बड़े सदस्य के साथ माँ का जो रिश्ता था वो सिर्फ वही समझ सकता है ... मुझे पूरा यकीन है जब तक साँसें रहेंगी माँ के साथ उस विशेष लगाव को उन्हें भुलाना आसान नहीं होगा ... बस में होता तो आज का दिन कभी ना आने देता पर शायद माँ जानती थी जीवन के सबसे बड़े सत्य का पाठ वही पढ़ा सकती थी ... सच बताना माँ ... क्या इसलिए ही तुम चली गईं ना ...   


ज़िन्दगी की अंजान राहों पर
अब डर लगने लगा है

तुमने ही तो बताया था 
ये कल-युग है द्वापर नहीं  
कृष्ण बस लीलाओं में आते हैं अब
युद्ध के तमाम नियम
दुर्योधन के कहने पर तय होते हैं
देवों के श्राप शक्ति हीन हो चुके हैं
 
मैं अकेला और दूर तक फैली क्रूर नारायणी सेना
हालांकि तेरा सिखाया हर दाव
खून बन के दौड़ता है मेरी रगो में

एक तुम ही तो सारथी थीं
हाथ पकड़ कर ले आईं यहाँ तक
मेरी कृष्ण, मेरी माया
जिसके हाथों सुरक्षित थी मेरी जीवन वल्गा

अकेला तो मैं अब भी हूँ
जिंदगी के ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हैं हर पल 
और मेरा रथ भी वैसे ही दौड़ रहा है

सच बताना माँ

मेरी जीवन वल्गा अब भी तुम्हारे हाथों में ही है न ...? 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

पलकों के मुहाने पे समुन्दर न देख ले ...

डरता हूँ कहीं तेज़ धुरंधर न देख ले
हर बात में अपने से वो बेहतर न देख ले

शक्की है गुनहगार ही समझेगा उम्र भर
कोशिश ये करो हाथ में खंजर न देख ले

ऐसे न खरीदेगा वो सामान जब तलक
दो चार जगह घूम के अंतर न देख ले

मुश्किल से गया है वो सभी मोह छोड़ कर 
कुछ देर रहो मौन पलटकर न देख ले

नक्शा जो बने प्याज को रखना दिमाग में
दीवार कभी तोड़ के अन्दर न देख ले 

एहसास उसे दिल के दिखाना न तुम कभी
पलकों के मुहाने पे समुन्दर न देख ले  

सोमवार, 12 सितंबर 2016

क्यों खड़े कर दिए मकाँ इतने ...

दिख रहे ज़ुल्म के निशाँ इतने
लोग फिर भी हैं बे-जुबां इतने

एक प्याऊ है बूढ़े बाबा का
लोग झुकते हैं क्यों वहाँ इतने

सुख का साया न दुःख के बादल हैं
पार कर आए हैं जहाँ इतने

घूम के लौटती हैं ये सडकें
जा रहे फिर भी कारवाँ इतने

माँ मेरे साथ साथ रहती है
किसको मिलते हैं आसमाँ इतने

दिल किसी का धड़क नहीं पाया
पत्थरों के थे आशियाँ इतने

ख़ाक तो ख़ाक में ही मिलनी है
क्यों खड़े कर दिए मकाँ इतने


सोमवार, 5 सितंबर 2016

हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों ...

उग रहे बारूद खन्जर इन दिनों
हो गए हैं खेत बन्जर इन दिनों

चौकसी करती हैं मेरी कश्तियाँ
हद में रहता है समुन्दर इन दिनों

आस्तीनों में छुपे रहते हैं सब
लोग हैं कितने धुरन्धर इन दिनों

आदतें इन्सान की बदली हुईं
शहर में रहते हैं बन्दर इन दिनों

आ गए पत्थर सभी के हाथ में
हो गए हैं सब सिकन्दर इन दिनों

सोमवार, 29 अगस्त 2016

एक टुकड़ा धूप का ले आऊंगा ...

एक टुकड़ा धूप का ले आऊंगा
जब कभी सूरज से मैं टकराऊंगा

"सत्य" सच है जान कर जाना नहीं
दूसरों को किस कदर समझाऊंगा

जब खुला आकाश देखूंगा कभी
पंख अपने खोल कर उड़ जाऊँगा

प्लास्टिक के फूल का जुमला सुनो
",मैं प्रदूषण से नहीं मुरझाऊंगा"

दूर थे फिर वोट नेता ने कहा
राग दीपक वक़्त पर ही गाऊंगा

कहकहे भी ऐश भी थी मुफ्त में
जेब में मैं कहकहे भर लाऊंगा

सोमवार, 22 अगस्त 2016

इंसानियत का झंडा कब से यहाँ खड़ा है ...

बीठें पड़ी हुई हैं, बदरंग हो चुका है
इंसानियत का झंडा, कब से यहाँ खड़ा है

सपने वो ले गए हैं, साँसें भी खींच लेंगे
इस भीड़ में नपुंसक, लोगों का काफिला है

सींचा तुझे लहू से, तू मुझपे हाथ डाले
रखने की पेट में क्या, इतनी बड़ी सजा है

वो काट लें सरों को, मैं चुप रहूँ हमेशा
सन्देश क्या अमन का, मेरे लिए बना है

क्यों खौलता नहीं है, ये खून बाजुओं में
क्या शहर की जवानी, पानी का बुलबुला है

बारूद कर दे इसको, या मुक्त कर दे इससे
ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है

(तरही गज़ल ...) 

सोमवार, 15 अगस्त 2016

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...

सभी देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...

लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए

हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए

मुक्त पंछी, मुक्त मन, हों मुक्त आशाएं सभी
मुक्त हो धरती पवन आकाश नीला चाहिए

पीत सरसों, पीत चन्दन, खिल उठे सूरजमुखी
लहलहाता खेत हो परिधान पीला चाहिए

प्रेम निश्छल नैन पुलकित संतुलित सा आचरण
स्वप्न सत-रंगी सरल यौवन सजीला चाहिए

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा
चिर विजय की कामना हो कृष्ण लीला चाहिए  

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

मेरी चाहत है बचपन की सभी गलियों से मिलने की ...

कभी गोदी में छुपने की कभी घुटनों पे चलने की
मेरी चाहत है बचपन की सभी गलियों से मिलने की

सजाने को किसी की मांग में बस प्रेम काफी है
जरूरी तो नहीं सूरज के रंगों को पिघलने की

कहाँ कोई किसी का उम्र भर फिर साथ देता है
ज़रुरत है हमें तन्हाइयों से खुद निकलने की

वहां धरती का सीना चीर के सूरज निकलता है
जहां उम्मीद रहती है अँधेरी रात ढलने की

बड़ी मुश्किल से मिलती है किसी को प्रेम की हाला
मिली है गर नसीबों से जरूरत क्या संभलने की

उसे मिलना था खुद से खुद के अन्दर ही नहीं झाँका
खड़ा है मोड़ पे कबसे किसी शीशे से मिलने की  

सोमवार, 1 अगस्त 2016

मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा ...

जहाँ बिकता हुआ ईमान होगा
बगल में ही खड़ा इंसान होगा

हमें मतलब है अपने आप से ही
जो होगा गैर का नुक्सान होगा

दरिंदों की अगर सत्ता रहेगी
शहर होगा मगर शमशान होगा

दबी सी सुगबुगाहट हो रही है
दीवारों में किसी का कान होगा

बड़ों के पाँव छूता है अभी तक
मेरी तहजीब की पहचान होगा

लड़ाई नाम पे मजहब के होगी
मगर तकसीम हिंदुस्तान होगा