सोमवार, 14 अगस्त 2017

सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे ...

सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ-कामनाएं ... इस पावन पर्व की पूर्व संध्या पर आज के हालात पे लिखी गज़ल प्रस्तुत है ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ...

जब तलक नापाक हरकत शत्रु की सहते रहेंगे
देश की सीमाओं पर सैनिक सदा मरते रहेंगे

पत्थरों से वार कर उक्सा रहे हैं देश-द्रोही
और कब तक हम अहिंसा मार्ग पर चलते रहंगे

मानता हूँ सिर के बदले सिर नहीं क़ानून अपना 
पर नहीं स्वीकार अपने वीर यूँ कटते रहेंगे

दक्ष हो कर आज फिर प्रतिशोध तो लेना पड़ेगा
सर्प कब तक आस्तीनों में छुपे पलते रहेंगे

एक ही आघात में अब क्यों नहीं कर दें बराबर 
शांति चर्चा, वार्ताएं बाद में करते रहेंगे 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

हर युग के कुछ सवाल हैं जो हल नहीं हुए ...

कविता के लम्बे दौर से निकलने का मन तो नहीं था, फिर लगा कहीं गज़ल लिखना भूल तो नहीं गया ... इसलिए आज ग़ज़ल के साथ हाजिर हूँ आपके बीच ... आशा है सबका स्नेह मिलता रहेगा ... 

डूबे ज़रुर आँख के काजल नहीं हुए
कुछ लोग हैं जो इश्क में पागल नहीं हुए 

है आज अपने हाथ में करना है जो करो
कुछ भी न कर सकोगे अगर कल नहीं हुए

अब तक तो हादसों में ये मुमकिन नहीं हुआ
गोली चली हो लोग भी घायल नहीं हुए

आकाश के करीब न मिट्टी के पास ही
अच्छा है आसमान के बादल नहीं हुए

सूरज की रोशनी को वो बांटेंगे किस कदर 
सर पर कभी जो धूप के कंबल नहीं हुए

हो प्रश्न द्रोपदी का के सीता की बात हो  
हर युग के कुछ सवाल हैं जो हल नहीं हुए 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

वक़्त ज़िंदगी और नैतिकता ...

क्या सही क्या गलत ... खराब घुटनों के साथ रोज़ चलते रहना ज़िंदगी की जद्दोजहद नहीं दर्द है उम्र भर का ... एक ऐसा सफ़र जहाँ मरना होता है रोज़ ज़िंदगी को ... ऐसे में ... सही बताना क्या में सही हूँ ...

फुरसत के सबसे पहले लम्हे में
बासी यादों की पोटली लिए  
तुम भी चली आना टूटी मज़ार के पीछे
सुख दुःख के एहसास से परे
गुज़ार लेंगे कुछ पल सुकून के

की थोड़ा है ज़िंदगी का बोझ  
सुकून के उस एक पल के आगे

कल फिर से ढोना है टूटे कन्धों पर
पत्नी की तार-तार साड़ी का तिरस्कार
माँ की सूखी खांसी की खसक  
पिताजी के सिगरेट का धुंवा
बढ़ते बच्चों की तंदुरुस्ती का खर्च
और अपने लिए ...
साँसों के चलते रहने का ज़रिया  

नैतिकता की बड़ी बड़ी बातों सोचने का 
वक़्त कहाँ देती है ज़िंदगी  

बुधवार, 19 जुलाई 2017

यादें ... बस यादें

यादें यादें यादें ... क्या आना बंद होंगी ... काश की रूठ जाएँ यादें ... पर लगता तो नहीं और साँसों तक तो बिलकुल भी नहीं ... क्यों वक़्त जाया करना ...

मिट्टी की
कई परतों के बावजूद
हलके नहीं होते
कुछ यादों की निशान
हालांकि मूसलाधार बारिश के बाद
साफ़ हो जाता है आसमान

साफ़ हो जाती हैं
गर्द की पीली चादर ओढ़े
हरी हरी मासूम पत्तियां

साफ़ हो जाती हैं
उदास घरों की टीन वाली छतें

ओर ... ये काली सड़क भी
रुकी रहती है जो
तेरे लौटने के इंतज़ार में

इंतज़ार है जो ख़त्म नहीं होता
जंगली गुलाब है 
जो खिलता बंद नहीं करता   

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

आंख-मिचोली ... नींद और यादों की

नींद और यादें ... शायद दुश्मन हैं अनादी काल से ... एक अन्दर तो दूजा बाहर ... पर क्यों ... क्यों नहीं मधुर स्वप्न बन कर उतर आती हैं यादें आँखों में ... जंगली गुलाब भी तो ऐसे ही खिल उठता है सुबह के साथ ...  

सो गए पंछी घर लौटने के बाद  
थका हार दिन, बुझ गया अरब सागर की आगोश में  
गहराती रात की उत्ताल तरंगों के साथ
तेरी यादों का शोर किनारे थप-थपाने लगा
आसमान के पश्चिम छोर पे
टूटते तारे को देखते देखते, तुम उतर जाती हो आँखों में  
(नींद तो अभी दस्तक भी न दे पाई थी)

जागते रहो” की आवाज़ के साथ
घूमती है रात, गली की सुनसान सड़कों पर 
पर नींद है की नहीं आती
तुम जो होती हो 
सुजागी आँखों में अपना कारोबार फैलाए  

रात का क्या, यूं ही गुज़र जाती है

और ठीक उस वक़्त 
जब पूरब वाली पहाड़ी के पीछे लाल धब्बों की दादागिरी
जबरन मुक्त करती है श्रृष्टि को अपने घोंसले से
छुप जाती हो तुम बोझिल पलकों में

उनींदी आँखों में नीद तो उस वक़्त भी नहीं आती

हाँ ... डाली पे लगा जंगली गुलाब 
जाने क्यों मुस्कुराने लगता है उस पल ...