सोमवार, 10 अगस्त 2020

हाथ खेतों की धान होते हैं

वो जो कड़वी ज़ुबान होते हैं, 
एक तन्हा मचान होते हैं.


चुप ही रहने में है समझदारी, 
कुछ किवाड़ों में कान होते हैं.

एक दो, तीन चार, बस भी करो, 
लोग चूने का पान होते हैं.

उम्र है लोन, सूद हैं सासें, 
अन्न-दाता, किसान होते हैं.

गोलियाँ, गालियाँ, खड़े तन कर,
फौज के ही जवान होते हैं. 
 
जो नहीं हैं रियाज़ के आदी,
एक टूटी सी तान होते हैं.
 
रख दिए साहूकार पे गिरवी,
हाथ खेतों की धान होते हैं.

सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी


अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी

 

तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा

सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी

 

अभी तो रात ने दिन का शटर खोला नहीं है

चलो इक नींद तो लेने दो तुम बाहों में अपनी

 

कभी गुस्सा, झिझकना, रूठना, फिर मान जाना

हमेशा बोलती रहती हो तस्वीरों में अपनी

 

कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे

समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी

 

ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में

दुआएं दोस्तों की गई खातों में अपनी

 

कई अलफ़ाज़ जब मुंह मोड़ लेते हैं बहर से

तुम्हारा नाम लिख देता हूँ बस ग़ज़लों में अपनी

 

सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी

 

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी चाल अल्हड़

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी

सोमवार, 27 जुलाई 2020

वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया


आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कन्धा रह गया
वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया

मिल गया जो उसकी माया, जो हुआ उसका करम
पा लिया तुझको तो सब अपना पराया रह गया

आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम 
झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया

छू के तुझको कुछ कहा तितली ने जिसके कान में 
इश्क़ में डूबा हुआ वाहिद वो पत्ता रह गया

आपको देखा अचानक बज उठी सीटी मेरी
उम्र तो बढ़ती रही पर दिल में बच्चा रह गया

कर भी देता मैं मुकम्मल शेर तेरे हुस्न पर
क्या कहूँ लट से उलझ कर एक मिसरा रह गया

मैं भी कुछ जल्दी में था, रुकने को तुम राज़ी न थीं
शाम का नीला समुन्दर यूँ ही तन्हा रह गया

बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू  
इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया

कुछ कहा नज़रों ने, कुछ होठों ने, सच किसको कहूँ 
यूँ शराफत सादगी में पिस के बंदा रह गया

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं ...


उदासी से घिरी तन्हा छते हैं
कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं

लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं

लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

सोमवार, 20 जुलाई 2020

हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे


ज़िन्दगी में हैं कई लोग आग हों जैसे
हर अँधेरे में सुलगते हैं जुगनुओं जैसे

सोच लेता हूँ कई बार बादलों जैसे
भीग लेने दूं किसी छत को बारिशों जैसे

बैठे बैठे भी कई बार चौंक जाता हूँ
दिल में रहते हैं कई लोग हादसों जैसे

हम सफ़र बन के मेरे साथ वो नहीं तो क्या
मील दर मील खड़े हैं वो पत्थरों जैसे   

दिल के गहरे में कई दर्द रोज़ उठते हैं
भूल जाता हूँ में हर बार मुश्किलों जैसे

लोग ऐसे भी मेरी ज़िन्दगी में आए हैं
खिलते रहते हैं हमेशा जो तितलियों जैसे

सरसरी सी ही नज़र डालना कभी हम पर
हमको पढ़ते हैं कई लोग सुर्ख़ियों जैसे

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है ...


कहीं खामोश है कंगन, कहीं पाज़ेब टूटी है
सिसकता है कहीं तकिया, कहीं पे रात रूठी है

अटक के रह गई है नींद पलकों के मुहाने पर
सुबह की याद में बहकी हुई इक शाम डूबी है

यहाँ कुछ देर बैठो चाय की दो चुस्कियाँ ले लो
यहीं से प्रेम की ऐ. बी. सी. पहली बार सीखी है

न क्यों सब इश्क़ के बीमार मिल कर के बहा आएँ
इसी सिन्दूर ने तो आशिकों की जान लूटी है

उसे भी एड़ियों में इश्क़ का काँटा चुभा होगा
मेरी भी इश्क़ की पगडंडियों पे बाँह छूटी है

धुंवे में अक्स तेरा और भी गहरा नज़र आए   
किसी ने साथ सिगरेट के तुम्हारी याद फूँकी है

झमाँ झम बूँद बरसी, और बरसी, रात भर बरसी
मगर इस प्रेम की छत आज भी बरसों से सूखी है

बहाने से बुला लाया जुनूने इश्क़ भी तुमको
खबर सर टूटने की सच कहूँ बिलकुल ही झूठी है

किसी की बाजुओं में सो न जाए थक के ये फिर से
गई है उठ के तकिये से अभी जो रात बीती है

सोमवार, 6 जुलाई 2020

इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या ...

यूँ ही मुझको सता रही हो क्या 
तुम कहीं रूठ क चली हो क्या

उसकी यादें हैं पूछती अक्सर
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

मुद्दतों से तलाश है जारी
ज़िन्दगी मुझसे अजनबी हो क्या

वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या

तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
माँ कहीं आस पास ही हो क्या

दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
एक लम्हा था अब सदी हो क्या

मुझसे औलाद पूछती है अब
इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
(तरही गज़ल)

सोमवार, 29 जून 2020

चन्द यादों के कुछ करेले हैं ...


गम के किस्से, ख़ुशी के ठेले हैं
ज़िन्दगी में बहुत झमेले हैं

वक़्त का भी अजीब आलम है
कल थी तन्हाई आज मेले हैं

बस इसी बात से तसल्ली है
चाँद सूरज सभी अकेले हैं

भूल जाते हैं सब बड़े हो कर
किसके हाथों में रोज़ खेले हैं

चुप से बैठे हैं आस्तीनों में
नाग हैं या के उसके चेले हैं

टूट जाते हैं गम की आँधी से
लोग मिट्टी के कच्चे ढेले हैं

कितने मीठे हैं आज ये जाना
चन्द यादों के कुछ करेले हैं

खोल के ज़ख्म सब दिखा देंगे
मत कहो तुमने दर्द झेले हैं

सोमवार, 22 जून 2020

ईगो ...


दो पीठ के बीच का फांसला
मुड़ने के बाद ही पता चल पाता है

हालांकि इन्च भर दूरी
उम्र जितनी नहीं
पर सदियाँ गुज़र जाती हैं तय करने में

"ईगो" और "स्पोंड़ेलाइटिस"
कभी कभी एक से लगते हैं दोनों
फर्क महसूर नहीं होता

दर्द होता है मुड़ने पे
पर मुश्किल भी नहीं होती

जरूरी है बस एक ईमानदार कोशिश
दोनों तरफ से
एक ही समय, एक ही ज़मीन पर

हाँ ... एक और बात
ज़रूरी है मुड़ने की इच्छा का होना 

सोमवार, 15 जून 2020

यूँ ही गुज़रा - एक ख्याल ...


शबनम से लिपटी घास पर
नज़र आते हैं कुछ क़दमों के निशान

सरसरा कर गुज़र जाता है झोंका
जैसे गुजरी हो तुम छू कर मुझे

हर फूल देता है खुशबू जंगली गुलाब की  

खुरदरी हथेलियों की चिपचिपाहट
महसूस कराती है तेरी हाथों की तपिश  

उड़ते हुए धुल के अंधड़ में
दिखता मिटता है तेरा अक्स अकसर

जानता हूँ तुम नहीं हो आस-पास कहीं
पर कैसे कह दूँ की तुम दूर हो ...

#जंगली_गुलाब