सोमवार, 18 जनवरी 2021

ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई ...

पीठ तेरी नज्र से जो जल गई.
ज़िन्दगी तब से ही हमको छल गई.
 
रौशनी आई सुबह ने कह दिया,
कुफ्र की जो रात थी वो ढल गई.
 
मुस्कुराए हम भी वो भी हंस दिए,
मोम की दीवार थी पिघल गई.
 
रात भर कश्ती संभाले थी लहर,
दिन में अपना रास्ता बदल गई.
 
इस तरफ कूआं तो खाई उस तरफ,
बच के किस्मत बीच से निकल गई.
 
जब तलक ये दाड़ अक्ल का उगा,
ज़िन्दगी भी रेत सी फिसल गई.

बुधवार, 6 जनवरी 2021

आम सा ये आदमी जो अड़ गया ...

सच के लिए हर किसी से लड़ गया.
नाम का झन्डा उसी का गढ़ गया.
 
ठीक है मिलती रहे जो दूर से,
धूप में ज्यादा टिका जो सड़ गया.
 
हाथ बढ़ाया न शब्द दो कहे, 
मार के ठोकर उसे वो बढ़ गया.
 
प्रेम के नगमों से थकेगा नहीं,
आप का जादू कभी जो चढ़ गया.
 
होश ठिकाने पे आ गए सभी,
वक़्त तमाचा कभी जो जड़ गया.
 
बाल पके, एड़ियाँ भी घिस गईं,
कोर्ट से पाला कभी जो पड़ गया.
 
जो न सितम मौसमों के सह सका,
फूल कभी पत्तियों सा झड़ गया.
 
तन्त्र की हिलने लगेंगी कुर्सियाँ,
आम सा ये आदमी जो अड़ गया.

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

कभी वो आपकी, अपनी कभी सुनाते हैं

२०२० कई खट्टी-मीठी यादें ले के बीत गया ... जीवन जीने का नया अंदाज़ सिखा गया ... आप सब सावधान रहे, संयम बरतें ... २०२१ का स्वागत करें ... मेरी बहुत बहुत शुभकामनायें सभी को ...
 
हमारे प्यार की वो दास्ताँ बताते हैं
मेरी दराज़ के कुछ ख़त जो गुनगुनाते हैं 
 
चलो के मिल के करें हम भी अपने दिल रोशन
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं
 
किसी के आने की हलचल थीं इन हवाओं में
तभी पलाश के ये फूल खिलखिलाते हैं
 
झुकी झुकी सी निगाहें हैं पूछती मुझसे
ये किसके ख्वाब हैं जो रात भर जगाते हैं
 
कभी न प्यार में रिश्तों को आजमाना तुम
के आजमाने से रिश्ते भी टूट जाते हैं
 
अँधेरी रात के बादल को गौर से सुनना
कभी वो आपकी, अपनी कभी सुनाते हैं  

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

ये कायनात इश्क में डूबी हुई मिली

सागर की बाज़ुओं में उतरती हुई मिली.
तन्हा उदास शाम जो रूठी हुई मिली.
 
फिर से किसी की याद के लोबान जल उठे ,
बरसों पुरानी याद जो भूली हुई मिली.
 
बिखरा जो काँच काँच तेरा अक्स छा गया ,  
तस्वीर अपने हाथ जो टूटी हुई मिली.
 
कितने दिनों के बाद लगा लौटना है अब ,
बुग्नी में ज़िन्दगी जो खनकती हुई मिली.
 
सुनसान खूँटियों पे था कब्ज़ा कमीज़ का,
छज्जे पे तेरी शाल लटकती हुई मिली.
 
यादों के सिलसिले भी, परिन्दे भी उड़ गए ,
पेड़ों की सब्ज़ डाल जो सूखी हुई मिली.
 
ख्वाहिश जो गिर गई थी शिखर के करीब से ,      
सत्तर की उम्र में वो चिढ़ाती हुई मिली.
 
बिस्तर की हद, उदास रज़ाई की सिसकियाँ ,
सिगड़ी में एक रात सुलगती हुई मिली .
 
तितली ने जबसे इश्क़ चमेली पे लिख दिया ,
ये कायनात इश्क में डूबी हुई मिली.

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

मगर फिर भी वो इठलाती नहीं है ...

कोई भी बात उकसाती नहीं है
न जाने क्यों वो इठलाती नहीं है
 
कभी दौड़े थे जिन पगडंडियों पर
हमें किस्मत वहाँ लाती नहीं है

मुझे लौटा दिया सामान सारा
है इक “टैडी” जो लौटाती नहीं है
 
कहाँ अब दम रहा इन बाजुओं में
कमर तेरी भी बलखाती नहीं है
 
नहीं छुपती है च्यूंटी मार कर अब
दबा कर होठ शर्माती नहीं है
 
तुझे पीता हूँ कश के साथ कब से
तू यादों से कभी जाती नहीं है
 
“छपक” “छप” बारिशों की दौड़ अल्हड़
गली में क्यों नज़र आती नहीं है
 
अभी भी ओढ़ती है शाल नीली
मगर फिर भी वो इठलाती नहीं है

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

बहुत आसान है सपने चुराना ...

नया ही चाहिए कोई बहाना.
तभी फिर मानता है ये ज़माना.
 
परिंदों का है पहला हक़ गगन पर,
हवा में देख कर गोली चलाना.
 
दरो दीवार खिड़की बन्द कर के,
किसी के राज़ से पर्दा उठाना.
 
सृजन होगा वहाँ हर हल में बस,
जहाँ मिट्टी वहां गुठली गिराना.
 
यहाँ आँसू के कुछ कतरे गिरे थे,
यहीं होगा मुहब्बत का ठिकाना.
 
लहर ले जाएगी मिट्टी बहा कर,
किनारों पर संभल कर घर बनाना.
 
न करना ज़िक्र सपनों का किसी से,
बहुत आसान है सपने चुराना.

सोमवार, 23 नवंबर 2020

जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम ...

बहला रहे हो झूठ से पगले नहीं हैं हम.
बोलो न बात जोर से बहरे नहीं हैं हम.
 
हमसे जो खेलना हो संभल कर ही खेलना,
शतरंज पे फरेब के मोहरे नहीं हैं हम.
 
सोने सी लग रही हैं ये सरसों की बालियाँ,
तो क्या है जो किसान सुनहरे नहीं हैं हम.
 
हरबार बे-वजह न घसीटो यहाँ वहाँ,   
मसरूफियत है, इश्क़ में फुकरे नहीं हैं हम.  
 
मुश्किल हमारे दिल से उभरना है डूब के, 
हैं पर समुंदरों से तो गहरे नहीं हैं हम.
 
गुमनाम बस्तियों में गुजारी है ज़िन्दगी,
जगमग बुलंदियों पे ही ठहरे नहीं हैं हम.

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

जो कायरों से मरोगे तो कुछ नहीं होगा ...

गुलाम बन के रहोगे तो कुछ नहीं होगा
निज़ाम से जो डरोगे तो कुछ नहीं होगा
 
तमाम शहर के जुगनू हैं कैद में उनकी  
चराग़ छीन भी लोगे तो कुछ नहीं होगा
 
समूचा तंत्र है बहरा, सभी हैं जन गूंगे
जो आफताब भी होगे तो कुछ नहीं होगा
 
बदल सको तो बदल दो जहाँ की तुम किस्मत
जो भीड़ बन के चलोगे तो कुछ नहीं होगा 
 
कलम के साथ ज़रूरी है सबकी सहभागी
नहीं जो मिल के लड़ोगे तो कुछ नहीं होगा
 
जो मौत आ ही गयी मरना मार कर दुश्मन
जो कायरों से मरोगे तो कुछ नहीं होगा

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2020

मान लेते हैं हमारी हार है ...

आस्तीनों में छुपी तलवार है
और कहता है के मेरा यार है
 
गर्मियों की छुट्टियाँ भी खूब हैं
रोज़ बच्चों के लिए इतवार है
 
सच परोसा चासनी के झूठ में
छप गया तो कह रहा अख़बार है
 
चैन से जीना कहाँ आसान जब
चैन से मरना यहाँ दुश्वार है
 
दर्द में तो देख के राज़ी नहीं
यूँ जताते हैं की मुझ से प्यार है
 
खुद से लड़ने का हुनर आता नहीं  
मान लेते हैं हमारी हार है
 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

मुझे तू ढूंढ कर मुझसे मिला दे ...

मुझे इक आईना ऐसा दिखा दे.
हकीकत जो मेरी मुझको बता दे.
 
नदी हूँ हद में रहना सीख लूंगी,
जुदा सागर से तू मुझको करा दे.
 
में गीली रेत का कच्चा घरोंदा,
कहो लहरों से अब मुझको मिटा दे.
 
बढ़ा के हाथ कोशिश कर रहा हूँ,
ज़रा सा आसमाँ नीचे झुका दे.
 
में तारा हूँ चमक बाकी रहेगी,
अंधेरों में मेरा तू घर बना दे.
 
महक फूलों की रोके ना रुकेगी,
भले ही लाख फिर पहरे बिठा दे.
 
में खुद से मिल नहीं पाया हूँ अब तक,
मुझे तू ढूंढ कर मुझसे मिला दे.