रविवार, 25 सितंबर 2022

माँ …

बीतते बीतते आज दस वर्ष हो गएवर्ष बदलते रहे पर तारीख़ वही 25 सितम्बर … सच है जाने वाले याद रहते हैं मगर तारीख़ नहींपरदेख आज की तारीख़ ऐसी है जो भूलती ही नहीं … तारीख़ ही क्योंदिनमहीनासालकुछ भी नहीं भूलता … और तू … अब क्या कहूँ… मज़ा तो अब भी आता है तुझसे बात करने का … तुझे महसूस करने का … 


माँ हक़ीक़त में तु मुझसे दूर है.

पर मेरी यादों में तेरा नूर है.


पहले तो माना नहीं था जो कहा,

लौट कह फिर सेअब मंज़ूर है.


तू हमेशा दिल में रहती है मगर,

याद करना भी तो इक दस्तूर है.


रोक पाना था नहीं मुमकिन तुझे,

क्या करूँ अब दिल बड़ा मजबूर है.


तू मेरा संगीतगुरु-बाणीभजन,

तू मेरी वीणामेरा संतूर है.


तू ही गीता ज्ञान है मेरे लिए,

तू ही तो रसखानमीरासूर है.


तू खुली आँखों से अब दिखती नहीं,

पर तेरी मौजूदगी भरपूर है.

बुधवार, 21 सितंबर 2022

नाज़ुक ख्वाब ...

उनींदी सी रात ओढ़े
जागती आँखों ने हसीन ख्व़ाब जोड़े
 
सुबह की आहट से पहले
छोड़ आया उन्हें तेरी पलकों तले
 
कच्ची धूप की पहली किरण
तुम्हारी पलकों पे जब दस्तक दे
हौले से अपनी नज़रें उठाना
नाज़ुक से मेरे ख्वाब
बिखर न जाएँ समय से पहले कहीं ...

सोमवार, 12 सितंबर 2022

नाक़ाम इश्क़ ...

काँटों की चुभन है नाक़ाम इश्क़
रहने नहीं देती जो चैन से
महसूस होता है रिस्ता दर्द, रह-रह के चुभती कील सरीखे
 
एक अन्तहीन दौड़ की दौड़ 
क्या प्रेम की प्राप्ति के लिए ? 
या भटकता है खुद की तलाश में इन्सान ?
 
नाक़ाम इश्क़ के रिश्ते सँजोना
दीमक लगे पेड़ को जीवित रखने का प्रयास है
जो पनपने नहीं देता नए रिश्तों की नाज़ुक कोंपलें
 
काटना होता है ऐसे तमाम पेड़ों को दिल की बंज़र ज़मीन से
 
खिले होते हैं बहुत से जंगली गुलाब
नज़र भर देखना होता है आस-पास का मंज़र   
 
ज़िन्दगी की दौड़ में
समय बदलते ... समय नहीं लगता ...

बुधवार, 7 सितंबर 2022

रेशमी एहसास ...

हरे पहाड़ों की चोटियों से
उतरते सफ़ेद बादल
रुक जाते हैं बल खाती काली सड़क के सीने पर
 
ललक है तुम्हें छूने की
इतना करीब से
की समेट सकें तेरी साँसों की महक उम्र भर के लिए
 
वो जानते हैं झाँकोगी तुम खुली खिड़की से  
छुओगी नर्म हथेली से वो रेशमी एहसास ...  
ठीक उसी वक़्त मैं भी हो जाऊँगा धुँवा-धुँवा  
घुल जाऊँगा बादलों की नर्म छुवन में
 
सुन प्रकृति की अप्रतिम रचना ... मेरे जंगली गुलाब  
छू के देखना अपने माथे की चन्द लकीरों उस पल   
नमी की बूँद में महसूस करोगी मुझको    

शनिवार, 27 अगस्त 2022

एब-इनीशियो ...

क्या ऐसा होता है  
कुछ कदम किसी के साथ चले
फिर भूल गए उस हम-कदम को ज़िन्दगी भर के लिए ...
 
कुछ यादें जो उभर आई हों ज़हन में
गुम हो जाएँ चुपचाप जैसे रात का सपना ...
 
चेहरे पर उभरी कुछ झुर्रियाँ
गायब हो जाएँ यक-ब-यक जैसे जवानी का लौटना
 
उम्र का मोड़ जहाँ बस अतीत ही होता है हमसफ़र
सब कुछ हो जाए “एब-इनीशियो” ...
“जैसे कुछ हुआ ही नहीं”
 
सोचता हूँ कई कभी ...
उम्र के उस एक पढ़ाव पर “अल्ज़ाइमर” उतना भी बुरा नहीं ...   

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

श्री कृष्ण …

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की सभी को बहुत बहुत बधाई …


सकल जगत अपना हुआजीत  कोई हार 
कान्हा जी से जुड़ गएअंतर्मन के तार 


कान्हा जी ऐसा करोभीगे मन इस बार 
शरण तुम्हारी पा सकूँभव-सागर हो पार 


प्रेमसमर्पणशक्तिधनराधा के अधिकार 
दौड़े दौड़े  गएकान्हा जिनके द्वार 


पृथ्वीजल-वायूगगनअग्नि तत्व शरीर 

सुख-दुःखमायामोहजगहर बंधन में पीर 


बने द्वारिकाधीश जोरहे जगत को पाल
सखा-सखी मन जा बसेखुद हर-हर गोपाल 

सोमवार, 15 अगस्त 2022

हिन्दुस्तान ...

भारत की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की सबको बहुत बहुत बधाई ...


प्रेम की ख़ुशबू यहाँ, बलिदान का लोबान है

इस भरत भू की तो कान्हा राम से पहचान है
इक तरफ़ उत्तर दिशा में ध्यान मय हिमवान है
और दक्षिण छोर पे सागर बड़ा बलवान है
योग-माया, शिव सनातन, निज में अंतर-ध्यान है
संस्कृती जिसकी सनातन जोगिया परिधान है
रीत, व्यंजन, धर्म, भाषा, और पहनावा जुदा
पर धड़कता है जो दिल में वो तो हिंदुस्तान है
भूमि है अन्वेषकों कि यह पुरातन काल से
वेद गीता उपनिषद में ज्ञान है विज्ञान है
खोज ही जब लक्ष्य हो तब निज की हो या हो जगत
हम कहाँ से, क्यों है जीवन, एक अनुसंधान है
देश की अवधारणा आकार देती है हमें
कर सकूँ जीवन समर्पित मन में यह अरमान है


शनिवार, 6 अगस्त 2022

फ़लसफा - लम्बी उम्र का ...

माँगता है इन्सान दुआ लम्बी उम्र की 
पर नहीं समझ पाता कौन सी उम्र  
 
ढल जाता है बचपन नासमझी में
बीत जाती है जवानी तय शुदा साँसों में
 
हाँ ... मिलती है लम्बी उम्र    
जो आती है सिर्फ बुढापे के हिस्से
उम्र के एक ऐसे पक्ष में जहाँ दर्द के सिवा कुछ नहीं होता
डर रोज़ का हिस्सा होता है
अकेलेपन का एहसास गहरे अँधेरे सा फैलता है जहाँ
 
काश की लम्बी उम्र से ज्यादा अच्छी उम्र की दुआ होती
न होता तो बचपन लम्बा हो जाता या जवानी की राह ख़त्म न होती
 
काश की लम्बी उम्र की दुआओं के बाद
आमीन बोलने से पहले कोई तो समझाता ... लम्हों का घटा जोड़
किसको पता होता है लम्बी उम्र की दुआ आती है बुढापे के हिस्से

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

कुछ एहसास ...

कुनमुनी धूप का एहसास
जब अनायास ही बदलने लगे मौसम
समझ लेना दूर कहीं यादों में
स्पर्श किया है मैंने तुम्हारा


माथे पे गिरी एक आवारा बूँद
जगाने लगे एक अनजानी प्यास
समझ लेना तन्हाई के किसी लम्हे ने
अंगड़ाई ली है कहीं


हर मौसम में खिलता जंगली गुलाब
तेरे होंटों की मुस्कुराहट लिए
महक रहा है पुरानी पगडण्डी पर
चल आज वहीं टहल आएँ …
जोड़ लें कुछ ताज़ा लम्हे, यादों की बुगनी में …

#जंगली_गुलाब

सोमवार, 18 जुलाई 2022

इंतज़ार - एक प्रेम का ...

मालुम है ले गया था तुम्हारे होठों की खिलखिलाती हँसी
वो खनकते कंगन, नीले आसमानी रँगों वाली काँच की चूड़ियाँ
वो टूटी पाजेब ... धागे के सहारे जिसे पांवों में अटका रखा था तुमने
 
हर वो शै जिसमें तुम्हारे होने का एहसास हो सकता था
मेरे ट्रंक में सहेज दी थी तुमने
अगर सही सही कहूँ ... तो ले आया था मैं उसे ... 
 
मैं जानता था जुदाई का वो पल इक उम्र से लम्बा होने वाला है
 
पर सच कहूँ तो उस दौर में एक पल भी तुमसे जुदा नही था
हालांकि छोड़ आया था तुम्हे तन्हा सबके बीच यादों के सहारे
 
अब जबकि लौट रहा हूँ तुम्हारे करीब,   
चाहता हूं तमान खुशियाँ समेत दूँ तुम्हारे दामन में ...
 
भर ली है लाल डिबिया में सुबह की लाली, माँग सजाने के लिए
कैद कर ली ही बारिशों की बूँदों में नहाते परिंदों की खनकती हँसी
माँग लिया है शाम का गहरा नीला आँचल,
रात की काली चादर पे चमकते तारे और इन्द्र-धनुष के सुनहरी रँग
ध्यान से देखना पूरब की और खुलने वाली खिड़की की जानिब
घिरने लगी होंगी कुछ आँधियाँ वहाँ ...
की भेजा है हवा के हाथ इक संदेसा तुम्हारे नाम
 
हाँ वो ढेर सारा प्यार भी इकठ्ठा है जो जोड़ रहा हूँ तबसे
जब जुदा हुए थे ज़िन्दगी के फ़र्ज़ पूरा करने को
 
मैं आउँगा छत के उसी सुनसान कोने में
खड़ी होगी जहाँ तुम होठ चबाती मेरे इंतज़ार में ...

#जंगली_गुलाब