मंगलवार, 15 जनवरी 2019

सिरा सुख दुःख का ...


दुःख नहीं होगा तो क्या जी सकेंगे ...

खिलती हुई धूप के दुबारा आने की उमंग
स्याह रात को दिन के लील लेने के बाद जागती है

सर्दी के इंतज़ार में देवदार के ठूंठ न सूखें
तो बर्फ की सफ़ेद चादर तले प्रेम के अंकुर नहीं फूटते

काले बादल के ढेर कड़कते हुए न गरजें
तो बेमानी सावन बरसते हुए भी भिगो नहीं पाता

मिलन के ठीक एक लम्हा पहले बिछड़ने की याद
बे-मौसम खिला देती हैं फूल
पंछी भी गाने लगते हैं गीत

सच बताना क्या सुख का एहसास दुःख से नहीं ...
सुख का एक सिरा दुःख का दूसरा सिरा नहीं ...?

सोमवार, 7 जनवरी 2019

लम्हे इश्क के ...


एक दो तीन ... कितनी बार 
फूंक मार कर मुट्ठी से बाल उड़ाने की नाकाम कोशिश
आस पास हँसते मासूम चेहरे
सकपका जाता हूँ
चोरी पकड़ी गयी हो जैसे  
जान गए तुम्हारा नाम सब अनजाने ही

कितना मुश्किल हैं न खुद से नज़रें चुराना
इश्क से नज़रें चुराना

इंसान जब इश्क हो जाता है
उतरना चाहता है किसी दिल में
और अगर वो दिल उसके महबूब का हो
मिल जाता है उसे मुकाम

तेरी नर्म हथेली में हथेली डाले
गुज़ार सकता हूँ तमाम उम्र फुदकती गिलहरी जैसे

तेरे साथ गुज़ारा दुःख भी इश्वर है
पाक पवित्र तेरे आँचल जैसा
तभी तो उसकी यादों में जीने का दिल करता है 
प्रेम भी कितनी कुत्ती शै है

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

नव वर्ष ...

ब्लॉग जगत के सभी साथियों को नव वर्ष की मंगल कामनाएं ... सन २०१९ नई उम्मीद, और सार्थक सोच ले के आए, भारत देश में सुख शान्ति का प्रवाह निरंतर बना रहे ... आज के दिन एक प्रश्न स्वयं से ...

क्या नया नव वर्ष में हमको मिला
हूबहू कल सा ही दिन था जो खिला

भोर बोझिल बदहवास सी मिली
धूप जैसी कल थी वैसी ही मिली
रात का आँचल भी तक़रीबन वही
पर नयी तारीख़ सबको थी मिली
सोचता हूँ क्यों रखूँ कोई गिला ... ?
क्या नया नव वर्ष में हमको मिला

इस तरफ़ तारीख़ बदली उस तरफ़
ज़िंदगी का एक दिन कम हो गया
कौन सी ख़ुशियाँ समय ने बाँट दीं
शोर जो इतना सुबह से हो गया
क्या नया सूरज कहीं फिर से जला ... ?
क्या नया नव वर्ष है हमको मिला

भूख कल सी, प्यास भी घटती नहीं
कश्म-कश जद्दो-जहद रुकती नहीं
तन पे कपड़ा क्या सभी को मिल गया
पेट की ये आग क्यों बुझती नहीं
रोटियों का ढेर क्या सबको मिला ... ? 
क्या नया नव वर्ष में हमको मिला

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे


प्रेम के सब गीत अब लगते हैं बासे
दूर जब से हो गया हूँ प्रियतमा से

मुड़ के देखा तो है मुमकिन रोक ना लें 
नम सी आँखें और कुछ चेहरे उदासे

नाम क्या दोगे हमारी प्यास का तुम
पी लिया सागर रहे प्यासे के प्यासे

आ रहे हैं खोल के रखना हथेली
टूटते तारे भी दे देते हैं झांसे

उम्र भर थामे रहे सच का ही दामन   
और पीछे रह गए हम अच्छे ख़ासे

फूट जाएगा तो सागर लील लेगा 
दिल का मैं साझा करू अब दर्द कासे 

हर गली मिल जाएँगे कितने ही शकुनी 
सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे 

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ...


खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से ...


कहाँ से आई कहाँ चूम के गई झट से 
शरारती सी थी तितली निकल गई ख़ट से

हसीन शोख़ निगाहों में कुछ इशारा था 
न जाने कौन से पल आँख दब गई पट से

ज़मीं पे आग के झरने दिखाई देते हैं  
गिरी है बूँद सुलगती हुयी तेरी लट से

डरा हुआ सा शहर है, डरे हुए पंछी 
डरा हुआ सा में खुद भी हूँ अपनी आहट से

लगे थे सब तो छुडाने में हाथ पर बिटिया
ज़रूरतों में बुढापे की ले गई हट से

नहीं थे सेर, सवा सेर से, मिले अब तक
उड़े जो हाथ के तोते समझ गए चट से

न जाने कौन थी, रिश्ता था क्या मेरा, फिर भी 
थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ ...


क्यों जुड़े थे तार अपने दरम्याँ
था नहीं जब प्यार अपने दरम्याँ

रात बोझिल, सलवटें, खामोश दिन
बोझ सा इतवार अपने दरम्याँ

प्रेम, नफरत, लम्स, कुछ तो नाम दो
क्या है ये हरबार अपने दरम्याँ

मैं खिलाड़ी, तुम भी शातिर कम नहीं
जीत किसकी हार अपने दरम्याँ

छत है साझा फांसला मीलों का क्यों
क्या है कारोबार अपने दरम्याँ

सिलसिला रीति, रिवाजो-रस्म का 
क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ

मंगलवार, 27 नवंबर 2018

सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने ...


सजाई महफिलें जो प्रेम की खामोश पायल ने
मधुर वंशी बजा दी नेह की फिर श्याम श्यामल ने

शिकायत क्या करूँ इस खेल में मैं भी तो शामिल हूँ
मेरी नींदों को छीना है किसी मासूम काजल ने

वो मिलते ही हकीकत हर किसी की जान लेता है
मचा रक्खी है कैसी खलबली उस एक पागल ने

मुकम्मल जानने को क्यों तुम्हें हर बात हो मालुम 
पके हैं या के हैं कच्चे बता दी एक चावल ने

फलक तो मिल गया लेकिन कसक सी रह गयी दिल में
न जाने क्यों मेरा रस्ता नहीं रोका है बादल ने

सितम, दुःख दर्द, मुश्किल राह में जितनी चली आएं 
बलाओं से बचा रक्खा है मुझको माँ के आँचल ने

सोमवार, 19 नवंबर 2018

पागल दिल रुक जाओ, धक धक बंद करो ...

धूप न आए जेब में तब तक बंद करो
शाम को रोको दिन का फाटक बंद करो

बरसेंगे काले बादल जो ठहर गए
हवा से कह दो अपने नाटक बंद करो

प्रेम नहीं जो है मुझसे इस जीवन में
दिल के दरवाज़े पे दस्तक बंद करो  

जाना सच में अच्छी लगती हो सब से
दर्पण भी कहता है, अब शक बंद करो

गठ-बंधन के अभी इशारे आते हैं
जाना दिल पे अपना तो हक़ बंद करो

रोज़ चुनावों का ही मौसम रहता है
हे नेताओं अब तो बक बक बंद करो

बिन देखे तुम को वो ही यूँ चली गई 
पागल दिल रुक जाओ, धक धक बंद करो

सोमवार, 12 नवंबर 2018

एक प्रतिमा विशाल भी होगी ...


खेत होंगे कुदाल भी होगी
लहलहाती सी डाल भी होगी

धूप के इस तरह मुकरने में
कुछ तो बादल की चाल भी होगी

गौर से इसकी थाप को सुनना
बूँद के साथ ताल भी होगी

जोर से बोल दें अगर पापा
पूछने की मजाल भी होगी

सब्जी, रोटी के साथ है मीठा 
आज डब्बे में दाल भी होगी

उनकी यादों के अध-जले टुकड़े
आसमानी सी शाल भी होगी

यूँ उजाला नज़र नहीं आता
चुप सी जलती मशाल भी होगी

प्रेम जीता हो दिल में तो अकसर
एक प्रतिमा विशाल भी होगी