मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

खो कर ही इस जीवन में कुछ पाना है ...


मूल मन्त्र इस श्रृष्टि का ये जाना है
खो कर ही इस जीवन में कुछ पाना है

नव कोंपल उस पल पेड़ों पर आते हैं
पात पुरातन जड़ से जब झड़ जाते हैं    
जैविक घटकों में हैं ऐसे जीवाणू 
मिट कर खुद जो दो बन कर मुस्काते हैं
दंश नहीं मानो, खोना अवसर समझो
यही शाश्वत सत्य चिरंतन माना है
खो कर ही इस जीवन में ...

बचपन जाता है यौवन के उद्गम पर   
पुष्प नष्ट होता है फल के आगम पर  
छूटेंगे रिश्ते, नाते, संघी, साथी
तभी मिलेगा उच्च शिखर अपने दम पर
कुदरत भी बोले-बिन, बोले गहरा सच 
तम का मिट जाना ही सूरज आना है
खो कर ही इस जीवन में ...

कुछ रिश्ते टूटेंगे नए बनेंगे जब  
समय मात्र होगा बन्धन छूटेंगे जब  
खोना-पाना, मोह प्रेम दुःख का दर्पण    
सत्य सामने आएगा सोचेंगे जब 
दुनिया रैन-बसेरा, माया, लीला है
आना जिस पल जग में निश्चित जाना है 
खो कर ही इस जीवन में ...

सोमवार, 30 सितंबर 2019

घर मेरा टूटा हुआ सन्दूक है ...


घर मेरा टूटा हुआ सन्दूक है

हर पुरानी चीज़ से अनुबन्ध है      
पर घड़ी से ख़ास ही सम्बन्ध है
रूई के तकिये, रज़ाई, चादरें    
खेस है जिसमें के माँ की गन्ध है
ताम्बे के बर्तन, कलेंडर, फोटुएँ
जंग लगी छर्रों की इक बन्दूक है
घर मेरा टूटा ...

"शैल्फ" पे  चुप सी कतारों में खड़ी   
अध्-पड़ी कुछ "बुक्स" कोनों से मुड़ी
पत्रिकाएँ और कुछ अख़बार भी
इन दराजों में करीने से जुड़ी  
मेज़ पर है पैन, पुरानी डायरी
गीत उलझे, नज़्म, टूटी हूक है
घर मेरा टूटा ....

ढेर है कपड़ों का मैला इस तरफ
चाय के झूठे हैं "मग" कुछ उस तरफ
फर्श पर है धूल, क्लीनिंग माँगती 
चप्पलों का ढेर रक्खूँ किस तरफ
जो भी है, कडुवा है, मीठा, क्या पता
ज़िन्दगी का सच यही दो-टूक है
घर मेरा टूटा ...

जो भी है जैसा भी है मेरा तो है
घर मेरा तो अब मेरी माशूक है 
घर मेरा टूटा ...

बुधवार, 25 सितंबर 2019

माँ ...


पलट के आज फिर आ गई २५ सितम्बर ... वैस तो तू आस-पास ही होती है पर फिर भी आज के दिन तू विशेष आती है ... माँ जो है मेरी ... पिछले सात सालों में, मैं जरूर कुछ बूढा हुआ पर तू वैसे ही है जैसी छोड़ के गई थी ... कुछ लिखना तो बस बहाना है मिल बैठ के तेरी बातें करने का ... तेरी बातों को याद करने का ...

सारी सारी रात नहीं फिर सोई है
पीट के मुझको खुद भी अम्मा रोई है

गुस्से में भी मुझसे प्यार झलकता था
तेरे जैसी दुनिया में ना कोई है

सपने पूरे कैसे हों ये सिखा दिया
अब किन सपनों में अम्मा तू खोई है

हर मुश्किल लम्हे को हँस के जी लेना
गज़ब सी बूटी मन में तूने बोई है

शक्लो-सूरत, हाड़-मास, तन, हर शक्ति   
धडकन तुझसे, तूने साँस पिरोई है

बचपन से अब तक वो स्वाद नहीं जाता 
चलती फिरती अम्मा एक रसोई है

सोमवार, 16 सितंबर 2019

पीपल ...


माँ का आँचल शीतल पीपल देख रहा
मौन तपस्वी अविचल पीपल देख रहा

शरद, शिशिर हेमंत
गीष्म बैसाखी वर्षा
ऋतु परिवर्तन प्रतिपल पीपल देख रहा

कोयल की कू कू
कागा की कोलाहल
उत्पाती पक्षी दल पीपल देख रहा

शैशव की किलकारी
यौवन की आशा
वृद्ध निराशा पल पल पीपल देख रहा  

पञ्च-तत्व अग्नि तर्पण
जीवन अर्पण   
मुक्त आत्मा निश्छल पीपल देख रहा

सोमवार, 9 सितंबर 2019

एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...


मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ

काटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता 
और माथे के तिलक तो साथ रखता  
नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेता
है मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा है
दौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है  
यूँ नहीं तो शह्र सारा जल रहा है
चौंक पे हर बार झगड़े बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

एक ही गोदाम में है माल सारा  
गाड़ियाँ, पत्थर, के झन्डा हो के नारा
हर गली, नुक्कड़ पे सप्लाई मिलेगी    
टोपियों के साथ चमचे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ  
जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ 
एक सौदागर हूँ ...

सोमवार, 2 सितंबर 2019

पल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगी ...


धूल कभी जो आँधी बन के आएगी
पल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगी

अक्षत मन तो स्वप्न नए सन्जोयेगा
बीज नई आशा के मन में बोयेगा
खींच लिए जायेंगे जब अवसर साधन
सपनों की मृत्यु उस पल हो जायेगी
पल दो पल फिर ...

बादल बूँदा बाँदी कर उड़ जाएँगे
चिप चिप कपडे जिस्मों से जुड़ जाएँगे
चाट के ठेले जब सीले पड़ जाएँगे
कमसिन सड़कों पर कैसे फिर खाएगी
पल दो पल फिर ...

कितने कीट पतंगे घर में आएँगे
मखमल के कीड़े दर्शन दे जाते जाएँगे
मेंढक की टर-टर झींगुर की रुन-झुन भी   
आँगन में फिर गीत ख़ुशी के गाएगी 
पल दो पल फिर ...

सोमवार, 26 अगस्त 2019

क्या मिला सचमुच शिखर ...


क्या मिला सचमुच शिखर ?

मिल गए ऐश्वर्य कितने अनगिनत
पञ्च-तारा जिंदगी में हो गया विस्मृत विगत
घर गली फिर गाँव फिर छूटा नगर
क्या मिला सचमुच ...

कर्म पथ पर आ नहीं पाई विफलता
मान आदर पदक लाई सब सफलता
मित्र बिछड़े चल न पाए साथ अपने इस डगर
क्या मिला सचमुच ...

एकला चलता रहा शुभ लक्ष्य पाया
चक्र किन्तु नियति ने ऐसा घुमाया
ले गई किस छोर पे जाने उठाकर ये लहर
क्या मिला सचमुच ...

उम्र के इस मोड़ पर ना साथ कोई
सोचता हूँ फसल ये कैसी है बोई
खो गया वो रास्ता, जाता था जो मेरे शहर 
क्या मिला सचमुच ...

सोमवार, 19 अगस्त 2019

जाने क्यों आँखें रहती नम नम ...


गीत प्रेम के गाता है हर दम
जाने क्यों आँखें रहती नम नम

नाच मयूरी हो पागल
अम्बर पे छाए बादल
बरसो मेघा रे पल पल
बारिश की बूँदें करतीं छम छम
जाने क्यों आँखें ...

सबके अपने अपने गम
कुछ के ज्यादा कुछ के कम
सह लेता है जिसमें दम
सुन आँसूं पलकों के पीछे थम 
जाने क्यों आँखें ... 

हिस्से में उतना सुख दुःख
जीवन का जैसा है रुख
फिर भी सब कहते हैं सुख 
उनके हिस्से है आया कम कम
जाने क्यों आँखें ...

सोमवार, 12 अगस्त 2019

रोज़ प्रातः बोलते हैं विश्व का कल्याण हो ...

हम कहाँ कहते हैं केवल स्वयं का ही त्राण हो
रोज़ प्रातः बोलते हैं विश्व का कल्याण हो

है सनातन धर्म जिसकी भावना मरती नहीं
निज की सोचें ये हमारी संस्कृति कहती नहीं
हो गुरु बाणी के या फिर बुद्ध का निर्वाण हो  

राम को ही है चुनौती राम के ही देश में
शत्रु क्या घर में छुपा है मित्रता के वेश में?
राम मंदिर का पुनः उस भूमि पर निर्माण हो

मान खुद का ना रखा तो कौन पूछेगा हमें
हम नहीं जागे तो फिर इतिहास खोजेग हमें
दृष्टि चक्षू पर धनुरधर लक्ष्य पर ही बाण हो

कामना इतनी है बस मुझको प्रभू वरदान दे
सत्य पथ का मैं पथिक बन के चलूँ यह ज्ञान दे  
देश हित कुछ कर सकूँ काया तभी निष्प्राण हो 

सोमवार, 5 अगस्त 2019

घास उगी सूखे आँगन ...


धड़ धड़ धड़ बरसा सावन
भीगे, फिसले कितने तन

घास उगी सूखे आँगन
प्यास बुझी ओ बंजर धरती तृप्त हुई
नीरस जीवन से तुलसी भी मुक्त हुई,
झींगुर की गूँजे गुंजन
घास उगी ...

घास उगी वन औ उपवन
गीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हुई
हरा बिछौना कोमल तन की सेज हुई
दृश्य है कितना मन-भावन
घास उगी ...

हरियाया है जीवन-धन
कुछ काँटे भी कुछ फूलों के साथ उगे
आते जाते इसके उसके पाँव चुभे
सिहर गया डर से तन मन   
घास उगी ...