सोमवार, 17 जून 2019

आसमानी पंछियों को भूल जा ...


धूप की बैसाखियों को भूल जा  
दिल में हिम्मत रख दियों को भूल जा

व्यर्थ की नौटंकियों को भूल जा
मीडिया की सुर्ख़ियों को भूल जा

उस तरफ जाती हैं तो आती नहीं
इस नदी की कश्तियों को भूल जा

टिमटिमा कर फिर नज़र आते नहीं
रास्ते के जुगनुओं को भूल जा

हो गईं तो हो गईं ले ले सबक
जिंदगी की गलतियों को भूल जा

याद रख्खोगे तो मांगोगे सबब
कर के सारी नेकियों को भूल जा

रंग फूलों के चुरा लेती हैं ये
इस चमन की तितलियों को भूल जा

टूट कर आवाज़ करती हैं बहुत
तू खिजाँ की पत्तियों को भूल जा

इस शहर से उस शहर कितने शहर 
आसमानी पंछियों को भूल जा 

बुधवार, 12 जून 2019

मुहब्बत की है बस इतनी कहानी ...

अपने शहर की खुशबू भी कम नहीं होती ... अभी लौटा हूँ अपने कर्म क्षेत्र ... एक गज़ल आपके नाम ...

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी
कहीं खिलती तो होगी रात रानी

वजह क्या है तेरी खुशबू की जाना 
कोई परफ्यूम या चिट्ठी पुरानी

मिटा सकते नहीं पन्नों से लेकिन  
दिलों से कुछ खरोंचे हैं मिटानी

लड़ाई, दोस्ती फिर प्रेम पल पल
हमारी रोज़ की है जिंदगानी

अभी से सो रही हो थक गईं क्या
अभी तो ढेर बातें हैं बतानी

यहाँ राधा है मीरा कृष्ण भी है
यहाँ की शाम है कितनी सुहानी

हंसी के बीच दांतों का नज़ारा
मुहब्बत की है बस इतनी कहानी

मंगलवार, 14 मई 2019

पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है ...

जितनी बार भी देश आता हूँ, पुराने घर की गलियों से गुज़रता हूँ, अजीब सा एहसास होता है जो व्यक्त नहीं हो पाता, हाँ कई बार कागज़ पे जरूर उतर आता है ... अब ऐसा भी नहीं है की यहाँ होता हूँ तो वहां की याद नहीं आती ... अभी भारत में हूँ तो ... अब झेलिये इसको भी ...
   
कुल्लेदार पठानी पगड़ी, एक पजामा रक्खा है
छड़ी टीक की, गांधी चश्मा, कोट पुराना रक्खा है

कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है

टूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है

जाने किस पल छूट गई थी या मैंने ही छोड़ी थी
बुग्नी जिसमें पाई, पाई, आना, आना रक्खा है

मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है

नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे 
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है 

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

ख़त हवा में अध्-जले जलते रहे ...


मील के पत्थर थे ये जलते रहे
कुछ मुसफ़िर यूँ खड़े जलते रहे

पास आ, खुद को निहारा, हो गया
फुरसतों में आईने जलते रहे

कश लिया, एड़ी से रगड़ा ... पर नहीं
“बट” तुम्हारी याद के जलते रहे

मग तेरा, कौफी तेरी, यादें तेरी
होठ थे जलते रहे, जलते रहे

रोज़ के झगड़े, उधर तुम, मैं इधर 
मौन से कुछ रास्ते जलते रहे

प्रेम टपका, तब हुए ना, टस-से-मस 
नफरतों की धूप मे जलते रहे

गल गया जीवन, बिमारी लग गई
शामियाने शान से जलते रहे

लफ्ज़ ले कर उड़ गईं कुछ तितलियाँ
ख़त हवा में अध्-जले जलते रहे

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से ...


कभी वो भूल से आए कभी बहाने से  
मुझे तो फर्क पड़ा बस किसी के आने से

नहीं ये काम करेगा कभी उठाने से
ये सो रहा है अभी तक किसी बहाने से

लिखे थे पर न तुझे भेज ही सका अब-तक
मेरी दराज़ में कुछ ख़त पड़े पुराने से

कभी न प्रेम के बंधन को आज़माना यूँ
के टूट जाते हैं रिश्ते यूँ आज़माने से

तुझे छुआ तो हवा झूम झूम कर महकी   
पलाश खिलने लगे डाल के मुहाने से

निगाह भर के मुझे देख क्या लिया उस दिन  
यहाँ के लोग परेशाँ हैं इस फ़साने से

मुझे वो देख भी लेता तो कुछ नहीं कहता
मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से
(तरही गज़ल) 

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

चाँद उतरता है होले से ज़ीने पर ...


हुस्नो-इश्क़, जुदाई, दारू पीने पर
मन करता है लिक्खूं नज़्म पसीने पर 

खिड़की से बाहर देखो ... अब देख भी लो  
क्यों पंगा लेती हो मेरे जीने पर 

सोहबत में बदनाम हुए तो ... क्या है तो 
यादों में रहते हैं यार कमीने पर    

लक्कड़ के लट्टू थे, कन्चे कांच के थे
दाम नहीं कुछ भी अनमोल नगीने पर

राशन, बिजली, पानी, ख्वाहिश, इच्छाएं
चुक जाता है सब कुछ यार महीने पर 

खुशबू, बातें, इश्क़ ... ये कब तक रोकोगे  
लोहे की दीवारें, चिलमन झीने पर

छूने से नज़रों के लहू टपकता है
इश्क़ लिखा है क्या सिन्दूर के सीने पर

और वजह क्या होगी ... तुझसे मिलना है
चाँद उतरता है होले से ज़ीने पर

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता हूँ ...


हज़ार काम उफ़ ये सोच के थक लेता हूँ
में बिन पिए जनाब रोज़ बहक लेता हूँ  

ये फूल पत्ते बादलों में तेरी सूरत है
वहम न हो मेरा में पलकें झपक लेता हूँ

कभी न पास टिक सकेगी उदासी मेरे
तुझे नज़र से छू के रोज़ महक लेता हूँ

हरी हरी वसुंधरा पे सृजन हो पाए 
में बन के बूँद बादलों से टपक लेता हूँ

तमाम रात तुझे देखना है खिड़की से
में चाँद बन के टहनियों में अटक लेता हूँ

मुझे सिफ़त अता करी है मेरे मौला ने
सुबह से शाम पंछियों सा चहक लेता हूँ

यही असूल मुद्दतों से मेरा है काइम
ख़ुशी के साथ साथ ग़म भी लपक लेता हूँ

तमाम अड़चनों से मिट न सकेगी हस्ती
में ठोकरों से ज़िन्दगी का सबक लेता हूँ

सितम हज़ार सह लिए हैं सभी हँस हँस के
किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता हूँ

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

शर्ट के टूटे बटन में रह गए ...


प्रेम के कुछ दाग तन में रह गए
इसलिए हम अंजुमन में रह गए

सब तो डूबे चुस्कियों में और हम
नर्म सी तेरी छुवन में रह गए

चल दिए कुछ लोग रिश्ता तोड़ कर
कुछ निभाने की जतन में रह गए

छा गए किरदार कुछ आकाश पर
कुछ सिमट के पैरहन में रह गए

टूट कर सपने नहीं आए कभी 
कुछ गुबारे भी गगन में रह गए

अहमियत रिश्तों की कुछ समझी नहीं
अपने अपने ही बदन में रह गए

उड़ गई आंधी घरोंदे तोड़ कर 
सिरफिरे फिर भी चमन में रह गए

रेशमी धागे, मधुर एहसास, पल
शर्ट के टूटे बटन में रह गए

खिडकियों से आ गई ताज़ा हवा
हम मगर फिर भी घुटन में रह गए

सोमवार, 25 मार्च 2019

अरे “शिट” आखरी सिगरेट भी पी ली ...


सुनों छोड़ो चलो अब उठ भी जाएँ
कहीं बारिश से पहले घूम आएँ

यकीनन आज फिर इतवार होगा
उनीन्दा दिन है, बोझिल सी हवाएँ

हवेली तो नहीं पर पेड़ होंगे
चलो जामुन वहाँ से तोड़ लाएँ

नज़र भर हर नज़र देखेगी तुमको
कहीं काला सा इक टीका लगाएँ

पतंगें तो उड़ा आया है बचपन
चलो पिंजरे से अब पंछी उड़ाएँ

कहरवा दादरा की ताल बारिश
चलो इस ताल से हम सुर मिलाएँ

अरे “शिट” आखरी सिगरेट भी पी ली
ये बोझिल रात अब कैसे बिताएँ

सोमवार, 18 मार्च 2019

मेरे पहलू में इठलाए, तो क्या वो इश्क़ होगा ...


तेरी हर शै मुझे भाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 
मुझे तू देख शरमाए, तो क्या वो इश्क़ होगा  

हवा में गूंजती है जो हमेशा इश्क़ बन कर  
वो सरगम सुन नहीं पाए तो क्या वो इश्क़ होगा 

पिए ना जो कभी झूठा, मगर मिलने पे अकसर 
गटक जाए मेरी चाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

सभी से हँस के बोले, पीठ पीछे मुंह चिढ़ाए
मेरे नज़दीक इतराए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

हज़ारों बार हाए, बाय, उनको बोलने पर    
पलट के बोल दे हाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

सभी रिश्ते, बहू, बेटी, बहन, माँ, के निभा कर 
मेरे पहलू में इठलाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

तुझे सोचा नहीं होता अभी पर यूँ अचानक 
नज़र आएं तेरे साए तो क्या वो इश्क़ होगा 

हवा मगरिब, मैं मशरिक, उड़ के चुन्नी आसमानी 
मेरी जानिब चली आए तो क्या वो इश्क़ होगा 

उसे छू कर, मुझे छू कर, कभी जो शोख तितली  
उड़ी जाए, उड़ी जाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

तेरी पाज़ेब, बिन्दी, चूड़ियाँ, गजरा, अंगूठी 
जिसे देखूं वही गाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

मुझे तू एक टक देखे, कहीं खो जाए, पर फिर 
अचानक से जो मुस्काए, तो क्या वो इश्क़ होगा