सोमवार, 18 मार्च 2019

मेरे पहलू में इठलाए, तो क्या वो इश्क़ होगा ...


तेरी हर शै मुझे भाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 
मुझे तू देख शरमाए, तो क्या वो इश्क़ होगा  

हवा में गूंजती है जो हमेशा इश्क़ बन कर  
वो सरगम सुन नहीं पाए तो क्या वो इश्क़ होगा 

पिए ना जो कभी झूठा, मगर मिलने पे अकसर 
गटक जाए मेरी चाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

सभी से हँस के बोले, पीठ पीछे मुंह चिढ़ाए
मेरे नज़दीक इतराए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

हज़ारों बार हाए, बाय, उनको बोलने पर    
पलट के बोल दे हाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

सभी रिश्ते, बहू, बेटी, बहन, माँ, के निभा कर 
मेरे पहलू में इठलाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

तुझे सोचा नहीं होता अभी पर यूँ अचानक 
नज़र आएं तेरे साए तो क्या वो इश्क़ होगा 

हवा मगरिब, मैं मशरिक, उड़ के चुन्नी आसमानी 
मेरी जानिब चली आए तो क्या वो इश्क़ होगा 

उसे छू कर, मुझे छू कर, कभी जो शोख तितली  
उड़ी जाए, उड़ी जाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

तेरी पाज़ेब, बिन्दी, चूड़ियाँ, गजरा, अंगूठी 
जिसे देखूं वही गाए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

मुझे तू एक टक देखे, कहीं खो जाए, पर फिर 
अचानक से जो मुस्काए, तो क्या वो इश्क़ होगा 

सोमवार, 11 मार्च 2019

दुबारा क्या तिबारा ढूंढ लेंगे ...


सहारा बे-सहारा ढूंढ लेंगे
मुकद्दर का सितारा ढूंढ लेंगे

जो माँ की उँगलियों में था यकीनन
वो जादू का पिटारा ढूंढ लेंगे

गए जिस जिस जगह जा कर वहीं हम
हरा बुन्दा तुम्हारा ढूंढ लेंगे

मेरे कश्मीर की वादी है जन्नत
वहीं कोई शिकारा ढूंढ लेंगे

अभी इस जीन से कर लो गुज़ारा
अमीरी में शरारा ढूंढ लेंगे

बनाना है अगर उल्लू उन्हें तो
कहीं मुझ सा बेचारा ढूंढ लेंगे

नए हैं पंख सपने भी नये हैं       
गगन पे हम गुबारा ढूंढ लेंगे

सितारे रात भर टूटे जहाँ ... चल  
वहीं अपने दुबारा ढूंढ लेंगे

नहीं जो लक्ष्य हम, कोई तो होगा
किधर है ये इशारा ढूंढ लेंगे

पिघलती धूप के मंज़र पे मिलना
नया दिलकश नज़ारा ढूंढ लेंगे

जो मिल के खो गईं खुशियाँ कभी तो
दुबारा क्या तिबारा ढूंढ लेंगे

बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

सबको बच कर रहना है जय चन्दों से ...


बस इतना कहना है देश के बन्दों से
सबको बच कर रहना है जय चन्दों से

राजनीति जो करते हैं बलिदानों पर
ढूंढ के उनको घर के बाहर कर देना
गद्दारों का साथ सदा जो देते हैं 
कान खोल कर मेरी बातें सुन लेना 
और नहीं कुछ और नहीं अब सहना है
सबको बच कर रहना है ...  

सीमाओं पे देश की सैनिक डटे हुए
कफ़न बाँध कर मुस्तैदी से खड़े हुए  
घर के भीतर सजग रहे हम सब इतना
थर थर कांपे शत्रु सारे डरे हुए
नहीं जरूरी संग धार के बहना है
सबको बच कर रहना है ...
 
प्रेम, अहिंसा, ज्ञान हमारी पूँजी है
जो भी हमसे मांगोगे हम दे देंगे
मगर तोड़ने वालों इतना सुन लेना
अपने माथे का चंदन हम ले लेंगे
काश्मीर तो देश का सुन्दर गहना है
सबको बच कर रहना है ...

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई ...

इस नज़र से उस नज़र की बात लम्बी हो गई
मेज़ पे रक्खी हुई ये चाय ठंडी हो गई

आसमानी शाल ने जब उड़ के सूरज को ढका
गर्मियों की दो-पहर भी कुछ उनींदी हो गई

कुछ अधूरे लफ्ज़ टूटे और भटके राह में     
अधलिखे ख़त की कहानी और गहरी हो गई

रात के तूफ़ान से हम डर गए थे इस कदर
दिन सलीके से उगा दिल को तसल्ली हो गई

माह दो हफ्ते निरंतर, हाज़री देता रहा
पन्द्रहवें दिन आसमाँ से यूँ ही कुट्टी हो गई

कुछ दिनों का बोल कर अरसा हुआ लौटीं न तुम 
इश्क की मंडी में जानाँ तबसे मंदी हो गई

बादलों की बर्फबारी ने पहाड़ों पर लिखा   
रात जब सो कर उठी शहरों में सर्दी हो गई

कान दरवाज़े की कुंडी में ही अटके रह गए
झपकियों ही झपकियों में रात कब की हो गई

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

हया किसी के निगाहों का कह रही सच है ...


यही ज़मीन, यही आसमां, यही सच है 
यहीं है स्वर्ग, यहीं नर्क, ज़िन्दगी सच है

हसीन शाम के बादल का सुरमई मंज़र 
हथेलियों पे सजी रात की कली सच है

उदास रात की स्याही से मत लिखो नगमें  
प्रभात की जो मधुर रागिनी वही सच है  

ये तू है, मैं हूँ, नदी, पत्तियों का यूँ हिलना
ये कायनात, परिंदे, हवा सभी सच है

अभी जो पास है वो एक पल ही है जीवन
किसी के इश्क में डूबी हुई ख़ुशी सच है

कभी है गम तो ख़ुशी, धूप, छाँव, के किस्से
झुकी झुकी सी नज़र सादगी हंसी सच है

नज़र नज़र से मिली एक हो गयीं नज़रें
हया किसी के निगाहों का कह रही सच है

सोमवार, 28 जनवरी 2019

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया ...

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया
शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

लौट के आया तो टूटी चूड़ियों को रख दिया
वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया

आंसुओं से तर-बतर तकिये रहे चुप देर तक  
सलवटों ने चीखती खामोशियों को रख दिया

छोड़ना था गाँव जब रोज़ी कमाने के लिए
माँ ने बचपन में सुनाई लोरियों को रख दिया 

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 
रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख दिया

इश्क़ के पैगाम के बदले तो कुछ भेजा नहीं
पर मेरी खिड़की पे उसने तितलियों को रख दिया

नाम जब आया मेरा तो फेर लीं नज़रें मगर
भीगती गजलों में मेरी शोखियों को रख दिया

चिलचिलाती धूप में तपने लगी जब छत मेरी
उनके हाथों की लिखी कुछ चिट्ठियों को रख दिया 

कुछ दिनों को काम से बाहर गया था शह्र के
पूड़ियों के साथ उसने हिचकियों को रख दिया

कुछ ज़ियादा कह दिया, वो चुप रही पर लंच में
साथ में सौरी के मेरी गलतियों को रख दिया

बीच ही दंगों के लौटी ज़िन्दगी ढर्रे पे फिर
शह्र में जो फौज की कुछ टुकड़ियों को रख दिया

कुछ दलों ने राजनीती की दुकानों के लिए
वोट की शतरंज पे फिर फौजियों को रख दिया

सोमवार, 21 जनवरी 2019

न्याय-व्यवस्था ...


कौन हूँ मैं
आँखों में पट्टी लपेटे
दूर तक गहरा देखने की क्षमता से विकसित
श्वेत धवल पाषाण काया में  
सत्य की तराजू थामे
झूठ के ग्रुत्वाकर्षण से मुक्त
स्थित्प्रग्य, संवेदना से परे 
गरिमामय वैभवशाली व्यक्तित्व लिए

याद आया कौन हूँ ... ?

सुना है कभी दुधारी तलवार हुवा करती थी
चलती थी इतना महीन कि पद-चाप सुनाई दे
सूर्य का तेज, तूफ़ान की गति
थम जाती थी मेरे सम्मोहन से सब की मति

क्या .... अभी भी नहीं समझे?

समझोगे कैसे ...
मैं कुंद, जंग लगी तलवार हूँ  
तार तार पट्टी से लाज बचाती   
अपने ही परिहास का बोझा उठाए
अंधी, बेबस, लाचार हूँ
बंद रहती हूँ अमीरो की रत्न-जड़ित तिजोरी में
क़ानून की लम्बी बहस में अटकी व्यवस्था की चार-दिवारी में
गरीबी की लाचारी में, महाजन की उधारी में
न्याय की ठेकेदारी में, वकीलों की पेशेदारी में  

शाहबानों के किस्सों में, निर्भया के हिस्सों मैं  
दंगों की आफत में, घोटालों की विरासत में

सुना है बूढ़ी होते आँखें के सपने, जवानी की आशा   
ताक रहे हैं मेरा तराज़ू  

कानून की धाराओं में जकड़ी 
चीख रही है आत्मा मेरी

क़ानून की किसी धारा में खोजो
न हो तो तलवार से भेदो
मेरे गौरव-शाली इतिहास को आधार दो

मुझ न्याय को न्याय से जीने का अधिकार दो