गुरुवार, 11 सितंबर 2008

अच्छा लगेगा

शहर दरिया हो या हो सहरा पहाड़
साथ दो तुम उम्र भर अच्छा लगेगा

थक चुका हूँ जिन्दगी की धूप में
छावं में तेरी मगर अच्छा लगेगा

सर्दियों का वक़्त और कुल्लू का मौसम
हो गयी है दोपहर अच्छा लगेगा

रेत का दरिया और हम तुम साथ हैं
ख़त्म न हो ये सफर अच्छा लगेगा

चाँद में धब्बे सहे नही जाते
आप जेसे भी हो पर अच्छा लगेगा

दिल ही रखने को सही पर बोल दो
याद आया दिगम्बर अच्छा लगेगा

रात होने को है और तन्हा हूँ में
लौट आओ मेरे घर अच्छा लगेगा

7 टिप्‍पणियां:

  1. रेत का दरिया और हम तुम साथ हैं
    ख़त्म न हो ये सफर अच्छा लगेगा

    वाह ..बहुत खूबसूरत गज़ल

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  2. bahut behatrin gajal.dil ko choo gai.badhaai aapko.



    please visit my blog.thanks.

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  3. बेहतरीन गज़ल लिखी है सर!


    सादर

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  4. आपकी पोस्ट की हलचल आज (30/10/2011को) यहाँ भी है

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  5. रात होने को है और तन्हा हूँ में
    लौट आओ मेरे घर अच्छा लगेगा

    बेहतरीन गज़ल,हर शेर लाजवाब....

    छोड़कर चुप्पी,उड़ो तितली सी तुम
    है अभी कमसिन उमर अच्छा लगेगा.
    तट समुंदर आओ थोड़ा टहल आयें
    पाँव को चूमें लहर अच्छा लगेगा.
    यूँ किसी भी बात पर रूठो भी तुम
    मान जाओ रूठकर अच्छा लगेगा.
    ना हँसो तो मुस्कुरा भी दो जरा
    एक डिम्पल गाल पर अच्छा लगेगा.

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  6. बहुत खूब सर..
    अच्छा लगा...
    सादर.

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