सोमवार, 29 सितंबर 2008

दर्द जब कागज़ पर उतर आएगा

दर्द जब कागज़ पर उतर आएगा
चेहरा तेरा लफ्जों में नज़र आएगा

अपने हाथों की लकीरों में न छुपाना मुझे
हाथ छूते हि तेरा चेहरा निखर आएगा

बदल गया है मौसम् महक सी आने लगी
मुझे लगता है जैसे तेरा शहर आएगा

तेरे पहलू में बैठूं तुझसे कोई बात करुँ
एक लम्हा ही सही पर ज़रूर आएगा

एक मुद्दत से आँखे बंद किए बैठा हूँ
कभी तो ख्वाब में मेरा हज़ूर आएगा

13 टिप्‍पणियां:

  1. एक अद्बुत रचना।

    टिप्पणी से मुश्किल था बचना।

    दिल को छूती रचना।

    संजय भास्कर के ब्लॉग से आया हूँ

    पढ़कर यह रचना


    फिर तो मुश्किल ही था बचना

    टिप्पणी से।

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  2. बदल गया है मौसम् महक सी आने लगी
    मुझे लगता है जैसे तेरा शहर आएगा

    तेरे पहलू में बैठूं तुझसे कोई बात करुँ
    एक लम्हा ही सही पर ज़रूर आएगा

    बढ़िया गज़ल

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  3. अच्छी ,दिल को छूती हुई गज़ल !!

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  4. अपने हाथों की लकीरों में न छुपाना मुझे
    हाथ छूते हि तेरा चेहरा निखर आएगा

    बदल गया है मौसम् महक सी आने लगी
    मुझे लगता है जैसे तेरा शहर आएगा

    bahut sundar gazal... yah panktiyan to bas lajwab hi lagin...

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  5. एक मुद्दत से आँखे बंद किए बैठा हूँ
    कभी तो ख्वाब में मेरा हज़ूर आएगा

    khoobsoorat ...komal ..ehsaas ...

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  6. एक मुद्दत से आँखे बंद किए बैठा हूँ
    कभी तो ख्वाब में मेरा हज़ूर आएगा
    behad achchi lagi.....

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  7. एक मुद्दत से आँखे बंद किए बैठा हूँ
    कभी तो ख्वाब में मेरा हज़ूर आएगा
    :-)

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  8. कल 05/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. एक अनोखा सोच |अच्छी रचना बधाई |
    आशा

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  10. अपने हाथों की लकीरों में न छुपाना मुझे
    हाथ छूते हि तेरा चेहरा निखर आएगा



    वाह बेहद खूबसूरत एहसास ....

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  11. संवेदनशील रचना अभिवयक्ति.....

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है