शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

तोड़ लाना चाँद

यूं तो साथ है तमाम लोगों का हजूम
हम सफ़र कोई तो मेरे साथ होना चाहिये


यूं तो गम में दोस्त बहुत होते हैं शरीक
गले लग कर कोई मेरे साथ रोना चाहिये

जुस्तजू, वादे-वफ़ा, अरमान दिल की ख्वाहिशें
घड़ी भर को नींद आ जाए वो कोना चाहिये


इस जहाँ में आब-दाने की नही चिंता मुझे
ओड़नी है आसमां मिट्टी बिछोना चाहिये


नफरतों की फसल बहुत काट ली सबने यहाँ
प्रेम की बाली उगे वो बीज बोना चाहिये


तुम अगर छूने चलो आकाश की बुलंदियाँ
तोड़ लाना चाँद ये मुझको खिलौना चाहिये


कोई नया खेल तुम न खेलना ऐ बादलों
तुम जो बरसो मेरा घर-आँगन भिगोना चाहिये

19 टिप्‍पणियां:

  1. कोई नया खेल तुम न खेलना ऐ बादलों
    तुम जो बरसो मेरा घर-आँगन भिगोना चाहिये
    सुंदर पंक्तियाँ और गहरे भाव बधाई

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  2. तुम अगर छूने चलो आकाश की बुलंदियाँ
    तोड़ लाना चाँद ये मुझको खिलौना चाहिये


    कोई नया खेल तुम न खेलना ऐ बादलों
    तुम जो बरसो मेरा घर-आँगन भिगोना चाहिये
    bahut sunder

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  3. khoob she'r kah lete hain aap!

    chamatkar hai janab!
    kahan lekha-bahi aur kahan uroozo-wazan!
    कैसे हैं आप ?

    ज़रूर पढिये,इक अपील!
    मुसलमान जज्बाती होना छोडें
    http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/2008/10/blog-post_18.html
    अपनी राय भी दें.

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  4. कोई नया खेल तुम न खेलना ऐ बादलों
    तुम जो बरसो मेरा घर-आँगन भिगोना चाहिये

    लाजवाब शेर ! बहुत शुभकामनाएं !

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  5. तुम अगर छूने चलो आकाश की बुलंदियाँ
    तोड़ लाना चाँद ये मुझको खिलौना चाहिये

    सुन्दरतम रचना ! बधाई !

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  6. तुम अगर छूने चलो आकाश की बुलंदियाँ
    तोड़ लाना चाँद ये मुझको खिलौना चाहिये

    achha kaha hai
    badhai....

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  7. "समर" सहर हो कैसे मावस की रातों ,
    ठिठुर ठहरा जो चाँद मुसाफिर ;
    चांदनी वा तन्हाई दोनों हुईं साकी ,
    जो ठहर चाँद हुआ हम-प्याला;
    यूँ लम्बी हुईं जाडों में मावस कि रातें ,
    आईये जाम यादों के छलकाईये
    जग देखी औरों की तो चाँद कहेगा ,
    आप तो बस अपनी सुनाईये ||

    बन्दा नवाज़
    कविता /नज़्म खूबसूरत एवं भाव पूर्ण है |
    कबीरा पर आने का शुक्रिया | अन्योनास्ति-चौपालऔर कालचक्र पर आने की गुजारिश है | सिलसिला बनाए रखियेगा \ वोजो कहते है न कि 'रूह से रूह को राहत होती है '||

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  8. बहुत खूब। वास्तव में आज बादल भी खेल ही कर रहे हैं। कभी पड़ोसी का घर भिगो जाते हैं तो कभी आपका।

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  9. इस जहाँ में आब-दाने की नही चिंता मुझे
    ओड़नी है आसमां मिट्टी बिछोना चाहिये
    .... दिल को छूने वाली पंक्तियाँ हैं, बहुत ही जानदार ।

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  10. बहुत सुन्दर....
    हर पंक्ति लाजवाब.

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  11. इस जहाँ में आब-दाने की नही चिंता मुझे
    ओड़नी है आसमां मिट्टी बिछोना चाहिये
    Bahut sundar prastuti,
    Saadar

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  12. नफरतों की फसल बहुत काट ली सबने यहाँ
    प्रेम की बाली उगे वो बीज बोना चाहिये

    बहुत खुबसूरत अशआर हैं सर...
    सादर बधाइयां.

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  13. नफरतों की फसल बहुत काट ली सबने यहाँ
    प्रेम की बाली उगे वो बीज बोना चाहिये
    .. सब लोग यह ठान लें तो धरती स्वर्ग बन जाए।

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  14. बेहद शानदार और लाजवाब शेर ………………एक से बढकर एक हैं सभी।

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  15. यूं तो साथ है तमाम लोगों का हजूम
    हम सफ़र कोई तो मेरे साथ होना चाहिये
    बेहतरीन मुखड़ा /मतला ,मक्ता और सब कुछ जो पिरोया आपने भाव सागर में डुबोया आपने .

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  16. यूं तो गम में दोस्त बहुत होते हैं शरीक
    गले लग कर कोई मेरे साथ रोना चाहिये....
    waah bahut achchi pankti dil ko chu gya.

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  17. बहूत हि सुंदर अभिव्यक्ती है..
    प्रत्येक पंक्ती लाजवाब है
    सुंदर रचना...

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है