रविवार, 2 नवंबर 2008

आइनों के शहर का वो शख्स था

तेज़ थी हवा तुम्हारे शहर की
तितलियों का रंग भी उड़ा दिया

बादलों को घर में मैंने दी पनाह
बिजलियों ने घर मेरा जला दिया

बारिशों का खेल भी अजीब था
डूबतों को और भी डुबा दिया




आइनों के शहर का वो शख्स था
सत्य को सफाई से छुपा गया

इक ज्योतिषी हाथ मेरा देख कर
भाग्य की रेखाओं को मिटा गया

कौन सा भंवरा था साथ शहद के
पंखुरी का रंग भी चुरा गया

12 टिप्‍पणियां:

  1. आइनों के शहर का वो शख्स था
    सत्य को सफाई से छुपा गया

    इक ज्योतिषी हाथ मेरा देख कर
    भाग्य की रेखाओं को मिटा गया

    कौन सा भंवरा था साथ शहद के
    पंखुरी का रंग भी चुरा गया
    arre kya baat hai.....

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  2. इक ज्योतिषी हाथ मेरा देख कर
    भाग्य की रेखाओं को मिटा गया


    -वाह वाह!! बहुत खूब!!

    आनन्द आ गया.

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  3. बहुत खूब लिखा है ..बधाई ...

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  4. बहुत शानदार रचना...हर लफ्ज़ असरदार...वाह..वा...
    नीरज

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  5. कौन सा भंवरा था साथ शहद के
    पंखुरी का रंग भी चुरा गया
    शानदार रचना...

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  6. आपकी रचनाओं के रंग में मैं भी रंगने लगा हूँ.....प्लीज़ मुझे बचाईये......अदभुत लिखते हो आप.....सच.....!!

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  7. बाप रे बाप....रब्बा मेरे रब्बा....मौला मेरे मौला....हाय माँ कित्ता...कित्ता...कित्ता अच्छा लिखते हो आप.....

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  8. तेज़ थी हवा तुम्हारे शहर की
    तितलियों का रंग भी उड़ा दिया

    बहुत अच्छी रचना

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  9. पंक्तियाँ दो चुन सकूँ ये मेरे बस की बात नहीं
    कुछ कहूँ इस गजल पर,इतनी भी औकात नहीं.
    सोचता हूँ शहद के संग,पंखुरी का रंग चुरा लूँ
    डर रहा हूँ इतने गहरे उनसे ताल्लुकात नहीं.

    बस इतना ही....

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  10. आइनों के शहर का शख़्स, रेखा मिटाने वाला ज्योतिषी , रंग चुराने वाला भँवरा ...बहुत ही बढ़िया । शुभकामनाएँ ।

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