गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

जीवन

सुख जो तूने भोगा है, दुःख भी तुझको सहना है
दीपक चाहे तेज़ जले, तल में तो अँधेरा रहना है

लोभ, मोह, माया की मद में, अँधा हो कर दौड़ रहा
अंत समय में सब को भईया राम नाम ही कहना है

तेरा मेरा सबका जीवन पल दो पल का लेखा है
गिन कर सबकी साँसे, चोला पञ्च-तत्त्व का पहना है

सागर की लहरों सा जीवन तट की और है दौड़ रहा
किस को मालुम तट को छू कर लहरों को तो ढहना है

मुँह न मोड़ो तुम सपनो से, सपनो से तो है जीवन
सपने जब तक आंखों में, जीवन चलते रहना है



खुशियाँ सबकी अपनी, दुःख भी सबका अपना हैं
जीवन बच्चे की मुट्ठी में, रेत भरा इक सपना है

10 टिप्‍पणियां:

  1. मुँह न मोड़ो तुम सपनो से, सपनो से तो है जीवन
    सपने जब तक आंखों में, जीवन चलते रहना है

    behtreen

    जवाब देंहटाएं
  2. मुँह न मोड़ो तुम सपनो से, सपनो से तो है जीवन
    सपने जब तक आंखों में, जीवन चलते रहना है
    " हर हाल में जीने को प्रेरित करती कविता, सच कहा सपना है तो जीवन है, सपने ही कुछ करने को, जीने को प्रेरित करते हैं और एक उम्मीद की किरण जलाये रखते हैं "

    Regards

    जवाब देंहटाएं
  3. आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
    वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है।

    ‘…हम तो ज़िन्दा ही आपके प्यार के सहारे है
    कैसे आये आपने होंठो से पुकारा ही नही…’’

    आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे
    बधाई स्वीकारें।
    आप मेरे ब्लॉग पर आए, शुक्रिया.

    ‘मेरी पत्रिका’ में आज प्रकाशित नई रचना/पोस्ट पढ़कर अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएँ।
    आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

    Link : www.meripatrika.co.cc

    …Ravi Srivastava
    meripatrika@gmail.com

    जवाब देंहटाएं
  4. श्यामल जी ने अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार भेजी है, मैं उनका आभारी हूँ की उनका मार्ग-दर्शन मिला तथा आग्रह करता हूँ की ऐसे ही स्नेह बनाये रखें
    दिगम्बर

    मजा आ गया। बहुत अर्थपूर्ण है। भाई वाह।। काश मैं भी भाव से भरपूर ऐसी रचना कर पाता।
    यदि मुझे इन पँक्तियों को लिखना पड़े तो मैं निम्न प्रकार से लिखूँगा। यही कारण है कि इसे आपके व्यक्तिगत मेल पर भेज रहा हूँ।

    जीवन

    तुमने जो भी सुख भोगा है, दुःख भी तुझको सहना है।
    हर पल दीप जले चाहे पर, तले अँधेरा रहना है।।
    लोभ, मोह, माया की मद में, अँधा हो कर दौड़ रहा।
    अंत काल में सब को भईया, राम नाम ही कहना है।।
    तेरा मेरा सबका जीवन, पल दो पल का लेखा है।
    गिनती की साँसे और चोला, पञ्च-तत्त्व का पहना है।।
    सागर की लहरों सा जीवन, दौड़ रहा है तट की ओर।
    किसको मालुम तट को छूकर, फिर लहरों को बहना है।।
    तुम सपनो से मुँह न मोड़ो, सपनो से ही जीवन है।
    आँखों में सपने जब तक हैं, जीवन चलते रहना है।।
    गर सबकी खुशियाँ अपनी है, दुःख भी अपना है सबका।
    रेत भरा बच्चे की मुट्ठी, यह जीवन, क्या कहना है?
    उम्मीद है अन्यथा नहीं लेंगे।।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह ! वाह ! वाह !
    बहुत बहुत सुंदर सारगर्भित सार्थक विचार हैं.इस सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए साधुवाद.

    श्यामल जी ने तो इसे और भी निखार कर प्रवाहपूर्ण गीत बना दिया है .

    जवाब देंहटाएं
  6. लोभ, मोह, माया की मद में, अँधा हो कर दौड़ रहा
    अंत समय में सब को भईया राम नाम ही कहना है

    वाह.. अत्यन्त सार्थक रचना ! बहुत शुभकामनाएं आपको !

    रामराम !

    जवाब देंहटाएं
  7. मुँह न मोड़ो तुम सपनो से, सपनो से तो है जीवन
    सपने जब तक आंखों में, जीवन चलते रहना है

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है