रविवार, 4 जनवरी 2009

ज़िन्दगी बनवास है

हवस है कैसी, नही बुझती तुम्हारी प्यास है
अपने हिस्से का समुन्दर, तो तुम्हारे पास है

साँस लेती हैं दीवारें, आंख हैं ये खिड़कियाँ
इस शहर के खंडहरों से, बोलता इतिहास है

लाल है पत्ते यहाँ सब, लाल उगती घास है
सोई हुयी है दास्ताँ, बिखरा हुवा विशवास है

मेरे घर के पास से, गुजरा था तेरा काफिला
घर मेरा उस रोज़ से, खिलता हुवा मधुमास है

मुद्दतों से लौट कर, क्यूँ घर न आए तुम मेरे
यूँ तो रहता हूँ मैं घर, पर ज़िन्दगी बनवास है

तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूब साहब, वाह! उत्तम


    ---
    चाँद, बादल और शाम
    http://prajapativinay.blogspot.com/

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  2. साँस लेती हैं दीवारें, आंख हैं ये खिड़कियाँ
    इस शहर के खंडहरों से, बोलता इतिहास है

    बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने बधाई हो

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  3. हवस है कैसी, नही बुझती तुम्हारी प्यास है
    अपने हिस्से का समुन्दर, तो तुम्हारे पास है
    बहुत खूब ! अच्छा लिखते है आप !

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  4. 'तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
    खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है'

    -सुंदर पंक्तियाँ !

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  5. बहुत अच्छी रचना।
    साँस लेती हैं दीवारें, आंख हैं ये खिड़कियाँ
    इस शहर के खंडहरों से, बोलता इतिहास है
    आपकी यह रचना भी अपने आप में एक कहानी है।

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  6. स्वप्न मेरे बंद,बंद आंखों में मेरी सुना ज़िंदगी बनवास है
    स्वप्न मेरे देखा खुली आंखों ,लगा ज़िंदगी आस-पास है

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  7. तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
    खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है


    वाह दिगम्बर भाई, नए साल की आपको ढेरों बधाईयां।

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  8. तुझसे पहले आ गयी थी, तेरे आने की ख़बर
    खिल उठी खेतों मैं सरसों, छा गया उल्लास है


    वाह दिगम्बर भाई, नए साल की आपको ढेरों बधाईयां।

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  9. बहुत सुन्दर !
    घुघूती बासूती

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  10. हवस है कैसी, नही बुझती तुम्हारी प्यास है
    अपने हिस्से का समुन्दर, तो तुम्हारे पास है


    वाह!! बहुत लिखा जनाब!! आनन्द आ गया...छा गये. नया साल मुबारक घर भर को.

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  11. तुम्हारी प्रोफाइल देख रहा था, नजर पड़ी:

    जागती आँखों से स्वप्न देखना मेरी फितरत है .........

    ...
    और मेरी मजबूरी. कमबख्त, ये मुई नींद नहीं आती. :)

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  12. मुद्दतों से लौट कर, क्यूँ घर न आए तुम मेरे
    यूँ तो रहता हूँ मैं घर, पर ज़िन्दगी बनवास
    " इन पंक्तियों में इन्तजार के पलों की शिकायत की गहरी अनुभूति महसुस हुई "

    regards

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  13. shabdon mein hain, ye jo lipti aapki ankahi aass hain
    bhavnao se bahri ye rachna khoob aayi raas hain

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  14. बहोत खूब लिखा है आपने वह मज़ा आगया भाई ....बधाई हो ...


    अर्श

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  15. वाह जनाब वाह...अब आप की शायरी में उस्तादों की झलक नजर आने लगी है...कहने का अंदाज़ बेहद खूबसूरत होता जा रहा है....बधाई.
    नीरज

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  16. बहुत सुंदर गहरे भावः से ओतप्रोत रचना बहुत बहुत धन्यबाद

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  17. वाह ! वाह ! वाह ! अतिसुन्दर ! और क्या कहूँ.........

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  18. Nasva ji, ye do she'r bhot pasand aaye-

    जख्‍म पर मरहम लगाने क्‍यों नहीं आते
    गीत कोई गुनगुनाने क्‍यों नहीं आते

    आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
    हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

    pr mans khane wala kuch jcha nahi....

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