मंगलवार, 13 जनवरी 2009

ग़ज़ल

बहुत दिनों से बहुत से blogs पर ग़ज़ल की तकनीकी जानकारी पढ़ रहा था और कोशिश कर रहा था सीखने की, पर अगर पढ़ कर ही सब जानकारी मिल जाए तो गुरु का महत्त्व नही रहता. फ़िर एक बार पंकज जी ने मेरी ग़ज़ल को पढा और कुछ सुधार बताये उसके बाद वो ग़ज़ल और भी खूबसूरत ही गयी.

पंकज सुबीर जी को मैंने अपनी ये ग़ज़ल भेजी जिसको उन्होंने दुरुस्त किया. शायद उनको मेरी गज़लों में कुछ तो नज़र आया ही होगा जो मेरी ग़ज़लें उनकी नज़रे-करम हुयी. आपके सामने दोनों ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ. पंकज जी का आभारी हूँ जो उन्होंने इस में चार चाँद लगा दिए

मेरी ग़ज़ल

फ़िर जख्म पर मरहम लगाने क्यूँ नही आते
तुम गीत लब से गुनगुनाने क्यूँ नही आते

मैं सितारे आसमाँ से छीन कर ले आउंगा
तुम होंसला मेरा बढ़ाने क्यूँ नही आते

मुद्दतों से ढ़ो रहा हूँ लाश कन्धों पर लिये
तुम गिद्ध हो ये मॉस खाने क्यूँ नही आते

मैं उबलता दूध हूँ गिर जाउंगा कुछ देर में
तुम छींट पानी का लगाने क्यूँ नही आते

मुट्ठियों में बंद है बरसात का बादल मेरी
हिम्मत अगर है घर जलाने क्यूँ नही आते

भीगी हुयी सी रात है महका हुवा है दिन
तुम आँख में सपने सजाने क्यूँ नही आते


पंकज जी द्वारा ठीक करने के बाद वही ग़ज़ल


जख्‍म पर मरहम लगाने क्‍यों नहीं आते
गीत कोई गुनगुनाने क्‍यों नहीं आते

आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

लाश अपनी ढो रहा हूं कब से कांधे पर
गिद्ध हो तुम मांस खाने क्‍यों नहीं आते

मैं उबलता दूध बहने की हदों पर हूं
छींट पानी की लगाने क्‍यों नहीं आते

बंद है मुटृठी में मेरी सावनी बादल
है जो हिम्‍मत घर जलाने क्‍यों नहीं आते

रात भीगी सी है और महका हुआ दिन है
ख्‍वाब आंखों में सजाने क्‍यों नहीं आते

23 टिप्‍पणियां:

  1. आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
    हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

    बहुत बढ़िया लिखी है आपने

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  2. आपकी ग़ज़ल पसंद आयी । क्या आप नई-नई साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में पढ़ना चाहते हैं? यदि हां तो मेरे ब्लांग पर अवश्य ही लांग आंन करे। आप अपनी रचनाएं ब्लांग में उल्लेखित पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भी प्रेषित कर सकते है।
    अखिलेश शुक्ल संपादक कथा चक्र
    http://katha-chakra.blogspot.com

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. चलिए यह जानकर बड़ा हर्ष हुआ कि आप अपने काम से प्रसन्न हैं

    ---मेरा पृष्ठ
    गुलाबी कोंपलें

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  5. मैं उबलता दूध बहने की हदों पर हूं
    छींट पानी की लगाने क्‍यों नहीं आते

    दिगम्बर जी बहोत ही उम्दा ग़ज़ल बन पड़ी है गुरु देव के आशीर्वाद से...हलाकि सरे के सरे शे'र दाद के काबिल मगर ये शे'र तो जान दल दी है आपने बहोत ही खूब क्या बात है साहब ढेरो बधाई कुबूल करें और गुरु देव को मेरा प्रणाम कहें...

    आपका
    अर्श

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  6. bahut sunder gazal likhi aapne , aapke guru ji ne sone par suhaga kar diya, bahut khoob .

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  7. गुरु पारस पत्थर होता है...और पंकज जी...अब क्या कहूँ...उनके हुनर की तारीफ करना मेरे बस की बात नहीं...मुर्दे में प्राण फूकने का काम करते हैं और वो भी मुस्कुराते हुए...मेरी तमाम ग़ज़लों की वाह वाही उनके ही नाम तो है...आप की ग़ज़ल देखिये क्या से क्या कर दी है उन्होंने...ऐसे गुरु अब दुर्लभ हैं...हम और आप खुशकिस्मत हैं की उन्होंने अपनी ऊँगली हमें चलना सीखने को पकडादी है...
    नीरज

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  8. पंकज मास्साब का हाथ सर पर हो या बेंत पीठ पर (हमारे लिये दूसरा वाला) मामला सुन्दरा ही जाता है. बहुत खूब बन पड़ी है गज़ल.

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  9. आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
    हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते

    wah bahut hi sundar likha hai..

    aap ki urdu aur hindi par pakad bahut achchee hai...aur aap ke khyaal bahut achchey hotey hain---..guru ji ka ashirwaad mil gaya to aap ki bahut si nayab ghazalen future mein padhne ko milengii---
    abhaar sahit

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  10. gazal me lipti aapke sabde ka anokha mel,
    padhne ko aksar aisi gazal nazro me kyo nahi aate

    युवा जोश !

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  11. मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
    मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं

    -----नयी प्रविष्टि
    आपके ब्लॉग का अपना SMS चैनल बनायें
    तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

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  12. आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....

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  13. तकनीकी बारीकियों के बारे में तो मैं कुछ नहीं जानता. हाँ इतना कह सकता हूँ कि एक बेहतरीन प्रस्तुति आपने दी है.

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  14. बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है. गलतियाँ मात्रा की हो ए तो चलेगा, पर भाव सही होने चाहिए. बधाई आपको. मैंने भी कुछ ग़ज़लें लिखी हैं. जल्दी ही आपको पढ़ा के बोर करूँगा.

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  15. "आसमां से चांद तारे छीन लाऊंगा
    हौसला मेरा बढ़ाने क्‍यों नहीं आते"

    बहु्त खूब भाई जी।

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  16. वाह.. भाई वाह..

    पंकज जी ने खूब तराशा.
    तोला-तोला, माशा-माशा.

    पंकज जी को यथायोग्य...
    आपको बधाई..

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  17. Sari chizen 'perfect' hon yah koi jaruri nahin.Angadh chizon ka apna alag hi aakarshan hota hai.Aapke sahaj shabd kam prabhavi nahin.

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  18. प्रथम गुरू को वंदना दूजा पुजूं गणेश

    अच्‍छी गजल के लिए बधाई

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  19. मुद्दतों से ढ़ो रहा हूँ लाश कन्धों पर लिये
    तुम गिद्ध हो ये मॉस खाने क्यूँ नही आते

    क्या गहराई है...
    कहाँ से पाई है ||
    सच कहता हुईं कसम से ,
    दिल को चुकार आई है ||

    बहुत खूब.....

    और भाई पंकज जी से हमारी भी मुलाकात करवा दो, हम भी कुछ सीख लेंगे.....

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है